Custodial Deaths in India : झारखंड में पिछले 7 वर्षों में हिरासत में 500 मौतों की खबर सामने आने से जेल में मानवाधिकार और न्याय व्यवस्था की पोल एक बार फिर से खुल गई है। झारखंड सरकार ने खुद ही राज्य के उच्च न्यायालय के समक्ष मौत का यह आंकड़ा पेश किया। आइए जानते हैं कि देश में झारखंड के अलावा दूसरे राज्यों के क्या हालात हैं?
Custodial Deaths in India: भारत में हर साल जेल और पुलिस हिरासत में सैकड़ों लोगों की मौत हो जाती है। हर साल औसतन लगभग 1,700 से 2,500 के बीच हिरासत मौतें दर्ज होती हैं। पिछले कुछ वर्षों में यह देखा गया है कि देश के अलग-अलग राज्यों से पुलिस हिरासत और न्यायिक हिरासत में मौतों के अनेक मामले सामने आए हैं, जिसके चलते समय-समय पर जेल प्रशासन, पुलिस व्यवस्था और जेल तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठते रहते हैं। जेल और पुलिस हिरासत में मौतों के मामले में देश में शीर्ष पर उत्तर प्रदेश है। इसके बाद क्रमश: महाराष्ट्र, बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात का नंबर आता है।
झारखंड में पिछले 7 वर्षों में जेल और पुलिस हिरासत में लगभग 500 लोगों की मौत हो गई। यह आंकड़ा झारखंड सरकार ने खुद ही झारखंड उच्च न्यायालय के समक्ष पेश किया। झारखंड उच्च न्यायालय के समक्ष गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग के प्रधान सचिव द्वारा दायर शपथपत्र के अनुसार, वर्ष 2018 से अब तक न्यायिक हिरासत में 437 मौतें हुई हैं, जबकि लगभग 45 मौतें पुलिस हिरासत में हुईं। यह आंकड़ा मुमताज अंसारी द्वारा दायर उस जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसमें न्यायिक या पुलिस हिरासत में हुई सभी मौतों की न्यायिक जांच की मांग की गई थी। गुरुवार को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
राज्य सरकार द्वारा दायर शपथपत्र में यह भी खुलासा किया गया कि न्यायिक हिरासत में हुई मौतों में से केवल आधे मामलों में ही न्यायिक जांच कराई जा सकी। इसमें यह भी कहा गया कि पुलिस हिरासत में हुई 42 मौतों में से 11 मामलों की जांच अब भी लंबित है। सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व आदेशों और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) द्वारा समय-समय पर जारी दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया गया। याचिकाकर्ता का मुख्य जोर इस बात पर था कि पुलिस थाने या जेल में होने वाली किसी भी मौत के लिए जवाबदेही तय की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोक लगाई जा सके।
वहीं झारखंड उच्च न्यायाल ने इस मामले में टिप्पणी करते हुए कहा कि चूंकि ये मौतें कई वर्ष पहले हुई थीं, इसलिए उन मामलों में न्यायिक जांच कराना संभव नहीं हो सकता। इसके बाद याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत से आग्रह किया कि कम-से-कम इन मामलों की जांच के लिए दिशानिर्देश तैयार किए जाएं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में पिछले 10 वर्षों में हिरासत में मौतों की संख्या के मामलों में उत्तर प्रदेश सबसे टॉप पर रहा है। संसद में केंद्र सरकार ने जानकारी देते हुए कहा था कि वर्ष 2019 से 2021 के बीच उत्तर प्रदेश में न्यायिक हिरासत में लगभग 1,295 लोगों की मौत हुई, जबकि पुलिस हिरासत में 23 लोगों की मौत दर्ज की गई। इसके अलावा 2021-22 में उत्तर प्रदेश में न्यायिक हिरासत में 448 मौतें हुईं, यह देश में सबसे अधिक थीं।
हाल के आरटीआई आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में ही उत्तर प्रदेश की विभिन्न जेलों में 419 कैदियों की मौत हुई। जेलों में मौत की वजहों में अत्यधिक भीड़, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, मानसिक तनाव और लंबित मुकदमे गिनाए जाते हैं। वहीं मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि पुलिस हिरासत में होने वाली कई मौतों में यातना और थर्ड डिग्री के आरोप सामने आते हैं।
जेल और पुलिस हिरासत मामले में मौत के मामले में महाराष्ट्र का रिकॉर्ड भी बहुत खराब रहा है। पिछले 10 वर्षों में राज्य की अलग-अलग जेलों में 1,800 से ज्यादा कैदियों की मौत हुई है। कैदियों की मौत की वजहों में टीबी, हृदयाघात, मानसिक तनाव, अन्य बीमारियां, आत्महत्या और समय पर पर्याप्त चिकित्सा सुविधा नहीं मिलना बताया गया। वहीं इस अवधि में राज्य में पुलिस हिरासत में 60 से ज्यादा लोगों की मौतें दर्ज की गई हैं।
बिहार के अलग-अलग जेलों में पिछले 10 वर्षों के दौरान जेल और पुलिस हिरासत में 1,400 से अधिक कैदियों की मौत हुई है। वहीं राज्य में पुलिस हिरासत में इस अवधि के दौरान 40 से अधिक व्यक्तियों की मौत दर्ज की गई है। राज्य में ऐसे कई मामले सामने आए जब पुलिस पर मारपीट, थर्ड डिग्री और पूछताछ के दौरान यातना देने के आरोप लगे। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने हिरासत में हुई मौत के कई मामलों में राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन से रिपोर्ट भी मांगी।
मध्य प्रदेश में पिछले 10 वर्षों के दौरान जेल और पुलिस हिरासत में 1350 से अधिक मौतें दर्ज की गईं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB), मानवाधिकार संगठनों और सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में मध्य प्रदेश की जेलों में होने वाली मौतें सुर्खियां बनती रहीं हैं। इस मामले में मध्य प्रदेश चौथे नंबर पर रहा। राज्य में इस अवधि में लगभग 1,300 से अधिक कैदियों की मौत हुई है। वहीं पुलिस हिरासत में पिछले 10 वर्षों में लगभग 50 से अधिक मौतें दर्ज की गई हैं। कई मामलों में पुलिस पर मारपीट, थर्ड डिग्री और अवैध पूछताछ के आरोप लगे।
जेल और पुलिस हिरासत में मौत के मामलों में राजस्थान का रिकॉर्ड दूसरे शीर्ष राज्यों के मुकाबले बेहतर है। राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में पिछले 10 वर्षों में न्यायिक हिरासत यानी जेलों में 900 से अधिक कैदियों की मौत हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और मानवाधिकार संगठनों के आंकड़ों के अनुसार, हिरासत में अधिकांश मौतें हृदयाघात व अन्य बीमारियों के चलते हुईं। कई कैदियों की मौत आत्महत्या और पर्याप्त चिकित्सा सुविधा नहीं मिलने के कारण हुई हैं। इसके अलावा राज्य की कई जेलें क्षमता से अधिक कैदियों से भरी हुई हैं।
वहीं पुलिस हिरासत में पिछले 10 वर्षों के दौरान लगभग 30 से 35 लोगों की मौत दर्ज की गई है। इन मामलों में कई बार पुलिस यातना, मारपीट और थर्ड डिग्री के आरोप लगे। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने हिरासत में हुई मौत कुछ मामलों में राजस्थान सरकार और पुलिस अधिकारियों को नोटिस भी जारी किए।