War Impact on Global Economy: ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच युद्ध बीते एक महीने जारी है। अमेरिका-इजरायल के इस कदम से शेयर बाजार, सरकारी बॉन्ड और सोना व ऊर्जा जैसी कमोडिटी सहित लगभग सभी बाजारों को हिला कर रख दिया है। आइए जानते हैं कि इस जंग में किसने क्या हासिल किया और क्या खोया?
War Impact on Economy: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह दावा है कि उन्होंने ईरान को होर्मुज स्ट्रेट Strait of Hormuz खोलने और ईंधन के आवागमन की अनुमति देने के लिए समय-सीमा बढ़ा दी है। अमेरिका के इस कदम के बाद थोड़ी सी शांति दिखाई दे रही है। हालांकि, यह संघर्ष अभी थमता हुआ नजर नहीं आ रहा है। वैश्विक आर्थिक शोध और परामर्श कंपनी Oxford Economics के अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि यदि तेल की कीमतें बढ़कर 140 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती हैं और वहीं बनी रहती हैं, तो अर्थव्यवस्था के सुस्त होने का खतरा बढ़ सकता है। इसका असर दुनिया के अलग-अलग देशों पर दिखने लगा है।
भारत के प्रधानमंत्री ने भी संसद में अपने संबोधन में वर्तमान समस्या को कोरोनाकाल से जोड़कर देखने की बात की और भारतीयों को धैर्य और सतर्क रहने को कहा है। भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार गिरता जा रहा है। बीते एक महीने में डॉलर के मुकाबले रुपया 90 से बढ़कर 94.78 रुपये के स्तर पर पहुंच गया। डॉलर के मुकाबले रुपये करीब 4% कमजोर हो चुका है। पिछले एक वर्ष में, व्यापार और टैरिफ के प्रभाव के चलते यह 10% से अधिक गिर चुका है। वर्ष 2016 में डॉलर के मुकाबले रुपया 65 से 67 के बीच था। मतलब बीते 10 वर्षों में इसमें करीब 30 रुपये की गिरावट दर्ज की गई। इतना ही नहीं, हाल के एक महीने में रुपया चीन के युआन, जापान के येन, यूरो और ब्रिटिश पाउंड के मुकाबले भी कमजोर हुआ है।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि इस संघर्ष में कौन सी अर्थव्यवस्थाएं विजेता हैं और कौन सी सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही हैं? इस सवाल का जवाब देने के लिए OECD ने एक 'इंटरिम इकोनॉमिक आउटलुक' जारी किया है।
वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर के आधार पर OECD के विश्लेषण में कुछ दिलचस्प नतीजे सामने आए हैं। हालांकि इसमें यह साफ तौर पर यह नहीं कहा गया है कि ईरान और इजरायल के युद्ध के चलते ऐसा हुआ है। हालांकि, यह बताया गया है कि सबसे ज्यादा नुकसान पारंपरिक अमेरिकी सहयोगियों खासकर यूरोपीय संघ के देशों और ब्रिटेन को होगा। यूरोप की अर्थव्यवस्था पहले से ही सुस्त पड़ी हुई है। ऐसे में नए विश्लेषण में यह बताया गया है कि वृद्धि दर में 0.4 प्रतिशत अंक तक की गिरावट आ सकती है। वहीं, ब्रिटेन की वृद्धि दर में 0.5 प्रतिशत अंक तक गिरावट का अनुमान है। जाहिर है कि अगर ऐसा होता है तो यह बहुत बड़ा झटका साबित होगी।
दिलचस्प रूप से, अमेरिका के दो बड़े सैन्य और व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी रूस और चीन मध्यपूर्व संकट के चलते आंशिक या बिल्कुल भी प्रभावित होंगे। यह भी संभव है कि रूस की जीडीपी ग्रोथ में सकारात्मक वृद्धि भी दर्ज की जा सकती है। मध्यपूर्व संकट के चलते अमेरिका ने वैश्विक आपूर्ति संकट को कम करने के लिए नियमों में ढील देने के बाद रूस का कच्चे तेल का भारत को निर्यात 50% तक बढ़ गया है। कुछ अनुमानों के अनुसार, रूस मार्च के अंत तक अतिरिक्त 5 अरब डॉलर (लगभग £3.7 अरब) तक कमा सकता है और 2022 के बाद ईंधन से होने वाली कमाई के लिहाज से यह उसका सबसे बड़ा साल साबित हो सकता है। इस तरह अमेरिका अनजाने में खाड़ी देशों की कीमत पर रूस को भारी आर्थिक फायदा पहुंचाने का जोखिम उठा रहा है। इसके अलावा, इस स्थिति से अन्य संभावित लाभार्थी भी हो सकते हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिका की जीडीपी वृद्धि दर इस संघर्ष से लगभग 0.33 प्रतिशत अंक तक बढ़ सकती है। अमेरिका को लेकर 2026 में जिस गिरावट की आशंका थी, उसमें अब कुछ कमी आ सकती है।
दिसंबर 2025 के अनुमान के अनुसार, अमेरिका में सरकारी शटडाउन के कारण आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुई थीं, जिसके चलते पिछले वर्ष की आखिरी तिमाही अपेक्षाकृत धीमी वृद्धि से प्रभावित थी। वहीं, 2026 की पहली तिमाही में अमेरिकी अर्थव्यवस्था अधिक मजबूत रही है। इसकी वजह यह है कि उपभोक्ताओं के लिए टैक्स कटौती और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और टेक्नोलॉजी आधारित कंपनियों का निरंतर निवेश है। इस रिपोर्ट के अनुसार, ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से जहां लागत बढ़ेगी, वहीं यह अमेरिका में घरेलू ऊर्जा उत्पादन को भी प्रोत्साहित करेगी, जिससे GDP को बढ़ावा मिलेगा। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक है। अमेरिका प्रतिदिन लगभग 12–13 मिलियन बैरल कच्चा तेल उत्पादन करता है। तेल उत्पादन में इसके बाद सऊदी अरब और रूस का नंबर आता है। अमेरिका की जीडीपी में वृद्धि होगी, इस बात को खुद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप कुछ इस अंदाज में बयान करते हैं, 'जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो यूनाइटेड स्टेट्स काफी पैसा कमाता है।' हालांकि यह उनके आत्मविश्वास जितना सच भी नहीं है।
मध्य पूर्व में तनाव के हालात पैदा होने के बाद से कुछ अमेरिकी कंपनियों के कारोबार में देखी जा रही है। । उदाहरण के लिए हम एक्सॉनमोबिल (ExxonMobil) को ले सकते हैं। कतर के रास लाफान औद्योगिक हब पर ईरान के हमले के बाद उत्पादन बंद है, जिसके चलते कंपनी की उत्पादन गतिविधियों पर काफी असर पड़ा है।
मध्य पूर्व संकट के चलते दुनिया के ज्यादातर मुल्कों में महंगाई दरों में इजाफा होगा। सऊदी अरब में महंगाई दर में इजाफा होने के कम आसार हैं, क्योंकि उनके पास पर्याप्त घरेलू तेल भंडार हैं। दुनिया के अधिकांश देशों में महंगाई तेजी से बढ़ सकती है।
भारत में 2025 में महंगाई लगभग 2% थी। वर्ष 2026 में इसके 5.1% तक पहुंचने की संभावना है। यह दिसंबर के अनुमान (3.4%) से 1.7 प्रतिशत अंक अधिक है, जो भारतीय रिजर्व बैंक के 4% लक्ष्य से काफी ऊपर है। विकसित देशों जैसे अमेरिका, यूरोपीय संघ, जापान और दक्षिण कोरिया में भी महंगाई 1 प्रतिशत अंक से अधिक बढ़ने की संभावना है।
युद्ध जैसे हालात में ग्राहक जब वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करते हैं, तो नॉर्वे जैसे देशों को फायदा हो सकता है। वर्ष 2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया और कई देशों ने रूसी गैस पर निर्भरता कम करने की कोशिश की, तब नॉर्वे ने उत्पादन बढ़ाकर इस अवसर का लाभ उठाया। भारत पहले 17 देशों से तेल और गैस का आयात करता था, लेकिन मध्य पूर्व संकट के बाद करीब 41 देशों से आयात के विकल्प खोलने की कोशिश हुई।