Geeta Gandbhir Oscar nominations : भारतीय मूल की गीता गांधबीर की फिल्म सनडांस कोलैब ऑस्कर की दो कैटेगिरी में नामांकित हुई है। वह सामाजिक विषयों पर फिल्म बनाने के लिए जानी जाती हैं। आइए इसी बहाने भारत या भारत से जुड़ी उन महिला फिल्म निर्देशकों के बारे में जानते हैं, जिन्होंने सामाजिक और संवेदनशील मुद्दों पर फिल्म बनाकर दुनिया में अपनी मजबूत पहचान बनाई।
Geeta Gandbhir Oscar Nomination : भारत की या भारतीय मूल की महिलाएं फिल्मों में बतौर एक्टिंग दुनिया में अपना नाम बुलंद कर चुकी हैं, लेकिन वह अब फिल्मों में निर्देशन के झंडे भी गाड़ने में कामयाब हो रही हैं। अभी भारतीय मूल की निर्देशक गीता गांधबीर (Geeta Gandbhir) का नाम ऑस्कर की दो कैटेगिरी में नामांकित हुई है।
Indian Women Film Directors: यूं तो निर्देशन के क्षेत्र में कम महिलाएं आईं, लेकिन जिन्हें मौका मिला उन्होंने अपना परचम लहराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आइए सामाजिक विषयों पर फिल्में निर्देशित करनी वाली महिलाओं के बारे में जानते हैं।
गीता गांधबीर (Geeta Gandbhir) एक प्रसिद्ध भारतीय-अमेरिकी डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता, निर्देशक और संपादक हैं। गीता के मां और पिता 1960 के दशक में भारत से अमेरिका जा बसे। वह भारतीय माता-पिता के घर 18 सितंबर 1950 में जन्मीं। वह पिछले 20 वर्षों से अधिक के करियर में सामाजिक न्याय के मुद्दों पर फिल्में बनाकर अपनी पहचान बनाई है। उन्होंने कई एमी अवॉर्ड और पीबॉडी अवॉर्ड जीते हैं। गीता के पति निकॉन क्वान्तु (Nikon Kwantu) फिल्म प्रोड्यूसर हैं।
ऑस्कर के नॉमिनेशन 22 जनवरी को घोषित किए जा चुके हैं, जबकि पुरस्कार 15 मार्च 2026 को दिए जाएंगे। पुरस्कार किनको मिलेगा, ऑस्कर की ज्यूरी में शामिल जजों को इस बारे में अभी निर्णय लेना है। हांलांकि, ऑस्कर का नॉमिनेशन मिलना खासतौर पर भारतीय मूल के डायरेक्टर के लिए बड़ी बात मानी जाती है।
गीता गांधबीर की फिल्मों के विषय अक्सर साहसिक होते हैं। उनकी फिल्मों में व्यवस्थागत अन्याय पर रौशनी डालने की कोशिश रहती है। ऑस्कर नॉमिनेटेड सनडांस कोलैब (Sundance Collab) उनकी ऐसी ही एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म है।
नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही इस डॉक्यूमेंट्री में ज़्यादातर पुलिस के बॉडीकैम फुटेज का इस्तेमाल किया गया है। इसमें लॉरिन्ज़ द्वारा एक साल पहले ओवेन्स और उसके बच्चों के बारे में पुलिस को शिकायत करने के लिए फोन करने से लेकर उसकी बेरहमी से हत्या तक की घटनाओं को दिखाया गया है। फ्लोरिडा के "स्टैंड योर ग्राउंड" कानूनों के तहत, अगर किसी निवासी को लगता है कि ऐसा करने से शारीरिक नुकसान को रोका जा सकता है, तो वह दूसरे व्यक्ति पर जानलेवा बल का प्रयोग कर सकता है। इस कानून में मिली छूट ने लॉरिन्ज़ द्वारा ओवेन्स को गोली मारना जायज़ लगा। यह डॉक्यूमेंटरी अमेरिका के समस्याग्रस्त बंदूक कानूनों की पोल भी खुलती है।
'डेविल इज़ बिज़ी' (Devil is Busy) , एचबीओ की एक ओरिजनल डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट फिल्म है जो सिनेमा वेरिटे शैली को अपनाती है। यह फिल्म दर्शकों को जॉर्जिया के अटलांटा में एक महिला स्वास्थ्य क्लिनिक की सुरक्षा प्रमुख ट्रेसी के साथ एक दिन की यात्रा पर ले जाती है, जो नए प्रतिबंधों और लगातार विरोध प्रदर्शनों के बावजूद गर्भपात कराने वाली महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए काम करती है। संक्षेप में यह फिल्म उन कर्मचारियों की दिनचर्या को दर्शाती है जो निवारक जांच, चेकअप और प्रजनन स्वास्थ्य देखभाल सहित कई तरह की चिकित्सा सेवाएं दैनिक खतरों का सामना करते हुए प्रदान करना जारी रखते हैं।
गीता गांधबीर अपनी फिल्म 'द परफेक्ट नेबर' (The Perfect Number) के बारे में एक साक्षात्कार में फिल्म निर्माण के बारे में बताती हैं, 'फिल्म निर्माण, कहानियों को साझा करने के लिए मनुष्यों के लिए सबसे अनोखे और तकनीकी रूप से उन्नत कला रूपों में से एक है… इसे अधिक न्यायसंगत और सुलभ माध्यम बनाने के लिए प्रणाली में मौजूद असमानता को दूर करना महत्वपूर्ण है। हालांकि, यह दुनिया भर के लोगों तक पहुंचने और सांस्कृतिक सेतु बनाने और एक साझा मानवीय कथा का निर्माण करने का एक शक्तिशाली उपकरण है।'
गीता गांधबीर से पहले भारतीय महिला निर्देशकों में सईं परांजपे, मीरा नायर ने अपना परचम बहुत ऊंचा लहराया। उनके अलावा किरण राव और नंदिता दास का नाम भी भारतीय महिला निर्देशकों में बहुत इज्जत के साथ दुनिया के सिनेमाई मंचों पर लिया जाता है।
Sai Paranjpye : सई परांजपे ने अपनी कहानियों में संवेदनशीलता और हल्के-फुल्के हास्य से भारतीय सिनेमा को नया आयाम दिया। उनका स्थान हिंदी के साथ मराठी फिल्मों में काफी ऊंचा है। वह रूसी पिता यूरी स्लेप्टज़ॉफ और मराठी मां शकुंतला परांजपे की बेटी थीं। पिता चित्रकार और मां मराठी और हिंदी फिल्मों की अभिनेत्री थीं। शकुंतला बाद में राज्यसभा सांसद बनीं और पद्म भूषण से सम्मानित भी हुईं।
सई परांजपे (Sai Paranjpye) ने बच्चों के लिए जादू का शंख (1974) और सिकंदर (1976) जैसी बेहतरीन फिल्में बनाईं। उन्हें दृष्टिहीन स्कूली बच्चों की दुनिया को लेकर स्पर्श (1980) जैसी संवेदनशील फिल्म बनाने के बाद देश और विदेश में पहचान मिली। इस फिल्म के लिए उन्हें नेशल फिल्म फेस्टिवल में दो कैटेगिरी बेस्ट स्क्रीनप्ले और बेस्ट डायरेक्टर का अवॉर्ड मिला था। उनकी निर्देशित चश्मे बद्दूर (1981), कथा (1983) और दिशा (1990) भी गंभीर सामाजिक विषयों को हास्य पुट के साथ पेश करने के चलते काफी लोकप्रियता मिली।
Meera Nair : भारतीय-अमेरिकी मीरा नायर एक प्रसिद्ध फिल्म निर्माता हैं जिनकी फिल्मों ने अपने गंभीर विषयों के चलते हमेशा चर्चा पाई। उनका जन्म ओडिशा के राउरकेला में हुआ था। उनकी पढ़ाई ओडिशा, शिमला और दिल्ली में हुई। हार्वर्ड विश्वविद्यालय से उन्होंने फोटोग्राफी की पढ़ाई की। यहीं उनके क्लासमेट रहे मिच एपस्टीन से प्यार हुआ और बाद में शादी कर ली। हालांकि 10 साल बाद 1987 में ही दोनों का तलाक हो गया। उन्होंने 1988 में दूसरी शादी भारत-युगांडा के राजनीति वैज्ञानिक और मशहूर लेखक महमूद ममदानी से शादी कर ली। मीरा और महमूद के बेटे जोहरान ममदानी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के धुर विरोधी के तौर पर गिने जाते हैं। वह इस समय न्यूयॉर्क के मेयर हैं।
Mira Nair Awards : मीरा की फेमस फिल्मों में मॉनसून वेडिंग, मिसीसिपी मसाला ,क्वीन ऑफ कटवे , द नेमसेक, गोल्ड लॉयन विजेता और सलाम बॉम्बे रही हैं। उनकी फिल्म सलाम बॉम्बे को कई अवॉर्ड मिले। यह फिल्म ऑस्कर के लिए भी नामांकित हुई थी। इसके अलावा इस फिल्म ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म) और कांस फिल्म समारोह में 'गोल्डन कैमरा' पुरस्कार भी जीता था। इस फिल्म में मुंबई के सड़कों और झोपड़पट्टी में रहने वाले लड़कों की कारुणिक दशा का ईमानदारी से दर्शाने के लिए जाना जाता है। मीरा को सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के लिए अकादमी पुरस्कार और अंग्रेजी भाषा में सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए बाफ्टा पुरस्कार के लिए नामांकन मिल चुका है। मीरा नायर की फिल्म क्वीन ऑफ कटवे (2016) फियोना मुटेसी (Phiona Mutesi) की एक सच्ची कहानी पर आधारित फिल्म है। फियोना युगांडा के कंपाला की कटवे नामक एक झुग्गी बस्ती की लड़की थी जो काफी संघर्षों के बाद शतरंज की एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी बनने में सफल हो पाती है।
Nandita Das : नंदिता दास की पहली निर्देशित फिल्म इम्प्रिंट इन क्ले 1993 में आई थी। यह एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म थी। वह अपने फिल्म निर्देशन के कैरियर के बारे में कहती हैं, 'मैंने निर्देशक बनना नहीं चुना। कहानियों ने ही मुझे निर्देशक बनने के लिए प्रेरित किया। मेरी कहानियां उन सभी चीज़ों से जन्म लेती हैं, जो मुझे घेरे रहती हैं।'
इम्प्रिंट इन क्ले के बाद नंदिता की 2008 में पहली निर्देशित फीचर फिल्म फिराक आई। फिराक 2002 के गुजरात दंगों के एक महीने बाद के हालात पर बनाई गई बेहद संवेदनशील फिल्म है। इस फिल्म का प्रीमियर टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में हुई और 20 से अधिक पुरस्कार जीते और उन्हें भारतीय फिल्म निर्माण में एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर के तौर पर स्थापित कर दिया। फिराक के बाद उन्होंने 2018 में दुनिया के मशहूर कहानीकार सआदत हसन मंटो के जीवन पर आधारित फिल्म मंटो और 2023 में डिलीवरी ब्वॉय के जीवन पर आधारि ज़्विगाटो का निर्देशन किया।
किरण राव की निर्देशित फिल्म धोबी घाट (2011) और लापता लेडीज़ (2024) ने काफी सुर्खियां बटोरी। लापता लेडीज को International Indian Film Academy (IIFA) Awards 2025 में सबसे ज्यादा कैटिगरी में अवॉर्ड मिले। इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फीचर फिल्म श्रेणी में एंट्री मिली, लेकिन अंतिम नामांकन सूची में जगह बनाने में नाकाम रहीं।