Family lost in Naxal attack: मोहला-मानपुर-चौकी की सुबाये सलामे ने 22 साल में नक्सली हिंसा में पिता, भाई और पति को खो दिया, लेकिन आज तक उन्हें न पूरा न्याय मिला और न ही वादा किया गया पुनर्वास।
Family lost in Naxal attack: छत्तीसगढ़ के मोहला-मानपुर-चौकी जिले के गट्टेगहन गांव की रहने वाली 37 वर्षीय सुबाये सलामे की जिंदगी दर्द और संघर्ष की ऐसी दास्तान है, जिसे सुनकर किसी का भी दिल दहल जाए। बीते 22 वर्षों में नक्सली हिंसा ने उनसे उनके पिता, छोटे भाई और पति तीनों को छीन लिया। इसके बाद भी उन्हें न तो पूरा न्याय मिला और न ही सरकार की ओर से वादा किया गया पुनर्वास।
जनवरी 2004 की एक रात, जब पूरा परिवार सो रहा था, तब 40-50 हथियारबंद नक्सली उनके घर पहुंचे। दरवाजा खुलते ही उन्होंने सुबाये के पिता सोन सिंह तुलामी को बेरहमी से पीटा, परिवार को बांध दिया और आंखों पर कपड़ा बांध दिया। इसके बाद उन्हें घर से बाहर ले जाकर मुखबिरी के शक में गला रेतकर हत्या कर दी गई। उस वक्त सुबाये महज 17-18 साल की थीं।
घटना के बाद पुलिस और प्रशासन ने परिवार को पुनर्वास नीति के तहत मकान, जमीन, नौकरी और मुआवजे का आश्वासन दिया। लेकिन हकीकत में परिवार को केवल 2200 रुपए की मामूली नौकरी ही मिल सकी। बाकी वादे कागजों तक ही सीमित रह गए।
पिता की मौत के सदमे से परिवार उबर भी नहीं पाया था कि वर्ष 2009 में नक्सलियों ने सुबाये के छोटे भाई दुर्ग सिंह तुलामी की भी हत्या कर दी। इस घटना ने परिवार को पूरी तरह तोड़ दिया। डर के कारण उन्हें गांव छोड़कर अलग-अलग जगहों पर शरण लेनी पड़ी।
सुबाये की शादी पास के गांव में रणबीर सिंह सलामे से हुई, जो शिक्षाकर्मी थे। 2014 में एक मड़ई के दौरान नक्सलियों ने उनके पति पर सरेआम गोली चला दी। सिर और पीठ पर लगी गोलियों से उनकी मौके पर ही मौत हो गई। उस समय सुबाये चार महीने की गर्भवती थीं और उनकी चार साल की बेटी उनके साथ थी।
घटना के बाद की स्थिति और भी भयावह थी। गोलीबारी के बाद पूरा इलाका खाली हो गया। सुबाये अपनी छोटी बच्ची के साथ पूरी रात अपने पति के शव के पास बैठी रहीं। उन्होंने पुलिस को फोन कर सूचना दी, लेकिन कोई मदद नहीं पहुंची। अगले दिन उन्होंने खुद लोगों को बुलाकर पोस्टमार्टम और रिपोर्ट की प्रक्रिया पूरी करवाई।
इन सभी घटनाओं के बाद से सुबाये सलामे लगातार न्याय और पुनर्वास के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रही हैं। उन्होंने कलेक्टर और एसपी कार्यालय में कई बार गुहार लगाई, लेकिन अब तक उन्हें समुचित राहत नहीं मिल पाई।
सुबाये की मांग है कि उन्हें पुनर्वास नीति के तहत मकान दिया जाए, बच्चों की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति सुनिश्चित की जाए और परिवार को उचित मुआवजा मिले। उनका कहना है कि सरकार की योजनाएं जमीन पर सही तरीके से लागू नहीं हो रहीं।
यह मामला केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था और पुनर्वास नीतियों की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े करता है। इतने वर्षों बाद भी यदि पीड़ित को न्याय नहीं मिलता, तो यह व्यवस्था की गंभीर खामी को दर्शाता है।
सुबाये सलामे की कहानी दर्द, साहस और संघर्ष की मिसाल है। उन्होंने अपनों को खोने के बावजूद हार नहीं मानी और आज भी अपने हक के लिए लड़ रही हैं। उनकी यह जंग न सिर्फ उनके परिवार के लिए, बल्कि उन तमाम लोगों के लिए भी एक आवाज है, जो नक्सली हिंसा का शिकार हुए हैं।