Child Mortality Rate 2025 : भारत में बाल एवं शिशु मृत्यु दर में काफी कमी दर्ज की गई है। इसकी सराहना संयुक्त राष्ट्र ने भी खुले कंठ से की है, लेकिन अभी हम जापान, चीन और श्रीलंका से काफी पीछे हैं। आइए जानते हैं कि इस उपलब्धि के बारे में एक्सपर्ट ने क्या कहा।
Child Mortality in India: संयुक्त राष्ट्र की इंटर-एजेंसी ग्रुप फॉर चाइल्ड मॉर्टैलिटी एस्टिमेशन (UNIGME) रिपोर्ट 2025 के अनुसार, बाल मृत्यु दर को कम करने के मामले में वैश्विक प्रगति में भारत एक प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में उभरा है। भारत ने लगभग साढ़े तीन दशक के समय में गुणात्मक प्रगति दर्ज की है। अमेरिका में प्रति 1,000 पर 11 बच्चों की मौत हो जाती थी, लेकिन अब यह घटकर 6 रह गई है। हालांकि हम इस मामले में अभी भी जापान से काफी पीछे हैं। चीन और पाकिस्तान का क्या हाल है? इसके साथ ही इस मामले में दुनिया के अन्य देशों का हाल भी जानते हैं।
वर्ष 1990 से चलकर 2024 में नवजात मृत्यु दर में 70 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। 1990 में प्रति 1,000 में से नवजात मृत्यु दर 57 से घटकर 2024 में 17 रह गई है। वहीं, पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर में 79 प्रतिशत की बड़ी कमी आई है, जो 1990 में 127 से घटकर 2024 में 27 हो गई है।
पिछले दो दशकों में दक्षिण एशिया क्षेत्र में बाल मृत्यु दर कम करने के प्रयासों में भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस क्षेत्र में वर्ष 1990 से अब तक पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मौतों में 76 प्रतिशत और वर्ष 2000 से 68 प्रतिशत की गिरावट आई है। यह बड़ी कमी मुख्य रूप से भारत जैसे देशों द्वारा लक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप, बेहतर संस्थागत प्रसव प्रणाली और विस्तारित टीकाकरण कवरेज के कारण संभव हुई है।
दक्षिण एशिया क्षेत्र में पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर में उल्लेखनीय गिरावट आई है। वर्ष 2000 में प्रति 1,000 बच्चों में 92 की मौत हो जाती थी, वह 2024 में घटकर लगभग 32 रह गई है। भारत में पहले निमोनिया, डायरिया, मलेरिया और जन्म संबंधी जटिलताओं के चलते नवजात बच्चों की मौत बहुत ज्यादा हो जाती थी। हालांकि इस दिशा में केंद्र से लेकर राज्यों के प्रयास के चलते अब नवजात की मौतों में काफी कमी आई है।
भारत में नवजात बच्चों की देखरेख में सुधार उल्लेखनीय है। दक्षिण एशिया में 2000 के बाद से नवजात मृत्यु में लगभग 60 प्रतिशत की कमी आई है, जबकि 1 से 59 महीने की आयु के बच्चों में मृत्यु दर 75 प्रतिशत से अधिक घटी है।
हालांकि, विश्व में पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की कुल मौतों में से अकेले दक्षिण एशिया में लगभग 25 प्रतिशत हो जाती है। इसके बावजूद यह क्षेत्र दुनिया में सबसे तेज गिरावट दर्ज करने वालों में शामिल है, भारत में इसमें अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
भारत के अलावे अन्य एशियाई देशों में बाल मृत्यु दर (Child Mortality) के मामले में जापान सबसे बेहतर हालत में है। चीन ने भी इस मामले में काफी तरक्की है। संयुक्त राष्ट्र और UNIGME जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट्स के जरिये यह जानने की कोशिश करते हैं कि एशियाई देशों में बाल मृत्यु दर में सुधार को कितना सुधार आया है।
डॉ. चंद्रशेखर झा, शिशु रोग विशेषज्ञ एवं फैमिली फिजिशियन पत्रिका से बातचीत में कहते हैं कि भारत ने पिछले तीन दशकों में बाल एवं शिशु मृत्यु दर के मामले में असाधारण और संचरणात्मक सफलता हासिल की है। यह अविश्वसनीय सुधार देश में स्वास्थ्य के मामले में ढांचागत सुधार करने से हासिल हुआ है। बाल एवं शिशु मृत्यु दर में संख्या में जो गिरावट दर्ज की गई है, यह केवल सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं है, बल्कि नीति के क्रियान्वयन में और लास्ट माइल डिलीवरी हमारे स्वास्थ्य प्रणाली के प्रभावी होने का प्रमाण है।
उन्होंने कहा कि नवजात (जन्म से 28 दिनों तक) मृत्यु दर में प्रति हजार में से करीब 57 बच्चों से घटकर 17 रह गई है। यह इस बात का संकेत है कि नियो नैटल सेंसेटिव केयर यूनिट (NICU), स्पेशल न्यू बॉर्न केयर यूनिट (SNCU/NICU), पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट (PICU) और कंगारू मदर सेवाएं काफी प्रभावी हुई हैं। संस्थागत प्रसव में बढ़ोतरी के चलते भी नवजात मृत्युदर में कमी आई है। प्रसव कराने में कुशल लोगों की भागीदारी बढ़ने से यह संभव हो पाया।
बाल मृत्यु दर (5 वर्ष से छोटे बच्चे) में भी करीब 79 फीसदी की सकारात्मक गिरावट दर्ज की गई है। इसकी वजह बताते हुए डॉ. झा कहते हैं, 'इस मामले में सबसे ज्यादा लाभ टीकाकरण के व्यापक विस्तार से हुआ है। संक्रामक बीमारियों जैसे डायरिया, निमोनिया आदि के मामले में हमने बेहतर तरीके से प्रबंधन किया। पोषण और स्वच्छता के मामले में हमने गुणात्मक सुधार किया।
जापान दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां बाल मृत्यु दर सबसे कम है। यहां प्रति हजार पर सिर्फ 2–3 जन्म से लेकर 5 वर्ष तक के बच्चों की मौत होती है। जापान में 100 फीसदी प्रसव अस्पतालों में ही होते हैं। इसके अलावा यहां उन्नत स्वास्थ्य सुविधाएं, उच्च शिक्षा स्तर, संतुलित पोषण और मातृ-शिशु देखभाल पर विशेष ध्यान है। चीन की बात करें तो यहां पिछले तीन दशकों में बाल मृत्यु दर में भारी गिरावट दर्ज की गई है। यहां की मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली, बेहतर पोषण और व्यापक टीकाकरण के कारण पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर काफी कम होकर लगभग 6–7 प्रति 1,000 रह गई है। चीन में 1990 में प्रति हजार 54 बच्चों, जबकि जापान में इस काल में सिर्फ 6 बच्चों की मौत हो जाती थी।
बांग्लादेश ने सीमित संसाधनों के बावजूद उल्लेखनीय प्रगति की है। बांग्लादेश में 1990 में प्रति हजार पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में से करीब 144 की मौत हो जाती थी। अब मृत्यु दर घटकर लगभग 25–27 प्रति 1,000 रह गई है। सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, टीकाकरण अभियानों और महिलाओं के शिक्षा में सुधार ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई है। बांग्लादेश को अक्सर “लो-कॉस्ट हेल्थ मॉडल” के सफल उदाहरण के रूप में देखा जाता है। हालांकि इसके विपरीत पाकिस्तान में स्थिति अपेक्षाकृत चिंताजनक बनी हुई है। यहां पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर अभी भी लगभग 60–65 प्रति 1,000 है। यह दक्षिण एशियाई में सबसे ज्यादा है।
श्रीलंका में बाल मृत्यु दर में सुधार बहुत ज्यादा दर्ज किया गया है। यहां बाल मृत्यु दर लगभग 6-8 प्रति 1,000 के बीच है, जो विकसित देशों के करीब मानी जाती है। 1990 में यहां प्रति 1000 जन्म लेने वाले बच्चों में से करीब 20 बच्चों की मौत हो जाती थी। इसका श्रेय मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली, मुफ्त चिकित्सा सेवाओं और उच्च साक्षरता दर को जाता है। मातृ और शिशु स्वास्थ्य सेवाएं यहां अच्छी तरह संगठित हैं।
ताजी रिपोर्ट देखने से पता चलता है कि एशिया में बाल मृत्यु दर में स्पष्ट असमानता दिखाई देती है। जापान और श्रीलंका जैसे देश को बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था के कारण बाल मृत्यु दर में कमी लाने में काफी सफलता हासिल हुई है। वहीं इसके उलट पाकिस्तान जैसे देशों को इस मामले में अभी मीलों का सफर तय करना है। वहीं चीन और बांग्लादेश जैसे देशों ने तेजी से सुधार कर यह दिखाया है कि सही नीतियों और निवेश से बाल मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।