
Kanha Tiger Reserve : कान्हा टाइगर रिजर्व का मुक्की परिक्षेत्र वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में देश में एक अनूठी मिसाल पेश कर रहा है। वर्ष 2007 में स्थापित देश के इस पहले 'री-वाइल्डिंग सेंटर' ने अब तक मां से बिछड़े या रेस्क्यू किए गए 15 बेसहारा शावकों को फिर से पूरी तरह ‘जंगली’ बनाकर जंगलों में सुरक्षित लौटाया है। आज इस सेंटर की बदौलत पन्ना और वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व नौरादेही रिजर्व नए बाघों से गुलजार हो रहे हैं।
शावकों को इंसानी छाप से दूर रखने के लिए 11 हेक्टेयर का एक विशेष बाड़ा बनाया गया है। 3.7 मीटर ऊंची मजबूत चेन-लिंक बाड़ से घिरे इस इलाके में कृत्रिम नहीं, बल्कि पूरी तरह प्राकृतिक वातावरण है। इसमें प्राकृतिक जलस्रोत, घना जंगल, घास के मैदान और चट्टानें शामिल हैं, ताकि शावकों को लगे कि वे खुले जंगल में ही रह रहे हैं। यहाँ करीब डेढ़ से दो साल की कड़ी मेहनत के बाद शावक मुख्य जंगल में छोड़े जाने के लायक तैयार होते हैं।
शावकों की प्राकृतिक शिकार क्षमता को जीवित करने के लिए मुख्य बाड़े से सटा 35 हेक्टेयर का एक शाकाहारी वन्यजीव बाड़ा बनाया गया है। इसमें चीतल जैसे जानवरों को रखा जाता है। शावकों को इस बाड़े में ले जाकर खुद शिकार करना सिखाया जाता है, ताकि जंगल में छूटने के बाद उन्हें भोजन के लिए किसी पर निर्भर न रहना पड़े।
शावकों में इंसानी आदतें न पनपें, इसके लिए बाड़े की बाहरी दीवारों को स्थानीय घास से ढककर अपारदर्शी बनाया गया है। निगरानी के लिए बाड़े में 4 लकड़ी के वॉच टावर और 500 मीटर दूर एक हाई-टेक कंट्रोल रूम बनाया गया है। वनकर्मी दूर रहकर ही कैमरों और टावर से हर गतिविधि पर नजर रखते हैं।
जंगल से रेस्क्यू कर लाए गए 3 माह से 1 वर्ष तक के छोटे शावकों को सबसे पहले क्वारंटाइन हाउस में रखा जाता है। यहाँ दो अलग-अलग हिस्से हैं ताकि एक साथ दो अलग-अलग शावकों की देखभाल हो सके। जब शावक शारीरिक रूप से मजबूत और शिकार में दक्ष होने लगते हैं, तब उन्हें बड़े बाड़े में शिफ्ट किया जाता है।
कान्हा प्रबंधन शावकों के व्यवहार, उनकी दैनिक सेहत, शिकार करने की टाइमिंग और मेडिकल जांच का एक-एक रिकॉर्ड निर्धारित प्रारूप में दर्ज करता है। इसी डेटा के आधार पर तय होता है कि शावक अब खुले जंगल में जाने के लिए कितना तैयार है।
कान्हा टाइगर रिजर्व क्षेत्र संचालक रवींद्र मणि त्रिपाठी ने पत्रिका से बातचीत में बताया कि यह देश का पहला री-वाइल्डिंग सेंटर है। हमारा मकसद सिर्फ शावकों का पालन-पोषण करना नहीं, बल्कि उनकी नैसर्गिक जंगली प्रवृत्तियों को पुनर्जीवित करना है। कान्हा के इस सफल मॉडल को सीखने के लिए राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश के वन अधिकारी यहाँ आते हैं। राजस्थान ने तो कान्हा की तर्ज पर अपने यहाँ भी री-वाइल्डिंग सेंटर शुरू किया है।