E Waste: ई-वेस्ट का बढ़ता खतरा सेहत पर भारी पड़ सकता है, डॉक्टर्स के मुताबिक ये दे सकते हैं कई गंभीर और जानलेवा बीमारियां, घर में पड़ा पुराना मोबाइल, कम्प्यूटर, टीवी सिर्फ कचरा नहीं, धीमा जहर हैं
E Waste health effect: भोपाल के अवधपुरी इलाके में रहने वाले जनार्दन और श्रीवास्तव के परिवार में टेबल की रैक और एक दराज में पुराने 3-4 मोबाइल, पुराने खराब या टूटे चार्जर, बेकार पावर बैंक और दो खराब रिमोट, एक पुराना टीवी, एक-दो स्मार्ट वॉच, एक प्रेस महीनों से पड़े हैं। दोनों ही परिवार साफ-सफाई का इंतजार कर रहे थे और सोच रहे थे कि किसी दिन दे देंगे कबाड़ में। दोनों ही परिवारों की गृहणियां निधि श्रीवास्तव और मिनी जनार्दन कहती हैं, कि जब कबाड़ वाला आएगा, तो उसे दे देंगे।
लेकिन जब उनसे पूछा गया कि क्या वे जानती हैं कि घर में रखा गया ई वेस्ट एक्सप्लोसिव होता है। तो उनका कहना था नहीं ऐसा नहीं होता। और न ही वो ये जानती थीं कि इसका हेल्थ पर गंभीर दुष्प्रभाव भी पड़ता है।
यह अलग बात है कि उन्हें ई वेस्ट के एक्सप्लोसिव होने और सेहत पर गंभीर खतरे के बारे में पता नहीं था। लेकिन ई वेस्ट का घर में जमा रहना ये अकेले इन दो परिवारों की कहानी नहीं है, बल्कि राजधानी भोपाल समेत प्रदेश और देशभर में ऐसे हजारों -लाखों घर हैं, जिनमें छोटे-बड़े इलेक्ट्रॉनिक सामान जमा हैं। ये भले ही उनके इस्तेमाल के बाहर हैं, लेकिन या तो ये घर में जमा ही रहते हैं, या कई लोग इन्हें कहीं भी फेंक देते हैं। इससे अलग कुछ कहें तो कुछ लोग इसे कबाड़ वाले को भी देते हैं, लेकिन वहां से वे सही सिस्टम तक नहीं पहुंच पाता है। यही ई वेस्ट जब अनौपचारिक तरीके से निपटाया जाता है, तो धीरे-धीरे पर्यावरण और सेहत दोनों के लिए खतरे में बदल जाता है।इंसानी सेहत के लिए खतरनाक है ये साधारण समझा जाने वाला कचरा, पढ़ें संजना कुमार की खास रिपोर्ट...
Central Pollution Control Board (CPCB) की ताजा रिपोर्टों के मुताबिक भारत में ई-वेस्ट बहुत तेजी से बढ़ रहा है। दुनिया भर में इसमें बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 2021–22 के आसपास देश में 16 लाख टन से अधिक ई-वेस्ट दर्ज किया गया और पिछले कुछ साल के 2024-25 के आंकड़े बताते हैं कि हर साल इसमें उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।
Madhya Pradesh Pollution Control Board के मुताबिक, एमपी भी इस मामले में पीछे नहीं है, लेकिन यहां पर अभी ढांचागत सुविधाओं का अभाव है। इसमें न तो पर्याप्त संख्या में कलेक्शन सेंटर मौजूद हैं और न ही रीसाइक्लिंग करने वाले प्लांट की मौजूदगी है।
भोपाल जैसे शहरों में, जहां डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है, ई-वेस्ट में लगभग 12–15% सालाना वृद्धि का अनुमान लगाया जा रहा है!
एक स्थानीय कबाड़ी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि 'लोग सीधे हमें दे देते हैं मोबाइल, तार, बैटरी…हम इसे आगे बड़ी दुकानों/खरीदारों को बेच देते हैं। कभी-कभी तार से तांबा निकालने के लिए जलाना भी पड़ता है।'
लेकिन यही से असली दिक्कत शुरू होती है, जलाने से जहरीला धुआं निकलता है, जो आसपास का वातावरण ही प्रभावित नहीं करता बल्कि असुरक्षित ढंग से काम करने के कारण कामगार और आसपास के लोगों का स्वास्थ्य चपेट में आता है। रसायन और अवशेष मिट्टी और पानी में मिल सकते हैं। यानी 'रीसाइक्लिंग' का यह अनौपचारिक तरीका, जो कि असली में खतरे का प्रसार बन जाता है।
पर्यावरणविद् डॉ. सुभाष सी. पांडे कहते हैं कि ई-वेस्ट से हवा, पानी, मिट्टी तीनों पर एक साथ दबाव पड़ता है। ई-वेस्ट में मौजूद सीसा (Lead), पारा (Mercury), कैडमियम (Cadmium) जैसे तत्व अगर नियंत्रित तरीके से न संभाले जाएं, तो वे पर्यावरण के तीनों प्रमुख घटकों को प्रभावित करते हैं:
भारत में ई-वेस्ट प्रबंधन के लिए नियम मौजूद हैं, जिनमें अधिकृत कलेक्शन, रीसाइक्लिंग और कंपनियों की जिम्मेदारी तो तय की गई है। लेकिन सही निगरानी के अभाव में इसका उतना परिणाम निकलकर सामने नहीं आया, जितना आना चाहिए था।
खतरनाक कचरे का वैज्ञानिक निपटान अनिवार्य है। स्वच्छ पर्यावरण नागरिकों का मौलिक अधिकार है (अनुच्छेद 21) और अनौपचारिक और असुरक्षित रीसाइक्लिंग गंभीर चिंता का विषय है। इससे साफ संकेत है कि नियम निर्देश सब मौजूद हैं कि लेकिन उनका क्रियांवयन ही असली चुनौती बनी हुई है।
-अधिकृत कलेक्शन सेंटर तक कम पहुंच
-लोगों में जागरुकता की कमी
-अनौपचारिक सेक्टर की आसान उपलब्धता
-लोग-सही तरीके से अलग और डिस्पोज करें
-प्रशासन-सुविधाएं और निगरानी बढ़ाए
-कंपनियां-अपने उत्पाद के कचरे की जिम्मेदारी लें
घरों से कबाड़ लेकर उन्हें बाहर की दुकानों पर बेचने वाले एक कबाड़ी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वह घरों से फ्रीज 500-600 रुपए में, कम्प्यूटर 100 रुपए में लेकर जाता है। इन्हें क्षेत्रीय रेग पिकर्स की दुकानों पर बेच देता है। अक्सर घरों से निकलने वाले इस ई वेस्ट में मोबाइल, बैटरी, सीपीयू भी रहते हैं, कई वायर, चार्जर आदि भी इसमें शामिल होते हैं।'भोपाल समेत मध्यप्रदेश में ई-वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर वर्तमान स्थिति क्या है, इसे जानने के लिए जब संबंधित अधिकारी से बात करने की कोशिश की गई तो, उन्होंने मीटिंग में होने की बात कही। लेकिन जब उन्हें दोबारा कॉल किया गया तो उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया।