
Privatization of government companies: देश की सरकारी कंपनियों का निजीकरण किया जा रहा है। सरकार ने एक के बाद एक कई बड़ी सरकारी कंपनियों को प्राइवेट प्लेयर के हाथों में दे दिया है। इसमें आयुर्वेदिक दवाएं बनाने वाली आईएमपीसीएल से लेकर स्टील बनाने वाली नीलाचल इस्पात निगम लिमिटेड और फेरो स्क्रैप निगम लिमिटेड जैसी कंपनियां शामिल हैं। सरकार ने इन कंपनियों की कार्यक्षमता बढ़ाने और खजाने को और मजबूत बनाने के लिए किया है। लेकिन आम आदमी के ऊपर इसका निजीकरण के बाद उनकी जेब पर क्या असर होने वाला है?
आयुष मंत्रालय के अधीन आने वाली कंपनी इंडियन मेडिसिन फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईएमपीसीएल) को लेकर है। यह कंपनी देश में शुद्ध और मानकीकृत आयुर्वेदिक और यूनानी दवाएं बनाने और उनकी सप्लाई करने के लिए जानी जाती थी।कोरोना काल (COVID-19 महामारी) के दौरान IMPCL (इंडियन मेडिसिन फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड) ने देश के लाखों-करोड़ों लोगों की मदद करने में एक बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी।
देश के कोने-कोने में, अस्पतालों में और होम आइसोलेशन में रह रहे मरीजों तक मुफ्त और बहुत कम दामों में पहुंचाया गया। सरकार ने इस सरकारी कंपनी की पूरी 100% हिस्सेदारी और मैनेजमेंट का कंट्रोल प्राइवेट कंपनी मेसर्स स्काईमैप फार्मास्युटिकल्स प्राइवेट लिमिटेड को सौंप दिया है। स्काईमैप ने इसके लिए 121,00,94,400 रुपये की सबसे ऊंची बोली लगाई थी, जो सरकार द्वारा तय किए गए आरक्षित मूल्य से भी ज्यादा थी।
आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति (CCEA) ने नवंबर 2017 में ही इस कंपनी को बेचने की मंजूरी दे दी थी। सितंबर 2023 में कंपनियों से आवेदन मांगे गए, जिसमें कुल 7 कंपनियों ने दिलचस्पी दिखाई। गृह मंत्रालय से सुरक्षा जांच मिलने के बाद सिर्फ दो कंपनियों ने अपनी अंतिम सीलबंद बोलियां जमा कीं। साल 2026 में वित्त मंत्री और सड़क परिवहन मंत्री जैसे दिग्गजों के शामिल होने वाले मंत्रियों ने स्काईमैप फार्मास्युटिकल्स के नाम पर मुहर लगा दी।
निजीकरण की इस रेस में नीलाचल इस्पात निगम लिमिटेड (NINL)। यह ओडिशा में स्थित एक बहुत बड़ी स्टील कंपनी थी। ओडिशा के कलिंगनगर में स्थित यह संयंत्र भारी घाटे और रुपये 6,600 करोड़ से अधिक के कर्ज के कारण मार्च 2020 से बंद पड़ा था, जिसके रणनीतिक विनिवेश को सरकार ने जनवरी 2020 में मंजूरी दी थी। लंबी और पारदर्शी प्रक्रिया के बाद, जनवरी 2021 में बोलियां मंगाई गईं और जिंदल व जेएसडब्ल्यू जैसी दिग्गज कंपनियों को पछाड़ते हुए टाटा स्टील लॉन्ग प्रोडक्ट्स लिमिटेड ने रुपये12,100 करोड़ की सबसे ऊंची बोली लगाकर इसे खरीद लिया। इस सौदे के तहत कंपनी के 93.71% शेयर टाटा को ट्रांसफर कर दिए गए।
इस फैसले पर केंद्रीय मंत्रियों नितिन गडकरी, निर्मला सीतारमण और पीयूष गोयल के समूह ने मुहर लगाई। इस निजीकरण से न केवल बंद पड़े प्लांट को नई पूंजी, आधुनिक तकनीक और बेहतर मैनेजमेंट के जरिए दोबारा शुरू किया जाएगा, बल्कि इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। कर्मचारियों के हितों की सुरक्षा के लिए उनकी बकाया राशि को सबसे पहले चुकाने का नियम बनाया गया है, और टाटा कंपनी अगले एक साल तक किसी कर्मचारी को निकाल नहीं सकती साथ ही वीआरएस (VRS) देने पर भी सरकारी नियम ही लागू होंगे।
इस लिस्ट में फेरो स्क्रैप निगम लिमिटेड (FSNL) भी है। FSNL कंपनी स्टील प्लांटों से निकलने वाले कचरे (स्क्रैप) को रीसायकल करने और उससे कीमती लोहा अलग करने का काम करती है। सरकार ने इसकी भी 100% हिस्सेदारी एक विदेशी जापानी कंपनी कोनोइके ट्रांसपोर्ट कंपनी लिमिटेड (Konoike Transport & Co. Ltd.) को बेच दी है। निवेश और लोक संपत्ति प्रबंधन विभाग DIPAM की लिस्ट में यह सौदा पूरी तरह दर्ज हो चुका है।
निजीकरण के इस पूरे खेल में देश का सबसे चर्चित और बड़ा सौदा एयर इंडिया (Air India) का रहा है। सालों तक सरकारी खजाने पर भारी पड़ रही और कर्ज के दलदल में डूबी सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया को सरकार ने पूरी तरह से प्राइवेट हाथों में सौंप दिया। इसे ग्रुप टाटा (Tata Group) ने खरीदा। टाटा ने करीब 18,000 करोड़ रुपये की बोली लगाकर एयर इंडिया का मालिकाना हक और पूरा मैनेजमेंट अपने हाथ में ले लिया।
बिजली क्षेत्र (Power Sector) के निजीकरण और नए बिजली संशोधन बिल के आने से आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी पर बहुत बड़ा असर पड़ा है। दिल्ली, मुंबई और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बिजली वितरण प्राइवेट कंपनियों के हाथों में जाने के बाद जहां पहले सरकारी बिजली बोर्ड घाटा सहकर भी घरेलू उपभोक्ताओं और किसानों को सस्ती या मुफ्त बिजली देते थे और बिल बकाया होने पर भी रियायत मिलती थी, लेकिन अब प्राइवेट कंपनियों के आने से सर्विस तो सुधरी है और बिजली कटौती कम हुई है, लेकिन आम जनता को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।
आंकड़ों के मुताबिक, फिक्स्ड चार्ज, रेगुलेटरी असेट्स और फ्यूल सरचार्ज जैसे नए खर्चों के जुड़ने से बिजली के बिलों में 30% से 50% तक की भारी बढ़ोतरी हुई है। गर्मियों का बिल पहले ₹1,000 आता था, वह अब बढ़कर ₹2,000 से ₹3,000 तक पहुंच रहा है। इसके अलावा, स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगने के बाद से खाते का बैलेंस खत्म होते ही बिजली तुरंत कट जाती है और बिल में देरी होने पर भारी जुर्माना भी वसूला जाता है। साथ ही, किसानों को मिलने वाली सब्सिडी का ढांचा बदलने से खेती की लागत भी बढ़ गई है, इस भारी-भरकम बिल अब आम आदमी के बजट बढ़ रहा है।
सरकारी कंपनियों के निजीकरण से आम आदमी की जेब पर सीधा और भारी असर पड़ा है, क्योंकि अब सब्सिडी खत्म हो रही है और छिपे हुए खर्चे (हिडन चार्जेस) बढ़ रहे हैं। एयर इंडिया के टाटा के पास जाने के बाद त्योहारों के सीजन में हवाई टिकटें दोगुनी-तिगुनी महंगी मिल रही हैं। सामान के एक्स्ट्रा वजन पर भी अलग से पैसे वसूले जाते हैं। NINL और स्टील कंपनियों के निजीकरण से लोहा और कच्चा माल महंगा हो गया है, जिसके कारण आम आदमी के लिए घर बनाने का बजट 10% से 15% तक बढ़ गया है और गाड़ियां खरीदना भी उसकी पहुंच से दूर होता जा रहा है।
सीधे तौर पर कहा जाए तो प्राइवेट कंपनियां मुनाफे के लिए प्रोडक्ट्स के दाम बढ़ा देती हैं। ये कीमत कोई और नहीं आम आदमी चुकाता है।