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Doomscrolling से बिगड़ रहा हमारा मानसिक स्वास्थ्य, कैसे करें पहचान और सुधार एक्सपर्ट्स से जानें

क्या आप भी घंटों स्मार्टफोन पर बुरी खबरें स्क्रॉल करते रहते हैं? इसे 'डूमस्क्रॉलिंग' कहते हैं, जो अनजाने में आपकी मानसिक शांति और सेहत को छीन रही है। क्या है इस डिजिटल लत का मनोविज्ञान? इस लत का क्या पड़ता है बुरा प्रभाव? क्या होता है डिजिट डिटॉक्स? इन सवालों का वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सुनील शर्मा दे रहे हैं जवाब।

7 min read
Apr 16, 2026

Doomscrolling : आज के दौर में जब हम सुबह आंखें खोलते हैं, तो सबसे पहले हमारा हाथ स्मार्टफोन की ओर बढ़ता है। हम सोशल मीडिया ऐप्स खोलते हैं और स्क्रॉल करना शुरू करते हैं। अचानक हमें एक बुरी खबर दिखती है कहीं कोई युद्ध हो रहा है, कहीं प्राकृतिक आपदा आई है, या कहीं कोई बड़ी आर्थिक मंदी की आहट है। हम रुकते नहीं हैं, बल्कि और नीचे स्क्रॉल करते हैं। इस व्यवहार को मनोवैज्ञानिकों ने एक नाम दिया है डूमस्क्रॉलिंग' (Doomscrolling)। आइए जानते है डूमस्क्रॉलिंग कैसे हमारी जिंदगी पर असर डालता हैं।

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डूमस्क्रॉलिंग क्या है?

डूमस्क्रॉलिंग का अर्थ है इंटरनेट या सोशल मीडिया पर लगातार बुरी, चिंताजनक या निराशाजनक खबरों को पढ़ते रहना, भले ही वे खबरें आपको मानसिक रूप से परेशान कर रही हों। यह एक अंतहीन चक्र की तरह है जहां उपयोगकर्ता अनजाने में नकारात्मकता की तलाश करता रहता है। यह शब्द 'Doom' (कयामत या विनाश) और 'Scrolling' (स्क्रीन पर ऊपर-नीचे जाना) से मिलकर बना है। यह एक ऐसी आदत है जो आधुनिक जीवन का एक अभिन्न, लेकिन घातक हिस्सा बन चुकी है। 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान यह शब्द पूरी दुनिया में मशहूर हुआ। उस समय लोग अनिश्चितता के डर से लगातार संक्रमण के आंकड़े, मौतों की खबरें और लॉकडाउन की जानकारी पढ़ रहे थे। लेकिन महामारी बीत जाने के बाद भी यह आदत नहीं गई। अब यह राजनीति, जलवायु परिवर्तन, और अपराधों की खबरों के रूप में हमारे जीवन में मौजूद है।

हम डूमस्क्रॉलिंग क्यों करते हैं?

सर्वाइवल इंस्टिंक्ट (Survival Instinct): आदिम काल से ही मानव मस्तिष्क खतरों के प्रति अधिक संवेदनशील रहा है। हमारे पूर्वजों के लिए खतरे को जानना जीवित रहने के लिए जरूरी था। आज वही प्रवृत्ति हमें 'डिजिटल खतरों' की ओर खींचती है। हमें लगता है कि बुरी खबरें पढ़कर हम आने वाले संकट के लिए "तैयार" हो रहे हैं।

FOMO (Fear of Missing Out): हमें डर लगता है कि कहीं हम किसी महत्वपूर्ण जानकारी से वंचित न रह जाएं। यह 'जानने की चाहत' हमें स्क्रीन से जोड़े रखती है।

एल्गोरिदम का जाल: फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स (ट्विटर) जैसे प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम इस तरह बनाए गए हैं कि वे आपके 'इंगेजमेंट' को पकड़ते हैं। यदि आप एक नकारात्मक खबर पर रुकते हैं, तो एल्गोरिदम आपको वैसी ही और खबरें दिखाने लगता है, जिससे आप एक 'फिल्टर बबल' में फंस जाते हैं।

नियंत्रण की झूठी भावना: कभी-कभी हमें लगता है कि किसी समस्या के बारे में सब कुछ जान लेने से हम उस पर नियंत्रण पा लेंगे। वास्तविकता में, यह केवल हमारी चिंता को बढ़ाता है।

मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव

एंग्जायटी और डिप्रेशन (Anxiety & Depression) : लगातार नकारात्मक खबरें पढ़ना हमारे दिमाग को 'फाइट या फ्लाइट' मोड में रखता है। इससे कोर्टिसोल (cortisol) का स्तर बढ़ जाता है, जिससे घबराहट, बेचैनी और लंबे समय में अवसाद की स्थिति पैदा हो सकती है।

नींद में खलल (Sleep Deprivation) : ज्यादातर लोग रात को सोने से पहले स्क्रॉलिंग करते हैं। स्मार्टफोन से निकलने वाली 'ब्लू लाइट' मेलाटोनिन हार्मोन (Melatonin ) के उत्पादन को रोकती है, जिससे नींद की गुणवत्ता खराब हो जाती है। बुरी खबरें दिमाग को उत्तेजित रखती हैं, जिससे चैन की नींद आना मुश्किल हो जाता है।

शारीरिक समस्याएं : लगातर एक ही मुद्रा में बैठकर फोन चलाने से 'टेक्स्ट नेक' (गर्दन में दर्द), आंखों में तनाव, और पीठ दर्द जैसी समस्याएं आम हो गई हैं। इसके अलावा, तनाव के कारण पाचन तंत्र और हृदय स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है।

सहानुभूति की कमी (Compassion Fatigue): जब हम लगातार दुनिया भर की त्रासदियां (Tragedy) देखते हैं, तो धीरे-धीरे हमारा दिमाग सुन्न होने लगता है। इसे 'कंपैशन फटीग' कहते हैं, जहां हम दूसरों के दुख के प्रति अपनी संवेदनशीलता खो देते हैं।

डूमस्क्रॉलिंग के चक्र को कैसे तोड़ें?

डिजिटल दुनिया से पूरी तरह कट जाना आज संभव नहीं है, लेकिन हम अपने व्यवहार को नियंत्रित जरूर कर सकते हैं। यहां कुछ प्रभावी तरीके से अपनी जिंदगी को खुशनुमा बनाएं रखने के लिए...

  • समय सीमा तय करें (Set Time Limits): अपने फोन में 'ऐप टाइमर' का उपयोग करें। यह तय करें कि आप समाचारों या सोशल मीडिया को दिन भर में 30 मिनट से अधिक समय नहीं देंगे।
  • नोटिफिकेशन बंद करें: हर छोटी-बड़ी खबर का नोटिफिकेशन आपके ध्यान को भटकाता है और आपको स्क्रॉलिंग के लिए उकसाता है। गैर-जरूरी ऐप्स के नोटिफिकेशन बंद कर दें।
  • 'डिजिटल डिटॉक्स' अपनाएं: हफ्ते में एक दिन या दिन के कुछ घंटे (जैसे भोजन के समय या सोने से पहले) फोन को खुद से दूर रखें।
  • सकारात्मक कंटेंट की तलाश करें: जागरूक होकर ऐसे पेजों या लोगों को फॉलो करें जो प्रेरणादायक, शैक्षिक या मनोरंजक सामग्री साझा करते हों। अपने फीड को 'क्लीन' करें।
  • सचेत रहें (Mindfulness): जब भी आप खुद को स्क्रॉल करते हुए पाएं, रुकें और खुद से पूछें क्या यह जानकारी अभी मेरे लिए जरूरी है? इसे पढ़कर मुझे कैसा महसूस हो रहा है?
  • विकल्प ढूंढें: फोन उठाने के बजाय किताब पढ़ें, टहलने जाएं, किसी मित्र से बात करें या कोई हॉबी अपनाएं। वास्तविक दुनिया की गतिविधियां डोपामाइन का बेहतर स्रोत हैं।

पत्रिका की खास बातचीत डॉ. सुनील शर्मा

एक सामान्य व्यक्ति 'सोशल मीडिया सर्फिंग' और 'डूमस्क्रॉलिंग' के बीच के फर्क को कैसे पहचाने?
जी हां , इन दोनों टर्म्स 'सर्फिंग' और 'डूमस्क्रॉलिंग' में बड़ा अंतर है। सर्फिंग मनोरंजन है, जबकि डूमस्क्रॉलिंग एक ऐसी मजबूरी है जहां व्यक्ति न चाहते हुए भी घंटों नकारात्मक खबरें देखता रहता है। इसका सीधा असर हमारे मस्तिष्क के कोर्टिसोल लेवल पर पड़ता है, जिससे एंग्जायटी, डिप्रेशन और नींद की कमी (Insomnia) जैसी गंभीर समस्याएं पैदा होती हैं।

क्या 'डूमस्क्रॉलिंग' को एक मानसिक विकार (Mental Disorder) की श्रेणी में रखा जा सकता है, या यह केवल एक खराब आदत है?

अगर मेडिकल टर्म्स में कहें तो, फिलहाल 'डूमस्क्रॉलिंग' (Doomscrolling) को आधिकारिक तौर पर 'DSM-5' (मानसिक विकारों की मानक गाइडबुक) में एक अलग बीमारी या विकार के रूप में दर्ज नहीं किया गया है। लेकिन, इसे केवल एक 'खराब आदत' कहकर खारिज कर देना भी बड़ी भूल होगी। हम इसे 'इम्पल्स कंट्रोल इश्यू' (Impulse Control Issue) और 'डिजिटल एडिक्शन' के एक गंभीर लक्षण के रूप में देखते हैं। इसे आप इस तरह समझ सकते हैं

आदत और विकार के बीच की धुंधली रेखा

  • यदि आप कभी-कभी बोरियत में या उत्सुकता में बुरी खबरें पढ़ते हैं, लेकिन काम आने पर या किसी के टोकने पर तुरंत फोन रख देते हैं, तो यह एक खराब आदत है जिसे अनुशासन से सुधारा जा सकता है।
  • जब डूमस्क्रॉलिंग आपकी रोजमर्रा की जिंदगी, आपकी कार्यक्षमता और आपके रिश्तों को प्रभावित करने लगे, तो यह खतरे की घंटी है। यह अक्सर Generalized Anxiety Disorder (GAD) या Obsessive-Compulsive Disorder (OCD) का एक हिस्सा बन जाती है।

क्या डूमस्क्रॉलिंग की वजह से लोगों में 'एम्पैथी फटीग' बढ़ रही है?

चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इसे हम 'कम्पैशन फटीग' (Compassion Fatigue) या 'सेंसिटिविटी लॉस' कहते हैं। इसे एक उदाहरण से समझिए। जब आप पहली बार किसी बड़ी दुर्घटना की खबर पढ़ते हैं, तो आपका दिल दहल जाता है। लेकिन जब डूमस्क्रॉलिंग के कारण आप हर 5 मिनट में एक नई त्रासदी, एक नया युद्ध या एक नया अपराध देखते हैं, तो आपका मस्तिष्क खुद को बचाने के लिए एक 'सुरक्षा कवच' तैयार कर लेता है। वह इन सूचनाओं को महसूस करना बंद कर देता है।

इसके पीछे के कारण है

  • इमोशनल ओवरलोड (Emotional Overload): हमारे मस्तिष्क की संवेदना महसूस करने की एक सीमित क्षमता है।
  • जब हम अपनी क्षमता से ज्यादा दुखद खबरें 'कंज्यूम' करते हैं, तो दिमाग का वह हिस्सा जो सहानुभूति (Empathy) पैदा करता है, 'शटडाउन' मोड में चला जाता है। यह एक तरह का 'मेंटल पैरालिसिस' है।
  • डिसेन्सिटाइजेशन (Desensitization): डूमस्क्रॉलिंग के कारण दुख अब हमारे लिए 'नॉर्मल' होता जा रहा है। जब त्रासदी केवल एक 'डिजिटल पिक्सेल' या 'वीडियो क्लिप' बनकर रह जाती है, तो हम भूल जाते हैं कि उस स्क्रीन के पीछे एक असली इंसान है जो सच में दर्द में है।
  • लाचारी की भावना (Learned Helplessness): जब हम लगातार ऐसी बुराइयां देखते हैं जिन्हें हम बदल नहीं सकते, तो हमारा दिमाग यह मान लेता है कि सब कुछ बुरा ही है और मैं कुछ नहीं कर सकता। यह भावना हमें दूसरों के प्रति उदासीन (Indifferent) बना देती है।

क्या डूमस्क्रॉलिंग का सीधा संबंध ओसीडी (OCD) या पैनिक अटैक जैसी समस्याओं से देखा गया है?

  • अनिश्चितता के डर से बार-बार बुरी खबरें चेक करना एक 'डिजिटल रिचुअल' (OCD) बन जाता है। इससे शरीर में कोर्टिसोल बढ़ता है, जो अचानक घबराहट या पैनिक अटैक का कारण बनता है।
  • त्रासदियां लगातार देखने से हमारा मस्तिष्क 'सुन्न' हो जाता है। हम दूसरों के दुख के प्रति अपनी संवेदनशीलता खो देते हैं, जिसे 'कम्पैशन फटीग' कहते हैं।
  • यह दिमाग के 'अमिग्डाला' को सक्रिय कर हमें हमेशा डर की स्थिति में रखता है।

बच्चों और किशोरों पर इसका असर वयस्कों से कितना अलग और खतरनाक है? माता-पिता को किन लक्षणों पर गौर करना चाहिए?

बच्चों और किशोरों का मस्तिष्क विकास के चरण में होता है, इसलिए उन पर डूमस्क्रॉलिंग का असर वयस्कों की तुलना में कहीं अधिक गहरा और स्थायी होता है। वयस्कों के पास तर्क करने की क्षमता होती है, लेकिन बच्चों का 'वर्ल्ड व्यू' इन नकारात्मक खबरों से डरावना और निराशावादी बन जाता है। लगातार नकारात्मकता से किशोरों में हीन भावना, भविष्य को लेकर असुरक्षा और 'अटेंशन स्पैन' (एकाग्रता) की कमी हो जाती है। साथ ही ,व्यवहार में बदलाव देखने को मिलता है वे पढ़ाई और खेलकूद से कटकर एक काल्पनिक और डरावनी डिजिटल दुनिया में सिमट जाते हैं।

माता-पिता के लिए वॉर्निंग साइंस:

  • अचानक स्वभाव में चिड़चिड़ापन या गुस्सा बढ़ना।
  • नींद की कमी, देर रात तक जागना और सुबह थकान महसूस करना।
  • परिवार और दोस्तों से दूरी बनाकर अकेले कमरे में फोन चलाना।
  • बिना कारण सिरदर्द या आंखों में तनाव की शिकायत।

एक मनोचिकित्सक के तौर पर आप 'डिजिटल हाइजीन' (Digital Hygiene) के लिए कौन से नियम बताएंगे?

डिजिटल हाइजीन' का आसान सा मतलब है जैसे हम बीमारी से बचने के लिए हाथ धोते हैं और साफ-सफाई रखते हैं, वैसे ही डिजिटल कचरे से मानसिक स्वास्थ्य को बचाने के लिए कुछ नियमों का पालन अनिवार्य है। मैं इसे '5-R फॉर्मूला' कहता हूं

  • Rule of 'Golden Hour' (सुनहरा घंटा): सोकर उठने के पहले एक घंटे और सोने से एक घंटे पहले फोन को हाथ न लगाएं। सुबह का पहला घंटा आपके पूरे दिन का मूड तय करता है। अगर आप उठते ही कोई बुरी खबर पढ़ते हैं, तो पूरा दिन 'स्ट्रेस मोड' में बीतेगा।
  • Rethink your Feed (फीड का शुद्धिकरण): अपने सोशल मीडिया को 'अनफॉलो' और 'म्यूट' के जरिए साफ करें। ऐसे पेज या लोग जो केवल सनसनी, विवाद या नकारात्मकता फैलाते हैं, उन्हें तुरंत हटा दें। अपनी फीड में कुछ प्रेरणादायक, कलात्मक या शैक्षिक कंटेंट जरूर जोड़ें।
  • Region Free Zones (फोन-मुक्त क्षेत्र): घर में कुछ जगहें ऐसी तय करें जहां फोन वर्जित हो। जैसे डाइनिंग टेबल और बेडरूम। खाना खाते समय फोन चलाना न केवल पाचन बिगाड़ता है बल्कि रिश्तों की गहराई को भी खत्म करता है।
  • Remove Notifications (सूचनाओं का नियंत्रण): हर ऐप का नोटिफिकेशन ऑन रखना आपके दिमाग को 'हमेशा अलर्ट' मोड पर रखता है। केवल जरूरी ऐप्स (जैसे कॉल या वर्क मैसेज) के नोटिफिकेशन ऑन रखें। बाकी समय आप खुद तय करें कि आपको कब ऐप चेक करना है, ऐप आपको न बुलाए।
  • Reality Check (वास्तविक जुड़ाव): हर दिन कम से कम 30 मिनट बिना किसी गैजेट के बिताएं। टहलें, किसी से आमने-सामने बात करें या बस शांत बैठें। यह आपके दिमाग को 'रीबूट' करने में मदद करता है।

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