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खतरनाक गैसों का तुरंत पता लगाएगा देसी हाईटेक सेंसर, IIIT रायपुर के शोधकर्ता को मिला पेटेंट

Innovation Time: ट्रिपलआईटी नया रायपुर के शोधकर्ता डॉ. कमल सोलंकी ने ग्रेफीन आधारित अत्याधुनिक गैस सेंसर विकसित कर बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इस तकनीक को भारतीय पेटेंट मिला है।

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Apr 17, 2026
खतरनाक गैसों का तुरंत पता लगाएगा देसी हाईटेक सेंसर(photo-patrika)

Innovation Time: तकनीक और नवाचार के क्षेत्र में International Institute of Information Technology Naya Raipur (ट्रिपलआईटी नया रायपुर) के शोधकर्ता Dr. Kamal Solanki ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने ग्रेफीन आधारित अत्याधुनिक गैस सेंसर विकसित किया है, जिसे भारतीय पेटेंट प्राधिकरण द्वारा पेटेंट भी प्रदान किया गया है। यह तकनीक न केवल औद्योगिक सुरक्षा को मजबूत करेगी, बल्कि आम लोगों को भी खतरनाक गैसों से समय रहते बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

Innovation Time: ग्रेफीन तकनीक पर आधारित हाईटेक सेंसर

डॉ. सोलंकी द्वारा विकसित यह सेंसर Graphene जैसे उन्नत नैनोमैटेरियल पर आधारित है। ग्रेफीन अपनी उच्च संवेदनशीलता और तेजी से प्रतिक्रिया देने की क्षमता के लिए जाना जाता है, जिसके कारण यह सेंसर बेहद कम मात्रा यानी पीपीबी (Parts Per Billion) स्तर तक की खतरनाक गैसों का पता लगाने में सक्षम है। यह सेंसर विशेष रूप से औद्योगिक इकाइयों, रासायनिक संयंत्रों और खनन क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों के लिए सुरक्षा कवच साबित हो सकता है।

5-10 सेकंड में खतरनाक गैसों की पहचान

इस हाईटेक सेंसर की सबसे बड़ी खासियत इसकी तेज प्रतिक्रिया क्षमता है। यह सेंसर कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड, अमोनिया, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसी जानलेवा गैसों का मात्र 5 से 10 सेकंड के भीतर पता लगा लेता है। गैस का स्तर सामान्य होने पर यह 15-20 सेकंड में रीसेट हो जाता है, जिससे लगातार निगरानी संभव हो पाती है।

बजर और मोबाइल ऐप से तुरंत अलर्ट

सेंसर को इस तरह डिजाइन किया गया है कि जैसे ही गैस की मात्रा निर्धारित सीमा (थ्रेशोल्ड) से अधिक होती है, यह तुरंत बजर बजाकर और मोबाइल ऐप के माध्यम से अलर्ट भेजता है। इससे संबंधित व्यक्ति या कर्मचारी तुरंत सतर्क हो सकते हैं और किसी बड़े हादसे को टाल सकते हैं।

उद्योगों और स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए गेमचेंजर

यह तकनीक केवल औद्योगिक सुरक्षा तक सीमित नहीं है। डॉ. सोलंकी के अनुसार, यह सेंसर भविष्य में स्वास्थ्य क्षेत्र में भी क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है, क्योंकि कई बीमारियों- खासतौर पर श्वसन और कैंसर- का संबंध गैसों और रासायनिक तत्वों से होता है।

लैब से फील्ड तक पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती

हालांकि इस तकनीक का विकास हो चुका है, लेकिन इसे वास्तविक परिस्थितियों में लागू करना अभी भी चुनौती बना हुआ है। डॉ. सोलंकी बताते हैं कि लैब में नियंत्रित वातावरण होता है, जबकि फील्ड में तापमान, नमी और अन्य कारक अलग होते हैं, जिनके अनुसार सेंसर को अनुकूल बनाना जरूरी है।

आने वाले समय में AI और IoT से होगा कनेक्शन

डॉ. सोलंकी की भविष्य की योजना इस तकनीक को Internet of Things (IoT) और Artificial Intelligence (AI) के साथ जोड़ने की है। इसके जरिए एक स्मार्ट गैस मॉनिटरिंग नेटवर्क तैयार किया जाएगा, जो रियल-टाइम डेटा के आधार पर खतरे का पूर्वानुमान लगा सकेगा। साथ ही, वे मल्टी-गैस डिटेक्शन सिस्टम (ई-नोज) विकसित करने पर भी काम कर रहे हैं, जो भविष्य में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की शुरुआती पहचान में मददगार साबित हो सकता है।

छत्तीसगढ़ के लिए गर्व की उपलब्धि

यह नवाचार न केवल तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि Raipur और पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गर्व का विषय भी है। स्थानीय स्तर पर विकसित यह तकनीक वैश्विक स्तर पर औद्योगिक सुरक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में नई दिशा दे सकती है।

Updated on:
17 Apr 2026 02:40 pm
Published on:
17 Apr 2026 02:39 pm
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