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वैज्ञानिकों के लिए मध्य प्रदेश बन रहा इंसान-वन्यजीव सहअस्तित्व की प्रयोगशाला!

Human Wildlife Conflict and Coexistence: मध्य प्रदेश वन्यजीव संरक्षण का ही नहीं बल्कि, समृद्धता का भी उदाहरण है। टाइगर, चीता, तेंदुआ, वुल्फ, वल्चर स्टेट में पहले से संरक्षित वन क्षेत्र, ऐतिहासिक और पुराने वाइल्डलाइफ कॉरिडोर हैं। इसके बावजूद मानव और वन्यजीव संघर्ष बढ़े हैं। अब इनके सहअस्तित्व को लेकर राज्य के सामने यह परीक्षा की घड़ी होगी कि वह अपने वन्यजीवों के लिए सुरक्षित आवाजाही के रास्तों को टूटने-बिखरने से कैसे बचाता है। अगर बचा ले गया तो, यह राज्य देशभर के लिए सुरक्षित सहअस्तित्व का मॉडल बनकर भी उभर सकता है...
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Jul 07, 2026
Human wildlife conflict tiger corridors
Human wildlife conflict tiger corridors: इंसान-वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष में सहअस्तित्व के सवाल पर देशभर के वैज्ञानिकों ने मध्य प्रदेश को माना इंसान-वन्यजीवों के बीच सहअस्तित्व की प्रयोगशाला। (photo: AI Generated)

Human Wildlife Conflict: वन्यजीवों के लिए केवल एक जंगल काफी नहीं, जंगलों के अस्तित्व के प्रहरी माने जाने वाले बाघ, शेर, चीते, तेंदुओं को प्राकृतिक रूप से मिले रास्तों यानी वाइल्डलाइफ कॉरिडोर की जरूरत होती है। जहां ये अपने नए घर खोज सकें, अपना दायरा बढ़ा सकें और सुरक्षित आवाजाही कर सकें। लेकिन जब इन रास्तों के बीच हाईवे, रेलवे लाइन, खदानें और उद्योग या फिर बढ़ती जन आबादी आती है, वहीं इंसान और वन्यजीव आमने-सामने आने लगते हैं। मध्यप्रदेश एक ऐसा वाइल्डलाइफ जोन है, जो वन्यजीवों संरक्षण, उनकी समृद्धता और जैव विविधता के लिए जाना-पहचाना जाता है। अगर हम यह कहें तो गलत नहीं होगा कि देशभर के वैज्ञानिकों के लिए एमपी Human Wildlife Coexistence Landscape बना हुआ है, जहां पहले से ही संरक्षित वन क्षेत्र और प्राकृतिक कॉरिडोर हैं जो, एक से दूसरे जंगल को जोड़े हुए हैं। यदि इन कॉरिडोर की सुरक्षा नहीं की गई, तो आने वाले समय में मानव-वन्यजीव संरक्षण और ज्यादा बढ़ सकते हैं। लेकिन यदि इन्हें बचा लिया गया, तो मध्य प्रदेश दुनियाभर के लिए सहअस्तित्व का एक मॉडल बनकर उभर सकता है। इस वैज्ञानिक पड़ताल में आगे समझते हैं कि आखिर वाइल्डलाइफ कॉरिडोर क्या हैं, ये क्यों टूट रहे हैं और इनका मानव-वन्यजीव संघर्ष से सीधा संबंध क्या है? 'टूटती सहरद' भाग- 2-

मध्य प्रदेश के लिए परीक्षा की घड़ी

देशभर के वन क्षेत्रों की बात की जाए तो अकेला मध्य प्रदेश ही ऐसा वनक्षेत्र है, जो वन्यजीवों में सबसे ज्यादा समृद्ध है और इंसान और जंगली जानवरों के सहअस्तित्व की सबसे बड़ी परीक्षा देने वाला राज्य बन रहा है। इसका बड़ा कारण यहां फैले जंगल, कई बड़े वन्यजीव परिदृश्यों का हिस्सा हैं, जो प्राकृतिक वाइल्डलाइफ कॉरिडोर के जरिए एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

Wildlife Institute of India (WII) और National Tiger Conservation Authority (NTCA) द्वारा तैयार Connectivity for Tiger Conservation in Central India Landscape में मध्यभारत को देश का सबसे महत्वपूर्ण बाघ परिदृश्य बताया गया है। यह रिपोर्ट बताती है कि कान्हा, पेंच, सतपुड़ा, पन्ना, बांधवगढ़, संजय-डुबरी, नौरादेही और कूनो जैसे संरक्षित वन क्षेत्र एमपी के अलग-अलग जंगल नहीं हैं, बल्कि प्राकृतिक कॉरिडोर के माध्यम से या तो ये एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं या फिर इन्हें जोड़ने के लिए इनका विस्तार किया गया है या फिर जोड़े जाने की दिशा में इन पर काम किया जा रहा है। इसीलिए ये वन क्षेत्र एक विशाल नेटवर्क का हिस्सा हैं। यही नेटवर्क बाघों, तेंदुओं, और अब चीतों को नए क्षेत्रों तक पहुंचने का अवसर देता है और भविष्य में देता भी रहेगा। यही वो कारण हैं कि वैज्ञानिक मानते हैं कि किसी भी संरक्षित क्षेत्र में जब वन्यजीवों की संख्या में इजाफा होता है, तो युवा नर अपनी टैरिटरी खोजने नए इलाकों की तलाश में निकल पड़ते हैं और इन्हीं कॉरिडोर का उपयोग करते हैं। ऐसे में जब इन रास्तों में रेलवे लाइन, सड़कें, खदानें, कृषि भूमि या फिर तेजी से फैलती इंसानी बस्तियां आ जाती हैं, तब मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ती हैं।

यही बात Action Plan for Introduction of Cheetah in India (2022) में भी कही गई। चीता प्रोजेक्ट के इस प्लान में बताया गया है कि कूनो में चीतों की संख्या बढ़ने के साथ उनका फैलाव आसपास के लैंडस्केप तक होगा। इसलिए केवल इस नेशनल पार्क की सीमा सुरक्षा ही काफी नहीं होगी। बल्कि कूनो से बाहर के कॉरिडोर और स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण होगी। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में कूनो से निकले कई चीते मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाकों और राजस्थान की सीमा पार बसे गांवों और खेतों तक पहुंच गए। लेकिन ध्यान देना होगा यह किसी असामान्य व्यवहार का संकेत नहीं, बल्कि नए क्षेत्र की तलाश में होने वाला स्वाभाविक फैलाव है, जिसकी संभावनाएं वैज्ञानिक पहले ही जता चुके थे।

वन्यजीव वैज्ञानिक कमर कुरैशी और यादवेंद्र झाला के शोध बताते हैं कि मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी ताकत उसके संरक्षित वन नहीं, बल्कि उन्हें जोड़ने वाले प्राकृतिक कॉरिडोर हैं। जो कई हिस्सों में बंट गए है। यदि ये सुरक्षित रहे, तो वन्यजीव बिना इंसानी बस्तियों के संपर्क में आए एक जंगल से दूसरे जंगल तक पहुंच सकते हैं। वरना ये प्राकृतिक रास्ते बाधित हुए नहीं कि मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ना तय है।

मध्यप्रदेश के सबसे अहम वाइल्डलाइफ कॉरिडोर

कान्हा-पेंच कॉरिडोर

मध्य भारत का सबसे महत्वपूर्ण टाइगर कॉरिडोर माना जाता है कान्हा-पेंच कॉरिडोर। बाघों की सुरक्षित आवाजाही और आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) बनाए रखने में इस कॉरिडोर को सबसे अहम माना जाता है।

सतपुड़ा-मेलघाट कॉरिडोर

मध्यप्रदेश का सतपुड़ा महाराष्ट्र के मेलघाट टाइगर रिजर्व के जंगलों को जोड़ता है सतपुड़ा-मेलघाट कॉरिडोर। यह बाघ, तेंदुआ, भालू और अन्य शाकाहारी वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन का प्रमुख मार्ग माना जाता है। मध्य प्रदेश सरकार ने बैतूल में ताप्ती कंजर्वेशन रिजर्व का गठन किया है। वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए यह कॉरिडोर एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करता है। इस विशाल जंगल में वन्यजीवों की आवाजाही को ट्रैक करने के लिए वन्यजीव संरक्षण ट्रस्ट (WCT) ने भी यहां व्यापक सर्वेक्षण किए हैं। लेकिन यहां चुनौतियां भी कम नहीं हैं। इन वन्यजीवों के प्राकृतिक रास्तों में बुनियादी विकास और पर्यावरण के बीच टकराव की स्थिति यहां बनी रहती है। इटारसी-नागपुर मार्ग पर तीसरी रेलवे लाइन को वन सलाहकार समिति ने मंजूरी दी। यह प्रोजेक्ट सतपुड़ा-मेलघाट कॉरिडोर से होकर गुजरता है।

पन्ना-नौरादेही-कूनो लैंडस्केप

पन्ना-नौरादेही कूनो लैंडस्कैंप को मध्य प्रदेश में वन्यजीव संरक्षण और इकोलॉजी के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण कॉरिडोर माना जाता है। यह रास्ता विंध्य पर्वत श्रंखला के ऊंचे पठारों पर स्थित है। पन्ना टाइगर रिजर्व, नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य और कूनो नेशनल पार्क के बीच वन्यजीवों की आवाजाही को सुरक्षित बनाता है। एनएच 45 (NH 45) पर वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए 'टेबल-टॉप' लाल मार्किंग वाली भारत की पहली वन्यजीव-सुरक्षित सड़क इसी वन्यजीव गलियारे में बनाई गई है। यह नौरादेही और रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व के बीच से गुजरती है। इस वाइल्डलाइफ कॉरिडोर को मध्य भारत के उभरते चीता और बाघ लैंडस्केप के रूप में देखा जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह भविष्य में बड़े मांसाहारी वन्यजीवों की आवाजाही के लिए रणनीतिक क्षेत्र हो सकता है।

बांधवगढ़-संजय-डुबरी कॉरिडोर

मध्य भारत के बाघों के सुरक्षित आवागमन, आनुवंशिक विवधता और फैलाव के दृष्टिकोण से यह कॉरिडोर एक महत्वपूर्ण रास्ता है, जो छत्तीसगढ़ के जंगलों तक फैला है। उत्तर में संजय डुबरी और दक्षिण-पश्चिम में बांधवगढ़ को जोड़ने वाला यह ऐतिहासिक मार्ग वर्तमान में कई जगह से खंडित हो चुका है। वन विभाग ने इसीलिए इसे बफर जोन के रूप में अधिसूचित किया है।

द कॉर्बेट फाउंडेशन जैसे संगठन इस कॉरिडोर की पारिस्थितिक सेहत को सुधारने और वनों की बहाली को लेकर एक्टिव बने हुए हैं। वहीं वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर विभाग ब्यौहारी, गोदावल और जयसिंहनगर समेत करीब 105 स्थानों पर सीसीटीवी कैमरों से नजर रखे हुए है। यही नहीं बांधवगढ़ में बाघों का घनत्व ज्यादा है। ऐसे में यही प्राकृतिक रास्ता तय कर कई बाघ संजय-डुबरी और आगे पलामू टाइगर रिजर्व झारखंड का सफर तय करते हैं। बाघों के इस वाइल्डलाइफ कॉरिडोर के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनते हैं यहां स्थित 200 से ज्यादा गांव, खनन और बढ़तीं मानवीय गतिविधियां। इन पर अक्सर पर्यावरणविद और अधिकारी चर्चा भी करते हैं।

सबसे बड़ी चुनौती

WII की कनेक्टिंग टाइगर पॉपुलेशन्स फॉर लॉन्ग टर्म कंजर्वेशन (CTPLTC) रिपोर्ट के अनुसार मध्य भारत के टाइगर कॉरिडोर देश की बाघ आबादी की आनुवंशिक विविधता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वहीं वाइल्डलाइफ कंजरवेशन ट्रस्ट (WCT) के विश्लेषण के मुताबिक मध्य भारत में सड़क, रेलवे, नहर, खनन और जैसी अन्य रैखिक परियोजनाएं कॉरिडोर पर सबसे बड़ा दबाव बना रही हैं। एक अध्ययन में सामने आया कि लगभग 1,700 प्रस्तावित परियोजनाओं में से 399 को टाइगर कॉरिडोरों के लिए संभावित खतरा माना गया। इनमें 399 में से 96 परियोजनाएं सीधे तौर पर मध्यप्रदेश के एक्टीव कॉरिडोरों को प्रभावित कर सकती थीं।

सबसे बड़ा वन्यजीव लैंडस्केप

  1. मध्यप्रदेश के जंगल केवल अलग-अलग टाइगर रिजर्व नहीं हैं, बल्कि कान्हा, पेंच, सतपुड़ा, बांधवगढ़, पन्ना, संजय-डुबरी, नौरादेही, रातापानी और कूनो जैसे क्षेत्र प्राकृतिक कॉरिडोर के जरिए एक-दूसरे से जुड़े हैं और विशाल Central India Landscape का हिस्सा हैं। यही स्थिति इसे देश का सबसे महत्वपूर्ण सह-अस्तित्व वाला परिदृश्य बनाती है।
  1. एक साथ कई बड़े शिकारी (Top Predators): देश में शायद ही कोई दूसरा राज्य हो जहां बाघ, तेंदुआ, चीता, भेड़िया, भालू और कई क्षेत्रों में हाथियों की आवाजाही एक ही लैंडस्केप में देखने को मिलती हो। इससे सह-अस्तित्व और प्रबंधन की चुनौतियां भी सबसे जटिल हो जाती हैं।
  2. कॉरिडोर की असली परीक्षा - यहां बड़ी संख्या में वन्यजीव संरक्षित क्षेत्रों से निकलकर वन क्षेत्र, राजस्व भूमि, खेतों और गांवों से होकर दूसरे जंगलों तक पहुंचते हैं। वैज्ञानिक इसे फंक्शनल कनेक्टिविटी की वास्तविक परीक्षा मानते हैं।
  3. विज्ञान आधारित निगरानी- मध्यप्रदेश में रेडियो-कॉलर, कैमरा ट्रैप, GIS मैपिंग, सैटेलाइट डेटा और लैंडस्केप मॉडलिंग जैसी आधुनिक तकनीकों से वन्यजीवों की आवाजाही का अध्ययन किया जा रहा है। इन अध्ययनों के आधार पर भविष्य की संरक्षण रणनीतियां तैयार की जा रही हैं।
  4. अब लक्ष्य सिर्फ संरक्षण नहीं, सह-अस्तित्व- विशेषज्ञों का मानना है कि अब चुनौती केवल बाघ या चीते की संख्या बढ़ाने की नहीं है, बल्कि इंसानों और वन्यजीवों के बीच सुरक्षित सह-अस्तित्व सुनिश्चित करने की है। इसलिए मध्यप्रदेश में विकसित होने वाले मॉडल भविष्य में देश के अन्य राज्यों के लिए भी मार्गदर्शक बन सकते हैं।
human wildlife conflict: (फोटो सोर्स: AI Generated )

बढ़ते बाघ… बढ़ती जरूरत: किन नए कॉरिडोरों पर है फोकस?

  1. कुनो–गांधीसागर अंतरराज्यीय कॉरिडोर (मध्यप्रदेश–राजस्थान)कुनो से निकले चीतों की आवाजाही के बाद यह कॉरिडोर प्राथमिकता में आया। NTCA का मानना है कि इससे चीते और अन्य वन्यजीव सुरक्षित रूप से दोनों राज्यों के बीच आवागमन कर सकेंगे।
  2. नौरादेही-कुनो-पन्ना लैंडस्केपWII इस पूरे क्षेत्र को भविष्य के चीता और बाघ लैंडस्केप के रूप में देखता है। उद्देश्य अलग-अलग जंगलों के बीच प्राकृतिक संपर्क बनाए रखना है।
  3. कान्हा-पेंच-सतपुड़ा कनेक्टिविटीयह पहले से मौजूद प्राकृतिक कॉरिडोर है। अब इसका फोकस इसे सुरक्षित रखना और सड़क-रेल परियोजनाओं में वन्यजीव अंडरपास/ओवरपास सुनिश्चित करना है।
  4. बांधवगढ़-संजय-डुबरी-गुरु घासीदास लैंडस्केपमध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के बीच बाघों की आवाजाही के लिए महत्वपूर्ण इस ऐतिहासिक बाघ कॉरिडोर को वैज्ञानिक दीर्घकालिक आनुवंशिक विविधता (genetic connectivity) के लिए जरूरी मानते हैं।

वैज्ञानिक क्यों कह रहे हैं कि अब कॉरिडोर बचाना जरूरी है?

मध्यप्रदेश में बाघों की संख्या लगातार बढ़ी है। कई टाइगर रिजर्व अपनी कैरिंग कैपेसिटी के करीब पहुंच चुके हैं। ऐसे में युवा बाघ नए क्षेत्र खोजने निकलते हैं। यदि प्राकृतिक कॉरिडोर सुरक्षित नहीं होंगे, तो उनके गांवों और कृषि क्षेत्रों में पहुंचने तथा मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की आशंका भी बढ़ेगी। इसी कारण राज्य सरकार ने भी WII से विभिन्न टाइगर रिजर्व की कैरिंग कैपेसिटी का वैज्ञानिक अध्ययन कराने की पहल की है।

भारत के ये लैंडस्केप भी महत्वपूर्ण

सेंट्रल इंडिया लैंडस्केप (मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश)

-भारत का सबसे बड़ा टाइगर कॉरिडोर नेटवर्क है सेंट्रल इंडिया लैंडस्केप। सबसे अधिक बाघों की आवाजाही। MP इसका केंद्रीय हिस्सा माना जाता है।

वेस्टर्न घाट (कर्नाटक–केरल–तमिलनाडु)

  • हाथियों के सबसे महत्वपूर्ण कॉरिडोर।-Nilgiri Elephant Corridor दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण हाथी परिदृश्यों में गिना जाता है।

उत्तर-पूर्व भारत (असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय)

हाथी, गैंडा, बाघ और बादलों वाले तेंदुए के लिए यह महत्वपूर्ण वाइल्डलाइफ कॉरिडोर है। यहां मानव-हाथी संघर्ष सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हैं।

तराई आर्क लैंडस्केप (उत्तराखंड–उत्तर प्रदेश–नेपाल)

कॉर्बेट टाइगर रिजर्व समेत कई संरक्षित क्षेत्रों को जोड़ने वाला यह कॉरिडोर बाघ और हाथियों की सीमा-पार आवाजाही के लिए जाना जाता है।

गिर लैंडस्केप (गुजरात)

एशियाई शेर अब संरक्षित वन से बाहर कृषि और राजस्व भूमि तक फैल चुके हैं। यहां भी अब 'Coexistence Model' पर काम किया जा रहा है।

Human wildlife conflict wildlife corridor(फोटो AI Generated)

फिर मध्यप्रदेश ही सबसे ज्यादा चर्चा में क्यों?

क्योंकि यहां बाघ, तेंदुआ, चीता, भालू, भेड़िया और कई क्षेत्रों में हाथियों की आवाजाही एक ही लैंडस्केप में होती है। इसी कारण वैज्ञानिक नजरिये से देखें तो यह भारत की सबसे महत्वपूर्ण Human Wildlife Coexistence Laboratory कहा जा सकता है। जहां भविष्य की संरक्षण रणनीतियों की वास्तविक परीक्षा हो रही है।

Published on:
07 Jul 2026 07:00 am