
Hussainiwala History : एक तरफ सतलुज की खामोश धारा है, दूसरी तरफ सरहद की तारबंदी। कहीं रेल पुल के टूटे पिलर अतीत की गवाही दे रहे हैं तो कुछ ही दूरी पर तीन शहीदों की समाधियां सिर झुकाने को मजबूर करती हैं। और इन सबके बीच खड़ा है हुसैनीवाला। एक ऐसा नाम, जिसे आजादी, विभाजन और युद्ध ने बार-बार अपनी कहानी में लिखा। यहां कभी ट्रेनें दौड़ती थीं। फिर देश बंटा, पुल टूटा और पटरी इतिहास बन गई। इसी मिट्टी ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की आखिरी रात देखी। आज यहां जवान सरहद की रखवाली करते हैं। हुसैनीवाला को इसलिए सिर्फ नक्शे पर एक सीमा चौकी समझना उसके पूरे इतिहास को छोटा कर देना होगा।
आज हुसैनीवाला का नाम सुनते ही सबसे पहले सीमा और शहीदों की याद आती है, लेकिन कभी इसकी पहचान रेल से भी थी। फिरोजपुर से लाहौर के बीच रेल संपर्क था और हुसैनीवाला इसी मार्ग का महत्वपूर्ण हिस्सा था। सतलुज पर बने रेल पुल से होकर ट्रेनें गुजरती थीं। यात्री आते-जाते थे, सामान की आवाजाही होती थी और यह इलाका दोनों तरफ के लोगों को जोड़ने वाले रेल नेटवर्क का हिस्सा था। उस समय आज जैसी अंतरराष्ट्रीय सीमा और तारबंदी नहीं थी। फिर 1947 आया। देश बंटा। नक्शे पर लकीर खिंची और हुसैनीवाला का भूगोल बदल गया। जो रास्ता कभी दो शहरों को जोड़ता था, वही रास्ता बाद में दो देशों की सीमा का हिस्सा बन गया।
विभाजन और बाद के भारत-पाक युद्धों ने पुराने रेल ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया। रेल लाइन उखड़ गई और उस रास्ते पर ट्रेन की आवाज आनी बंद हो गई। लेकिन कहानी पूरी तरह खत्म नहीं हुई। पुराने रेल पुल के पिलर आज भी वहां मौजूद हैं। कई पिलरों पर अब बिजली के पोल लगे दिखाई देते हैं। पटरी नहीं है, रेल नहीं है, लेकिन पिलर आज भी बताते हैं कि कभी यहां से ट्रेन गुजरती थी। सतलुज के इस पार बाद में नया हुसैनीवाला रेलवे स्टेशन बनाया गया। यहां आकर उत्तर रेलवे की सीमा समाप्त होती है। यानी एक ही हुसैनीवाला नाम के साथ पुराने और नए स्टेशन की कहानी जुड़ी है। एक इतिहास के उस पार छूट गया और दूसरा बदलते समय के साथ इस पार खड़ा हुआ।
हुसैनीवाला के रेल इतिहास की सबसे दिलचस्प कड़ी यह है कि यहां रेल पूरी तरह गायब नहीं हुई है। जिला मुख्यालय फिरोजपुर से हुसैनीवाला के नए स्टेशन तक दैनिक, साप्ताहिक या मासिक नहीं, बल्कि साल में सिर्फ एक बार ट्रेन चलती है। आजादी से पहले फिरोजपुर से रेलवे लाइन कसूर होते हुए लाहौर तक जाती थी। इसी रास्ते से पंजाब मेल भी गुजरती थी। विभाजन के बाद लाहौर तक रेल संपर्क बंद हो गया और ट्रेनें फिरोजपुर तक सीमित हो गईं। अब हर साल 23 मार्च, शहीद दिवस पर फिरोजपुर से हुसैनीवाला के बीच विशेष ट्रेन चलाई जाती है। यानी जिस रेल मार्ग की पहचान कभी लाहौर तक पहुंचने वाली ट्रेनों से थी, आज वही रेल शहीदों की स्मृति में साल में एक दिन हुसैनीवाला तक पहुंचती है। नए हुसैनीवाला रेलवे स्टेशन पर उतरकर यात्री पैदल या सड़क मार्ग से हुसैनीवाला बॉर्डर तक पहुंच सकते हैं।
हुसैनीवाला की सबसे बड़ी पहचान हालांकि रेल नहीं, बल्कि शहीदों की समाधियां हैं। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी की सजा सुनाई थी। लाहौर जेल में तीनों को निर्धारित तारीख से पहले ही फांसी दे दी गई। इसके बाद उनके शवों को रात के समय जेल से बाहर निकालकर हुसैनीवाला के पास सतलुज किनारे लाया गया। वहां जल्दबाजी में अंतिम संस्कार करने का प्रयास किया गया। जब आसपास के ग्रामीणों को इसकी जानकारी हुई तो वे मौके पर पहुंचे। बाद में इसी क्षेत्र में तीनों शहीदों की समाधियां स्थापित की गईं। आज यहां शहीद स्मारक और समाधियां मौजूद हैं। जिस जमीन पर कभी रेल के पहिए दौड़े थे, वही जमीन बाद में स्वतंत्रता आंदोलन के तीन महान क्रांतिकारियों की अंतिम स्मृति स्थल बन गई।
विभाजन के समय हुसैनीवाला पाकिस्तान के हिस्से में चला गया था। लेकिन इसका महत्व सामान्य सीमा क्षेत्र जैसा नहीं था। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत से जुड़ी स्मृतियों के कारण यह स्थान भारत के लिए विशेष महत्व रखता था। बाद में भारत-पाकिस्तान के बीच क्षेत्र का आदान-प्रदान हुआ और हुसैनीवाला भारत में वापस आया। इसके बदले पाकिस्तान को भारत के 12 गांव दिए गए। इस तरह हुसैनीवाला की कहानी सिर्फ आजादी और शहादत की नहीं है। यह विभाजन के बाद बदले भूगोल की भी कहानी है। आज यहां बीएसएफ की रिट्रीट सेरेमनी होती है। शान-ए-हिंद गेट, शहीद स्मारक, समाधियां और पार्क इस क्षेत्र को विशेष पहचान देते हैं।