Gaming Addiction: गाजियाबाद की घटना ने गेमिंग लत के खतरनाक साइड इफेक्ट्स को उजागर कर दिया है।
मोबाइल स्क्रीन पर चल रहा एक गेम… और असल जिंदगी में टूटता बचपन। गाजियाबाद की दर्दनाक घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। यह सिर्फ तीन मासूम बहनों की मौत की कहानी नहीं है, बल्कि उस खामोशी की चीख है, जहां माता-पिता की व्यस्तता और बच्चों का अकेलापन उन्हें वर्चुअल दुनिया के जाल में धकेल देता है। जब घर में वक्त नहीं मिलता, तो मोबाइल गेम्स बच्चों को झूठा सहारा, झूठी जीत और झूठा महत्व देने लगते हैं। यह स्पेशल स्टोरी उसी खतरनाक गेमिंग लत की, जो चुपचाप बचपन निगल रही है… और पूरे समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी बन चुकी है।
आज की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में व्यस्त माता-पिता बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे हैं। नौकरी, घरेलू काम और अपनी व्यस्तताओं में डूबे अभिभावक बच्चों की भावनाओं, सवालों और जरूरतों को अनदेखा कर देते हैं। नतीजा… बच्चे अकेलापन महसूस करते हैं और तुरंत राहत देने वाली वर्चुअल दुनिया (ऑनलाइन गेम्स) की ओर आकर्षित हो जाते हैं।
गेम उन्हें तुरंत सफलता, कंट्रोल और महत्व का अहसास देता है, जो असल जिंदगी में नहीं मिलता। गाजियाबाद में तीन सगी बहनों की मौत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां गेमिंग लत ने उन्हें चरम कदम उठाने पर मजबूर कर दिया। यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है कि माता-पिता अगर समय नहीं देंगे, तो बच्चे गेम के जाल में फंसकर खो जाएंगे।
case- 1. धमतरी (2024) में 16 साल के 10वीं क्लास के छात्र ने पबजी खेलने पर पिता से डांट खाने के बाद कीटनाशक पीकर आत्महत्या कर ली। माता-पिता बोर्ड एग्जाम के कारण स्क्रीन टाइम कम करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन लड़का मोबाइल से चिपका रहता था।
case- 2. जगदलपुर (2024) में एक नाबालिग ने पबजी की लत के कारण मां द्वारा फोन छीनने पर दिवस 2 नदी में कूदकर जान दे दी। सुसाइड हूं। यहां भी माता-पिता की सख्ती और भावनात्मक दूरी नोट में लिखा था कि खेलने नहीं दिया, इसलिए मर रहा मुख्य वजह बनी।
अकेले रहना पसंद और सामाजिक गतिविधियों से दूर होना।
पहले मजेदार लगने वाली चीजें (खेलना, पढ़ाई, दोस्ती) छोड़ना।
गेम पर दिन में 2 घंटे से ज्यादा समय बिताना।
दूसरी जरूरी चीजों पर फोकस व एकाग्रता कम होना।
लत छुपाने के लिए तरह-तरह के झूठ बोलना।
जब बच्चे असल जिंदगी में दबाव, असफलता का डर तुलना अकेलापन या नियंत्रण की कमी महसूस करते हैं, तो गेमिंग उन्हें तुरंत उपलब्धि, कंट्रोल का भ्रम और तनाव से राहत देता है। पैरेंट्स को चाहिए कि वे सहयोगी संवाद करें, कारण समझाएं, छोटे नियम मिलकर बनाएं - शकुंतला दुल्हानी, असिस्टेंट प्रोफेसर, मनोविज्ञान विभाग, दुर्गाकॉलेज
यह रॉग पेरेंटिंग का इशारा है। माता-पिता व्यस्त हो गए हैं, संयुक्त परिवार टूटे हैं। गेमिंग वैश्विक साजिश जैसी लगती है, लेकिन जिम्मेदारी माता-पिता की है। जबरदस्ती रोकने से विद्रोह बढ़ता है। बच्चे के साथ समय बिताएं और उसके इमोशन को समझें- चिरंजीव जैन, पेरेंटिंग एक्सपर्ट
डोपामाइन हमारे दिमाग के रिवार्ड सर्किट को एक्टिवेट करता है। जब गेम खेलते समय डोपामाइन रिलीज होता है, तो हमें तुरंत खुशी और सफलता का अहसास मिलता है, जिससे हम उस गेम को पसंद करने लगते हैं। बार-बार यह रिलीज होने से लत लग जाती है। दिमाग को लगातार हाई रिवार्ड' की आदत पड़ जाती है। माता-पिता बच्चे की भावनाओं को समझें। स्क्रीन कम करने पर शुरुआत में पैनिक अटैक, एंग्जायटी या इंपल्सिव बिहेवियर (बिना सोचे एक्शन) दिख सकता है। यह नॉर्मल है, लेकिन धैर्य रखें- डॉ. सुरभि दुबे, एसोसिएट प्रोफेसर मनोरोग विभाग, नेहरू मेडिकल कॉलेज
धीरे-धीरे स्क्रीन टाइम कम करें। रोजाना 10-30 मिनट कम करने का टारगेट बनाएं।
बच्चे को फिजिकल एक्टिविटी (खेल, साइकिलिंग) में शामिल करें।
स्क्रीन के विकल्प दें-हॉथी, किताबें, फैमिली टाइम।
खुद का स्कीन टाइम कंट्रोल करें और बच्चे के साथ इन्वॉल्व रहें।
टारगेट पूरा करने पर छोटे इनाम दें। पसंदीदा खाना या आउटिंग।
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