
Japan and Germany: पिछले कुछ समय से जापान और जर्मनी के बीच नजदीकियां बढ़ती जा रही हैं। दुनिया इसे द्वतीय युद्ध से पहले दोनों देशों के बीच हुए गठबंधन की नजर से देख रही है। आइए जानते हैं कि क्यों ये दोनों देश इकट्ठा हो रहे हैं?
दरअसल, वर्ष 1940 के दशक में जर्मनी और जापान ने आपस में अमेरिका के खिलाफ गठबंधन किया। यह दो साम्राज्यवादी सत्ता का गठबंधन था, जिसे आगे चलकर धुरी शक्तियां (Axis Powers) कहा गया। दोनों देशों ने मिलकर द्वतीय विश्व युद्ध लड़ा, लेकिन वे हार गए। इसके बाद से अब तक दोनों देशों की सेनाएं अपने हद में रहती आ रही हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी और जापान ने अपने तबाह हुए शहरों के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित किया था और खुद की सुरक्षा की जिम्मेदारी अमेरिका पर छोड़ दी थी।
डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद वैश्विक स्तर पर युद्धोन्मादी घटनाएं अक्सर आकार ले रही हैं, जिसके चलते दोनों देशों के प्रमुखों के मन में अमेरिका को लेकर पुरानी आशंकाएं फिर से उभर रही हैं। अमेरिका के साथ ही तेजी से उभरती वैश्विक शक्ति चीन और आक्रामक रूस को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। जापान और जर्मनी एक बार फिर से आपसी संबंधों को मजबूत करने में जुट गए हैं। दोनों ही देशों ने अपनी सेनाओं को फिर से ताकतवर बनाने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया है। हालांकि यह पहलकदमी 1940 की तरह धुरी शक्ति बनने की चाहत से नहीं किया जा रहा है। इस बार जापान और जर्मनी, अमेरिका पर आक्रमण करने के दृष्टिकोण से एकजुट नहीं हो रहे हैं। इस बार उनका रवैया रक्षात्मक दृष्टिकोण का है।
जापान और जर्मन के बीच पहले से ही तकनीकी जानकारी, सैन्य तकनीक और ड्रोन व हेलीकॉप्टर जैसे हथियार आपस में साझा कर रहे हैं। यह उनकी रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण हैं। जर्मनी, रूस के खिलाफ यूक्रेन की रक्षा का समर्थन कर रहा है, जबकि जापान, चीन और उत्तर कोरिया से उत्पन्न खतरों को लेकर चिंतित है।
जापान और जर्मनी का यह गठबंधन अपनी तरह की एक सामान सोच वाले अन्य देशों के साथ अपना समीकरण बनाने में जुटा हुआ है। यही वजह है कि वह ब्रिटेन, कनाडा और फ्रांस जैसे देशों से अपनी करीबियां बढ़ा रहे हैं। ये तीनों ही देश जी7 के सदस्य हैं। अचरज की बात यह है कि ये तीनों ही देश ब्रिटेन, कनाडा और फ्रांस द्वितीय विश्व युद्ध के समय जर्मनी और जापान के दुश्मन देश थे। अब अमेरिका, रूस और चीन की दादागिरी के खिलाफ खुद को रक्षात्मक रूप से खड़े कर रहे हैं और खुद को अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करने वाला बता रहे हैं।
अमेरिका ने जर्मनी के दो हिस्सों पूर्वी और पश्चिमी में बंटने के बाद पश्चिम जर्मनी में बड़े सैन्य अड्डे बनाए और वहां अपने हजारों सैनिक तैनात कर दिए। शीत युद्ध के दौरान पश्चिम जर्मनी, तत्कालीन सोवियत संघ के खिलाफ एक महत्वपूर्ण मोर्चा था। द्वतीय विश्वयुद्ध में मुंह की खाने के बाद दो हिस्सों में बंट चुके जर्मनी की अपनी-अपनी भारी तादाद में सेनाएं थीं, लेकिन बर्लिन की दीवार ढहने और शीत युद्ध की समाप्ति के बाद जर्मनी ने सैन्य बजट की तुलना में सामाजिक योजनाओं शिक्षा, स्वास्थ्य आदि पर अधिक जोर देना शुरू कर दिया।
जापान ने भी विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद जनरल डगलस मैकआर्थर के नेतृत्व में अमेरिका द्वारा बनाए गए संविधान को स्वीकार किया, जिसमें जापान ने युद्ध को छोड़ने और सिर्फ आत्मरक्षा युद्ध के बाद के दशकों में दोनों ही देशों में सैन्यवाद विरोधी आंदोलनों को समर्थन मिला। इन आंदोलनों ने शांति, कूटनीति, मुक्त व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के विचारों को बढ़ावा दिया। इन विचारों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य के चलते ही जापान ने अपने सेना का अधिकारिक नाम सेल्फ डिफेंस फोर्सेज (Self-Defense Forces) रखा था। हालांकि रूस और चीन की बढ़ती सैन्य और आर्थिक नीतियों के चलते जापान की यह भावना कमजोर हुई है।
जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने कुछ महीने पहले जापान की यात्रा के दौरान कहा था कि जर्मनी और जापान को और करीब आना चाहिए। हमें दुनिया के सामने यह स्पष्ट करना चाहिए कि हम अभी भी नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के साथ खड़े हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा यूरोप में सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को छोड़ने की धमकी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ व्यापार समझौते की इच्छा ने भी दोनों देशों को अपनी रक्षा क्षमताएं बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।
जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने सत्ता संभालने से पहले ही सरकारी कर्ज की सीमाओं को हटाने में सफलता हासिल की ताकि देश रक्षा खर्च में भारी वृद्धि कर सके। यह भी संभव है कि आने वाले कुछ वर्षों में जर्मनी का सैन्य खर्च फ्रांस और ब्रिटेन दोनों के संयुक्त रक्षा बजट से भी बड़ा हो सकता है। वहीं जापान, जर्मनी की तुलना में लगभग आधा खर्च करता है, लेकिन फिर भी वह दुनिया के सबसे बड़े रक्षा खर्च करने वाले देशों में शामिल है। इस वर्ष उसका रक्षा बजट लगभग 58 अरब डॉलर है। जापान के प्रधानमंत्री ने सत्ता हासिल करने के बाद सेना को मजबूत करने का संकल्प लिया है।