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Education vs Employment: डिग्रीधारी युवा क्यों बन रहे मजदूर? राजिम की सड़कों पर बेरोजगारी की तस्वीर

Education vs Employment: राजिम में हर सुबह सैकड़ों लोग रोजगार की तलाश में पहुंचते हैं, जहां दिनभर की मेहनत सिर्फ मजदूरी नहीं बल्कि मजबूरी और अधूरे सपनों की कहानी बयां करती है।

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Education vs Employment: डिग्रीधारी युवा क्यों बन रहे मजदूर? राजिम की सड़कों पर बेरोजगारी की तस्वीर(photo-patrika)

Education vs Employment: छत्तीसगढ़ के राजिम में हर सुबह सड़कों पर एक ऐसा संघर्ष आकार लेता है, जो दिखता तो आम है, लेकिन भीतर से बेहद गहरा और चुभने वाला है। धमतरी, रायपुर, महासमुंद और गरियाबंद के गांवों से सैकड़ों लोग रोजी-रोटी की तलाश में यहां पहुंचते हैं। सुबह 8 बजे से शुरू होकर शाम तक चलने वाली यह मेहनत केवल शारीरिक श्रम नहीं, बल्कि उम्मीदों और मजबूरियों के बीच चल रही एक निरंतर जंग है।

Education vs Employment: जब पढ़ाई भी नहीं दिला पा रही रोजगार

दिनभर ईंट-गारा, पेंटिंग, टाइल्स और निर्माण कार्य में जुटे ये मजदूर अपने परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने के लिए हर हाल में काम करते हैं। लेकिन इस भीड़ में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि कई मजदूर ऐसे हैं, जिनके हाथों में कभी किताबें और डिग्रियां थीं- एमए, बीएड, स्नातक जैसी योग्यताएं, जिनसे उन्होंने बेहतर भविष्य के सपने बुने थे।

आज वही हाथ औजार थामे हुए हैं, और उनकी आंखों में सपनों की जगह हकीकत की सख्ती झलकती है। यह दृश्य केवल बेरोजगारी की कहानी नहीं कहता, बल्कि उस व्यवस्था की भी तस्वीर पेश करता है, जहां शिक्षा के बावजूद रोजगार की गारंटी नहीं है। राजिम की यह रोजमर्रा की तस्वीर एक बड़े सवाल को जन्म देती है- क्या पढ़ाई के बाद भी सम्मानजनक रोजगार मिलना अब केवल एक उम्मीद बनकर रह गया है?

शिक्षा के बाद भी मजदूरी- टूटा सपना, मजबूरी की राह

राजिम के श्रम बाजार में सबसे चौंकाने वाली तस्वीर यह है कि यहां केवल अशिक्षित ही नहीं, बल्कि उच्च शिक्षित युवा भी मजदूरी करने को मजबूर हैं। गोविंद पाल, जो पत्थर काटने का काम करते हैं, एमए पास हैं। सरकारी नौकरी की आस में सालों तैयारी की, लेकिन सफलता नहीं मिली। आज वे कहते हैं- “काम छोटा-बड़ा नहीं होता, परिवार चलाना जरूरी है।”

इसी तरह यशवंत साहू, बीएड डिग्रीधारी, दीवार पेंटिंग कर रहे हैं। उनके जैसे कई युवा हैं, जिन्होंने पढ़ाई के दम पर बेहतर भविष्य का सपना देखा था, लेकिन रोजगार के अभाव में उन्हें मजदूरी का रास्ता अपनाना पड़ा।

‘मजदूर दिवस’ से अनजान मजदूर

विडंबना यह है कि जिनके नाम पर 1 मई को अंतरराष्ट्रीय श्रम दिवस मनाया जाता है, वही मजदूर इसके महत्व से अनजान हैं। जब उनसे पूछा गया, तो अधिकतर ने साफ कहा- “हमें इन दिनों के बारे में जानकारी नहीं है, हम बस काम करते हैं और मजदूरी से जीवन चलाते हैं।” यह जवाब केवल जानकारी की कमी नहीं, बल्कि उस दूरी को भी दिखाता है, जो नीतियों और जमीनी हकीकत के बीच मौजूद है।

महिला मजदूरों की दोहरी चुनौती

निर्माण स्थलों पर काम करने वाली सुभदा, मोहिनी, रजनी, रामकली और प्रेमीन जैसी महिला मजदूरों की कहानी और भी कठिन है। वे घर और काम- दोनों जिम्मेदारियों को निभाती हैं। उन्हें श्रमिक योजनाओं और अधिकारों की जानकारी नहीं है, हालांकि अब मोबाइल के जरिए वे जानकारी हासिल करने की कोशिश कर रही हैं।

योजनाएं हैं, लेकिन लाभ अधूरा

मजदूरों के पास श्रमिक कार्ड तो है, लेकिन उससे मिलने वाली सुविधाएं पूरी तरह नहीं पहुंच पा रही हैं। श्रम विभाग के अनुसार, कुशल और अकुशल श्रमिकों का पूरा आंकड़ा अभी उपलब्ध नहीं है, जिससे योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा आती है।

रोजगार संकट की गहराती तस्वीर

राजिम का यह दृश्य केवल एक शहर की कहानी नहीं, बल्कि व्यापक रोजगार संकट का संकेत है। उच्च शिक्षा प्राप्त युवा जब मजदूरी करने को मजबूर हो रहे हैं, तो यह सवाल उठता है- क्या शिक्षा और रोजगार के बीच की कड़ी कमजोर हो चुकी है? विशेषज्ञ मानते हैं कि कौशल आधारित प्रशिक्षण, स्थानीय रोजगार सृजन और उद्योगों का विस्तार ही इस स्थिति को सुधार सकता है।

इतिहास: संघर्ष से मिला अधिकार

Haymarket Affair से जुड़ा अंतरराष्ट्रीय श्रम दिवस मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक है। 1 मई 1886 को अमेरिका में मजदूरों ने 8 घंटे काम, 8 घंटे आराम और 8 घंटे मनोरंजन की मांग को लेकर आंदोलन किया था। बाद में 1889 में इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली। भारत में पहली बार 1923 में चेन्नई में यह दिवस मनाया गया, लेकिन आज भी कई मजदूर इसके महत्व से अनजान हैं- जो अपने आप में एक बड़ी विडंबना है।

मेहनत जारी, पहचान अधूरी

राजिम के मजदूरों की यह तस्वीर एक गहरी सामाजिक और आर्थिक विडंबना को उजागर करती है, जहां मेहनत की कोई कमी नहीं, लेकिन अवसरों का अभाव साफ नजर आता है। यहां ऐसे कई युवा हैं जिन्होंने एमए, बीएड और अन्य डिग्रियां हासिल कीं, अपने भविष्य को संवारने के सपने देखे, लेकिन रोजगार के सीमित अवसरों और प्रतिस्पर्धा की कठोर हकीकत ने उन्हें मजदूरी की राह पर ला खड़ा किया।

यह केवल व्यक्तिगत संघर्ष नहीं, बल्कि व्यवस्था की उस कमी को दर्शाता है जहां शिक्षा और रोजगार के बीच संतुलन बिगड़ चुका है। दूसरी ओर, महिला मजदूर दोहरी जिम्मेदारियों के बीच जूझ रही हैं- घर और काम दोनों का भार उठाते हुए वे अपने अधिकारों और सरकारी योजनाओं से पूरी तरह अवगत नहीं हैं, जिससे वे कई सुविधाओं से वंचित रह जाती हैं।

श्रमिक कार्ड होने के बावजूद लाभों का अधूरा क्रियान्वयन यह बताता है कि नीतियां जमीन तक पूरी तरह नहीं पहुंच पा रही हैं। कुल मिलाकर, राजिम का यह परिदृश्य एक बड़े रोजगार संकट और जागरूकता की कमी की ओर इशारा करता है, जहां श्रमिकों की मेहनत तो लगातार जारी है, लेकिन उन्हें वह सम्मान, सुरक्षा और अवसर अब भी पूरी तरह नहीं मिल पा रहे, जिसके वे हकदार हैं।

Published on:
01 May 2026 04:53 pm
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