
Divorce Cases India : हमारे समाज में बुजुर्ग दंपतियों को बरगद की उस छांव की तरह देखा जाता है, जिसकी छांव में पूरा परिवार फलता-फूलता है। बालों की सफेदी, चेहरे की झुर्रियां और हाथों का कंपन इस बात की गवाही देते आए हैं कि इन्होंने जिंदगी के हर तूफान को साथ मिलकर झेला है। लेकिन, जयपुर की पारिवारिक अदालतों के गलियारों से गुजरते हुए जब आप नजर डालते हैं, तो बरगद की उस छांव तले एक गहरा सन्नाटा और दरारें साफ दिखाई देती हैं।
अदालत के बाहर बैठे कुछ चेहरे आपको सोचने पर मजबूर कर देते हैं। ये चेहरे उन युवाओं के नहीं हैं जिनकी शादी को अभी दो या तीन साल हुए हों और जरा-सी अनबन पर कोर्ट पहुंच गए हों। ये तो वे अधेड़ और बुजुर्ग चेहरे हैं, जिन्होंने जिंदगी के चार या पांच दशक एक साथ गुजार दिए हैं। जिन हाथों में इस उम्र में नाती-पोतों की उंगलियां होनी चाहिए थीं, उन हाथों में आज अदालत की फाइलों के पुलिंदे हैं। जिन आंखों में पुरानी यादों की चमक होनी चाहिए थी, उनमें एक-दूसरे के प्रति गहरी उदासीनता या कानूनी दांव-पेच की थकान है।
वैश्विक स्तर पर जिसे 'ग्रे डिवोर्स' (Gray Divorce) यानी '50 की उम्र पार कर चुके सफेद बालों वाले दंपतियों का तलाक' कहा जाता है, वह अब पश्चिमी देशों की चौखट लांघकर भारत के पारंपरिक सामाजिक ताने-बाने के भीतर तक प्रवेश कर चुका है। इसे 'सिल्वर स्प्लिटर्स' (Silver Splitters) भी कहा जाता है। जयपुर की फैमिली कोर्ट्स में वर्तमान में करीब 8,750 से अधिक वैवाहिक मामले लंबित हैं, और चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से लगभग 20 प्रतिशत मामले ऐसे दंपतियों के हैं, जिनकी उम्र 50 वर्ष हो चुकी है। यह महज एक कानूनी आंकड़ा नहीं है; यह हमारे सामाजिक मूल्यों, बदलते पारिवारिक ढांचे और रिश्तों के बिखरते वजूद की एक मर्मस्पर्शी और गहरी कहानी है।
कानून की शब्दावली में इन्हें 'याचिकाकर्ता' और 'अप्रतिवादी' कहा जाता है, लेकिन अगर कानून के चश्मे को उतारकर देखें, तो यह किसी ज़माने में सजे सपनों के आशियाने के ढहने की दास्तानें हैं।
अंबावाडी के रहने वाले इस बुजुर्ग दंपति में पति की उम्र 77 वर्ष और पत्नी की उम्र 76 वर्ष। जीवन के इस मोड़ पर जहां इंसान को सहारा और आत्मीयता की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, वहाँ यह जोड़ा पारिवारिक कोर्ट संख्या-3 में एक-दूसरे से कानूनी रूप से अलग होने की अर्जी लेकर पहुंचा है। इनके दो बच्चे हैं, जो अपने-अपने परिवारों में सेटल हैं, और घर में पोते-पोतियाँ भी खेल रहे हैं।
अदालत में दाखिल अपनी याचिका में उन्होंने लिखा, 'हमारे विचार आपस में नहीं मिलते। हम पिछले दस वर्षों से अलग-अलग अजनबियों की तरह जी रहे हैं। अब हम इस नाममात्र के रिश्ते को औपचारिकता से भी मुक्त करना चाहते हैं। सोचिए, जिस रिश्ते ने 50 साल से अधिक का सफ़र तय कर लिया, जहां पोते-पोतियाँ भी बड़े हो गए, वहां 10 साल का अलगाव और 77 साल की उम्र में कोर्ट के चक्कर काटना किस सामाजिक बिखराव की ओर इशारा करता है?
दूसरा मामला पारिवारिक कोर्ट संख्या-1 का है। अजमेर रोड निवासी पति की उम्र 69 साल और पत्नी की उम्र 65 साल है। इनकी शादी 1982 में हुई थी। इनके तीन बच्चे है, लेकिन इन दोनों के बीच पिछले तीन दशकों (30 साल) से कानूनी लड़ाइयां चल रही हैं। जवानी के जिस दौर में उन्हें मिलकर बच्चों का भविष्य बनाना था, वह दौर मुकदमों की तारीखें भुगतने में बीत गया। अब 69 वर्ष की आयु में पति ने अदालत में याचिका दायर कर 'मानसिक क्रूरता' के आधार पर तलाक मांगा है। याचिका में दावा किया गया है कि दोनों बीते 30 वर्षों से अलग रह रहे हैं और अब इस रिश्ते का कोई वजूद नहीं बचा है। जीवन के आख़िरी पड़ाव पर भी जब सुलह की गुंजाइश खत्म हो जाती है, तो कानून की चौखट ही एकमात्र सहारा बनती है।
पति जब तक नौकरी या व्यापार में व्यस्त रहता है, वह दिन का 10-12 घंटा घर से बाहर बिताता है। पत्नी की अपनी दिनचर्या होती है। दोनों का एक-दूसरे से सामना सुबह और शाम को ही होता था। लेकिन 60 वर्ष की उम्र के आसपास जब रिटायरमेंट होता है, तो अचानक जीवनशैली का ढांचा बदल जाता है। अब दोनों को 24 घंटे एक ही छत के नीचे साथ रहना पड़ता है। ऐसी स्थिति में अक्सर देखा गया है कि एक-दूसरे की छोटी-छोटी आदतों पर टोकना, वर्चस्व की लड़ाई, संवादहीनता और स्पेस न मिलना जैसे मुद्दे उग्र रूप ले लेते हैं। जो समय शांति से बिताने का होना चाहिए था, वह आपसी खींचतान में बीतने लगता है और मामला अदालत तक पहुंच जाता है।
अधेड़ और बुजुर्ग उम्र के इन मुकदमों से निपटना पारिवारिक अदालतों और अधिवक्ताओं के लिए भी एक बेहद संवेदनशील और जटिल काम होता है। एडवोकेट डी.एस. शेखावत के अनुसार, 'अधेड़ और बुजुर्ग उम्र के तलाक के मुकदमों की प्रकृति युवा जोड़ों के मामलों से बिल्कुल भिन्न होती है। जब 25-30 साल का कोई युवा जोड़ा तलाक के लिए आता है, तो उनके सामने मुख्य मुद्दा बच्चों की कस्टडी या शुरुआती भरण-पोषण का होता है। लेकिन 50 से अधिक उम्र के मामलों में कानूनी पेच बहुत ज़्यादा गहरे और उलझे हुए होते हैं।
उन्होंने कहा कि युवा जोड़ों के मामलों में मीडिएटर्स के पास यह गुंजाइश रहती है कि वे उन्हें समझाएं, उनके गुस्से को शांत करें और बच्चों के भविष्य का हवाला देकर उनके बीच समझौता करा दें। लेकिन 50 या इससे ज्यादा उम्र के दंपतियों के मामलों में मध्यस्थता अक्सर विफल हो जाती है। कारण यह है कि ये लोग किसी क्षणिक गुस्से में कोर्ट नहीं आते; वे पिछले 15-20 सालों से घुट रहे होते हैं और पूरी तरह सोच-समझकर, मानसिक रूप से अंतिम फैसला करके ही अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं। उनकी मानसिकता इतनी कठोर हो चुकी होती है कि उन्हें सुलह के लिए राजी करना लगभग असंभव हो जाता है।