India Endangered Birds: भारत में कुछ पक्षियों का अस्तित्व खतरे में आ चुका था, लेकिन अच्छी बात है कि उनका कुनबा बढ़ने लगा है। पक्षियों का रहना जंगलों, नदियों के साथ इंसानों के लिए कैसे जरूरी है, जानिए।
Endangered Birds of India: भारत में कुछ पक्षी विलुप्तप्राय की श्रेणी में आ चुके हैं। हालांकि उनके अस्तित्व को खतरे में पड़ता देख इंसानों ने उसे बचाने के लिए कुछ प्रयास किए हैं, जिसके चलते उसकी आबादी एक बार फिर से बढ़ने लगी है। इनकी आबादी को अभी संतुष्टजनक तो नहीं कहा जा सकता है, लेकिन उम्मीद बंधने लगी है। भारत में गोडावण पक्षी (Great Indian Bustard), पहाड़ी मैना (Hill Myna) और गिद्ध (Indian vulture) विलुप्तप्राय की स्थिति में आ चुका था, लेकिन अब इनका कुनबा बढ़ने लगा है। आइए इन विलुप्तप्राय पक्षियों की कहानी के जरिए यह समझने की कोशिश करते हैं कि प्रकृति एक-दूसरे जीव के मेल से चलती है। जीव-जंतुओं का अस्तित्व एक-दूसरे पर निर्भर करता है।
गोडावण भारत का एक अत्यंत दुर्लभ और विलुप्तप्राय पक्षी है। यह पक्षी राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और अन्य शुष्क क्षेत्रों में व्यापक रूप से पाया जाता था। इसे राजस्थान का राज्य पक्षी भी घोषित किया जा चुका है। पिछले कुछ दशकों में इसकी संख्या में तेजी से गिरावट आई है, जिससे इसके संरक्षण और विकास के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। अब कुछ महीनों से इसकी आबादी बढ़ने की सकारात्मक खबरें आने लगी हैं।
भारत में 1950–1960 के दशक में गोडावण की संख्या लगभग 1,200 से 1,500 के बीच थी। इसका शिकार किए जाने और करंट लगने और इसके आवास नष्ट होने की चलते इसकी संख्या तेजी से घटती गई। वर्ष 2000 के बाद यह संख्या घटकर लगभग 200 से भी कम रह गई। 2018–2020 के आसपास आते-आते गोडावण की संख्या घटकर सिर्फ 100–150 ही रह गई थी। गोडावण अत्यंत संकटग्रस्त (Critically Endangered) श्रेणी में आ गया। हाल के वर्षों में (2024–2025 के आसपास) अनुमान है कि जंगली गोडावण (wild Great Indian Bustard) की संख्या लगभग 120–150 के बीच है और कैप्टिव ब्रीडिंग (प्रजनन केंद्रों) में भी लगभग 30–40 पक्षी पाले जा रहे हैं। हाल ही छपी एक खबर के अनुसार इसकी संख्या 200 पार हो चुकी है। हालांकि अभी भी यह संख्या बहुत कम है।
| समयावधि | अनुमानित संख्या | स्थिति |
| 1950 - 1960 | 1,500 | स्वस्थ और विस्तृत आबादी |
| 2000 के बाद | < 200 | भारी गिरावट (चिंताजनक) |
| 2018 - 2020 | 100 - 150 | विलुप्ति के सबसे करीब (क्रिटिकल) |
| 2024 - 2025 | 180 - 190 | संरक्षण प्रयासों से सुधार |
| वर्तमान (2026) | 200+ | आशा की नई किरण |
गोडावण के प्राकृतिक आवास राजस्थान और गुजरात, जहां खुले घास के मैदान थे, वहां इनकी आबादी बहुत ज्यादा थी। धीरे-धीरे इनके आवास पर इंसानों ने कब्जा जमाया और वहां खेती, उद्योग और शहरीकरण के चलते बर्बाद हो गए। पिछले कुछ वर्षों में सरकार और पर्यावरण संगठनों ने मिलकर गोडावण संरक्षित क्षेत्र विकसित किए हैं और गोडावण को सुरक्षित वातावरण प्रदान किया गया। इसके अलावा, इन इलाकों से गुजरने वाली उच्च वोल्टेज बिजली की तारों के चलते करंट लगने से मौत होने लगी। इस समस्या के समाधान के लिए तारों को भूमिगत करने या उन पर विशेष मार्कर लगाने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। यह पहल गोडावण के संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण विकासात्मक प्रयास है।
सरकार ने गोडावण के अस्तित्व को बचाने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण योजना है- प्रोजेक्ट ग्रेड इंडियन बस्टर्ड (Project Great Indian Bustard)। इस योजना के अंतर्गत इसके आवास की सुरक्षा, शिकारियों पर नजर और प्रजनन को बढ़ावा देने जैसे कदम शामिल हैं।
गोडावण के विकास में प्रजनन कार्यक्रम की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। देहरादून स्थित वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (Wildlife Institute of India) और अन्य संस्थाएं कृत्रिम प्रजनन केंद्रों के माध्यम से इनकी संख्या बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं। प्रजनन केंद्रों में अंडों को सुरक्षित वातावरण में सेकर (incubate) इसकी आबादी बढ़ाने की कोशिश की जाती है। यहां गोडावण के बच्चों को विशेष देखभाल दी जाती है, ताकि उनकी जीवित रहने की संभावना बढ़ सके।
एक ऐसा समय था जब भारत के आसमान पर गिद्ध झुंड में उड़ान भरते दिख जाते थे, या कहीं मरे हुए जानवरों को निपटाते हुए भारी तादाद में दिखाई दे जाते। मरे हुए जानवरों को खाने की वजह से गिद्धों को 'प्रकृति के सफाई कर्मचारी' कहा जाता है। 1990 के दशक में उनकी बर्बादी शुरू हो गई। दरअसल, भारतीय गिद्धों (Indian vulture) 1990 की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई। दरअसल, मरे हुए जानवरों का मांस खाना ही इनके लिए काल साबित हुआ। गाय और भैंस को एक दवा डाइक्लोफेनाक (Diclofenac) दी जाती थी। गिद्ध उन पशुओं के शव खाते थे, तो यह दवा उनके शरीर में जाकर किडनी फेल होने का कारण बनती थी। इसका नतीजा यह हुआ कि कुछ ही वर्षों में गिद्धों की आबादी लगभग 95–97% तक घट गई।
भारत सरकार और कई पर्यावरण संगठनों ने मिलकर गिद्ध संरक्षण के लिए विशेष कदम उठाए। सबसे पहले डाइक्लोफेनाक दवा के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया। इसके अलावा, वल्चर एक्शन प्लान 2020–25 (Vulture Action Plan 2020–25) जैसी योजनाएं शुरू की गईं। इसका उद्देश्य गिद्धों को दोबारा से आबाद करना है। वहीं गिद्धों के संरक्षण के लिए कैप्टिव ब्रीडिंग (प्रजनन) कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। देश के कई हिस्सों जैसे हरियाणा, पश्चिम बंगाल और असम में गिद्धों के लिए विशेष प्रजनन केंद्र स्थापित किए गए हैं। यहां गिद्धों को सुरक्षित वातावरण में पाला जाता है और फिर उन्हें प्राकृतिक वातावरण में छोड़ा जाता है। इस प्रक्रिया से धीरे-धीरे उनकी संख्या में वृद्धि हो रही है।
पहाड़ी मैना (Hill Myna) भारत के सबसे आकर्षक और बुद्धिमान पक्षियों में से एक है। इसका वैज्ञानिक नाम Gracula religiosa है। यह पक्षी मुख्यतः भारत के पहाड़ी और वन क्षेत्रों में पाया जाता है। इसके अलावा यह नेपाल, भूटान और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में भी मिलता है। भारत में यह खासकर उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, झारखंड और केरल के घने जंगलों में पाया जाता है। यह अपनी चमकदार काली रंगत, पीले-नारंगी चोंच और सिर के पीछे लटकते पीले मांसल भाग के कारण आसानी से पहचान में आ जाते हैं। हालांकि पहाड़ी मैना अभी पूरी तरह विलुप्तप्राय नहीं है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में इसकी संख्या घट रही है। इसके पीछे मुख्य कारण वनों की कटाई, आवास की हानि और अवैध शिकार हैं। इन समस्याओं को देखते हुए वन्यजीव संरक्षण कानूनों के तहत इस पक्षी की रक्षा की जा रही है।
पहाड़ी मैना का प्राकृतिक आवास ऊंचे पेड़ों वाले घने जंगल होते हैं। यह अक्सर पेड़ों की फुनगियों पर रहते हैं। इसका भोजन मुख्यतः फल, कीड़े-मकोड़े और छोटे जीव होते हैं। मैना जंगलों को बसाए रखने में बहुत मददगार होते हैं। इनकी भूमिका बीजों के प्रसार (seed dispersal) में रहती है। पहाड़ी मैना को लेकर बस्तर के कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान से सुकून देने वाली खबर सामने आई है। उद्यान डायरेक्टर नवीन कुमार ने पत्रिका से बताया कि संरक्षण के 3 साल में उनकी संख्या 600 के पार हो गई है। इस वर्ष इसके 1200 पार करने की उम्मीद है। 2022 से शुरू किए ‘मैना मित्र अभियान’ में उद्यान से जुड़े 40 गांवों के युवा इसे लेकर लोगों को जागरूक कर रहे हैं।
पहाड़ी मैना का प्रजनन काल आमतौर पर मार्च से अक्टूबर के बीच होता है। यह अपने घोंसले पेड़ों में कठफोड़वा के बनाए खोखले हिस्सों (Tree cavities) में बनाती है। यह मादा 2–3 अंडे देती है। पहाड़ी मैना अपनी मधुर आवाज़ और इंसानी आवाज़ की नकल करने की क्षमता के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। यही वजह है कि इसे पालतू पक्षी के रूप में भी रखा जाता है। हालांकि, इस वजह से इसका अवैध व्यापार भी बढ़ा है, जो इसके अस्तित्व के लिए खतरा बनता जा रहा है।
विलुप्तप्राय हो रहे पक्षियों को बचाने या उनकी आबादी क्यों बढ़ाने को लेकर चिंता करनी चाहिए? इस सवाल के जवाब में जंगल कथा सीरीज पुस्तक के लेखक कबीर संजय पत्रिका से बातचीत में कहते हैं- 'आपने डोडो की कहानी सुनी है? डोडो मारीशस में पाया जाने वाला दुनिया के सबसे विशालकाय पक्षियों में से था। एक जमाने में इस द्वीप पर स्तनपायी जानवर नहीं थे। पक्षियों की कई प्रजातियां यहां रहती थीं। डोडो उनमें से एक था। द्वीप पर डोडो का कोई दुश्मन नहीं था। डोडो पक्षी फल, बीज और फलियां खाता था और खूब मोटा हो गया था। इसका वजन 20 किलो तक होता था। दुश्मन थे नहीं तो उसे खुद की रक्षा नहीं करनी थी। वह उड़ना भी भूल चुका था और जमीन पर ही घोंसला बनाकर अंडे भी दे देता था।'
डोडो के जीवन पर संकट कैसे आया? वह बताते हैं कि भारत और श्रीलंका से मसाले का कारोबार करने के लिए निकला एक पुर्तगाली जहाज 1504 में पहली बार इस द्वीप में पहुंचा। पुर्तगाली ने ताजे मांस के लिए इनका शिकार करना शुरू कर दिया। मारीशस द्वीप मसाला कारोबारियों के रास्ते में पड़ता था। कुछ ही दिनों में कारोबारियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन गया। इधर से गुजरने वाले जहाज यहां पर रुकने लगे। डोडो का बड़े पैमाने पर शिकार किया जाने लगा। इनके अस्तित्व पर संकट छाने लगा।
संजय ने बताया कि हालत तब और खराब हुई जब डच लोगों ने अपने कैदियों को निर्वासित करने के लिए इस द्वीप का इस्तेमाल शुरू कर दिया। इसके साथ ही यहां पर सुअर, बंदर जैसे जानवर पहुंचने लगे। जहाजों में लुके-छिपे चूहे भी यहां बड़ी संख्या में पहुंच गए। लगभग 100 सालों में ही डोडो की समूची आबादी नष्ट हो गई। डोडो का अस्तित्व ऐसा मिटा कि उसके फोटोग्राफ तक किसी पास नहीं थे। न ही इनका कोई नमूना सुरक्षित बचा। पुरानी जानकारी के आधार पर कुछ चित्र बनाए गए हैं।
वह अपनी कहानी आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, डोडो का नामोनिशान मिट गया। लोग उसे भूल गए। पर अचानक कुछ ऐसा हुआ जिससे लोगों को डोडो की याद आ गई। कुछ वर्ष पहले वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में पाया कि मॉरीशस में पाया जाने वाला एक खास तरह का पेड़ अब नहीं उग रहे हैं। उस प्रजाति के दरख्तों की संख्या अब सिर्फ 13 ही रह गई है। इन पेड़ों की उम्र 300 वर्ष के करीब होती है और सभी 13 दरख्तों की उम्र भी लगभग 300 साल के करीब हो चुकी थी। वैज्ञानिकों को चिंता हुई कि अब क्या करें? दरअसल, 1600 ईस्वी के बाद से उस प्रजाति के नए पेड़ नहीं उगे हैं। उस समय हुए प्राकृतिक और जैविक परिवर्तनों पर गौर करने पर वैज्ञानिकों ने पाया कि यह वही समय था जब डोडो पक्षी भी विलुप्त होता गया था।
दरअसल डोडो इस पेड़ के फलों को खाता था। उसके बीजों को वह अपनी बीट के जरिए निकाल देता था। फलों के बीज पर एक खास तरह की परत चढ़ी रहती थी। डोडो का पाचन तंत्र इस परत को पचा लेता था। इसके चलते उसकी बीट से निकलने वाले बीजों में से पौधे के अंकुर निकल आते थे। इस काम को मुफ्त में करने वाला कारीगर डोडो ही नहीं रहा। न ही बीज से परत हटाने वाला कारीगर डोडो बचा और नह ही इसके बीजों का अंकुरण। यही वजह है कि नए पौधे ही उगना बंद हो गए। अब उन पेड़ों के भी समाप्त होने का पूरा खतरा पैदा हो गया। उसी समय इन पेड़ों को बचाने की मुहिम नए सिरे से शुरू हुई।
कुछ विशेषज्ञों ने डोडो वाली भूमिका के लिए टर्की मुर्गे का चुनाव किया। इस मुर्गे को इस पेड़ के फलों को खिलाया गया। इसके बाद बीट में निकले बीजों को रोपा गया तो उनमें अंकुर निकलने लगे। इस तरह से पेड़ों की आबादी को बचाने में विशेषज्ञों को काफी हद तक कामयाबी मिली है। इस पेड़ को अब 'डोडो ट्री' भी कहा जाता है। संजय कहते हैं कि प्रकृति में कुछ भी अकेले नहीं है। सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। एक के चलते दूसरे के अस्तित्व पर भी संकट छा जाता है। अस्तित्व की श्रृंखला में से कोई पशु या पक्षी विलुप्त हो जाए तो इसका असर पूरी श्रृंखला पर पड़ता है।