White Gold Farming: दुर्ग जिले के ग्राम गोढ़ी में गन्ने के साथ सफेद चुकंदर की अंतरफसली खेती किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरी है।
White Gold Farming: छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए खेती का एक नया मॉडल तेजी से उम्मीद बनकर उभर रहा है। अब केवल परंपरागत खेती ही नहीं, बल्कि जैव ऊर्जा उत्पादन से जुड़ी फसलें भी किसानों की आय बढ़ाने का जरिया बन रही हैं। दुर्ग जिले के ग्राम गोढ़ी में गन्ने के साथ सफेद चुकंदर (शुगरबीट) की अंतरफसली खेती के सफल प्रयोग ने कृषि और बायो-एनर्जी सेक्टर में नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं।
गोढ़ी स्थित बायोफ्यूल कॉम्प्लेक्स में आयोजित किसान सम्मेलन में विशेषज्ञों ने साफ कहा कि आने वाले समय में दुर्ग जिले के किसान केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि “ऊर्जादाता” के रूप में भी पहचान बनाएंगे। सम्मेलन में बड़ी संख्या में किसानों, वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।
सम्मेलन के दौरान किसानों को सफेद चुकंदर की खेती का भ्रमण कराया गया। खेतों में खुदाई कर जब फसल का परीक्षण किया गया तो सफेद चुकंदर का औसत वजन करीब 3.7 किलोग्राम पाया गया। विशेषज्ञों के अनुसार मुरुम वाली जमीन में इतनी बेहतर पैदावार मिलना बेहद सकारात्मक संकेत है।
आमतौर पर ऐसी भूमि को कम उपजाऊ माना जाता है, लेकिन शुगरबीट की सफल खेती ने इस धारणा को बदल दिया है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इस मॉडल को बड़े स्तर पर अपनाया जाए तो छत्तीसगढ़ के किसानों की आय में बड़ा बदलाव आ सकता है।
विशेषज्ञों ने बताया कि गन्ना एक दीर्घकालीन फसल है और शुरुआती महीनों में खेत का काफी हिस्सा खाली रहता है। ऐसे में उसी जमीन पर शुगरबीट की खेती कर किसान अतिरिक्त उत्पादन और अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं। सफेद चुकंदर की फसल केवल 5 से 6 महीनों में तैयार हो जाती है। इससे किसानों को एक ही खेत से दोहरी कमाई का अवसर मिलेगा।
राष्ट्रीय शर्करा संस्थान (NSI) कानपुर के वैज्ञानिकों ने किसानों को इस खेती के लिए प्रोत्साहित किया। डॉ. लोकेश बाबर ने बताया कि किसानों को एलएस-6 किस्म के उन्नत बीज उपलब्ध कराए जाएंगे। इसके साथ ही तकनीकी प्रशिक्षण भी दिया जाएगा, ताकि किसान वैज्ञानिक पद्धति से खेती कर बेहतर उत्पादन हासिल कर सकें। सम्मेलन में किसानों द्वारा लाए गए गन्ने के नमूनों की जांच भी की गई और उन्हें रोग प्रबंधन तथा आधुनिक खेती तकनीकों की जानकारी दी गई।
विशेषज्ञों के मुताबिक सफेद चुकंदर भविष्य में बायोएथेनॉल उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण कच्चा माल साबित हो सकता है। देश में हरित ऊर्जा को बढ़ावा देने की दिशा में यह फसल अहम भूमिका निभा सकती है। कृषि और ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि इससे किसानों की आमदनी बढ़ने के साथ-साथ ऊर्जा आत्मनिर्भरता को भी मजबूती मिलेगी।
छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल विकास प्राधिकरण (CBDA) गोढ़ी में बायो-एनर्जी परियोजनाओं पर तेजी से काम कर रहा है। यहां नेपियर घास से कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) और ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन पर अनुसंधान चल रहा है। सहायक परियोजना अधिकारी संतोष कुमार मैत्री ने कहा कि यह पहल छत्तीसगढ़ को जैव ऊर्जा के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल कर सकती है।
NSI कानपुर की निदेशक डॉ. सीमा परोहा ने बताया कि राजस्थान, पंजाब, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के बाद अब छत्तीसगढ़ में भी इस तकनीक का सफल क्रियान्वयन हुआ है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में सफेद चुकंदर के लिए बेहतर मार्केटिंग सिस्टम और किसानों को उचित समर्थन मूल्य उपलब्ध कराने की दिशा में भी काम किया जाएगा।
किसान सम्मेलन में दुर्ग, कवर्धा और बेमेतरा जिले के बड़ी संख्या में प्रगतिशील किसानों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम के दौरान किसानों और अधिकारियों का सम्मान भी किया गया। सम्मेलन में मौजूद किसानों ने नई तकनीकों और वैकल्पिक खेती मॉडल में गहरी रुचि दिखाई।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में जैव ऊर्जा आधारित खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकती है। इससे किसानों को परंपरागत खेती पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और आय के नए स्रोत विकसित होंगे। गन्ना और सफेद चुकंदर की अंतरफसली खेती का यह प्रयोग अब पूरे प्रदेश के किसानों के लिए प्रेरणा बनता जा रहा है।