भारत की स्वर कोकिला लता मंगेशकर के बारे में ये बात बहुत कम लोग जानते होंगे कि उनके पिता ने पहले उनका नाम ‘हृदया’ रखा था, जो बाद में बदलकर न जाने कब ‘लता’ किया गया…
लता मंगेशकर भारतीय संगीत की दुनिया का वो नाम जो किसी परिचय का मोहताज नहीं है। उनके जीवन से सम्बन्धित छोटी-छोटी सूचनाओं से एक बड़ी कहानी बनायी जा सकती है, कुछ-कुछ उस तरह, जैसा कि वे ‘सीमा’ (1955) फ़िल्म के लिए हसरत जयपुरी के लिखे हुए गीत ‘सुनो छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी’ में गाकर व्यक्त होती हैं। उनके जीवन के दिलचस्प ब्यौरों में यह बात शामिल रही है कि उन्होंने सबसे पहले शोलापुर के ‘नूतन थियेटर’ में अपने बाबा के साथ गायन का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। वह भी राग खम्भावती के गायन के बाद, ‘मानापमान’ नाटक का ‘शूरा मी वन्दीले’ और ‘ब्रह्मकुमारी’ का ‘सुहास्या तुझे मानसी मोहि’ नाट्य गीत गाकर। बाद में वे उसी कार्यक्रम में अपने पिता की गोद में सिर रखकर मंच पर ही सोती रहीं और पण्डित दीनानाथ मंगेशकर का शास्त्रीय गायन सारी रात चलता रहा
यह बात भी कम लोग जानते होंगे कि उनके पिता ने पहले उनका नाम ‘हृदया’ रखा था, जो बाद में बदलकर न जाने कब ‘लता’ किया गया। इस बारे में एक धारणा यह भी प्रचलित रही कि पण्डित दीनानाथ मंगेशकर द्वारा सन् 1919 में खेले गये नाटक ‘भाव-बन्धन’ में जिस लड़की का चरित्र, उन्होंने लतिका के नाम से निभाया था, वहीं से उनके मूल नाम की प्रेरणा पड़ी है।
लता मंगेशकर के बाबा उनको इस कदर प्रेम करते थे, कि उनको अकसर चिढ़ाते हुए बड़े दुलार से ‘तता बाबा’ कहते थे। वे बचपन में गिल्ली डण्डा खेलती थीं और कई बार पिता के नाटकों की नकल पर घर के भीतर ही भाई-बहनों और सगे-सम्बन्धियों के साथ नाटक का खेल खेली थीं। इन नाटकों में उनके फुफेरे भाई और अभिनेत्री पद्मिनी कोल्हापुरे के पिता पण्ढरीनाथ कोल्हापुरे अकसर दुष्ट चरित्र या विलेन का रोल करते थे। उनके जीवन की कुछ अविस्मरणीय बदमाशियों में यह भी शुमार रहा है कि किस तरह उन्होंने घर के बगल बिसाती वाले की दुकान में जाकर दुकानदार को लगभग ठगते हुए दो खोटे आने देकर एक साबुन खरीदा था। यह अलग बात है कि उनके पिता ने सबक सिखाने के लिए दोबारा से उस दुकान पर दो आने देकर अपनी तता बाबा को भेजा था और यह शर्त भी लगाई थी कि वे बिना माफ़ी माँगे हुए घर नहीं लौटेगीं। वही दिन शायद उनके जीवन से झूठ और फ़रेब के निष्कासन का दिन था।
उनके जीवन में मध्य प्रदेश का इन्दौर शहर भी इस कारण महत्त्वपूर्ण रहा है कि वह उनके जन्मस्थान होने का गौरव पाया हुआ शहर है। शनिवार, 28 सितम्बर, 1929 को उनका इन्दौर के सिख मोहल्ले में अपनी मौसी के घर में जन्म हुआ था, जो घर ‘वाघ वकील का वाड़ा’ कहलाता था। लता मंगेशकर को पैदा कराने में उस दिन जो लेडी डाक्टर उपस्थित थीं, उनका नाम डा. मोताबाई है। डा. मोताबाई भी उस समय यह कहां जानती रहीं होंगी कि अपने प्रोफेशन के अनुसार नार्मल ढंग से जिस लड़की को जन्म दिलाकर लौटी हैं, उसका नाम तो बाद में इतिहास में दर्ज़ होने वाला है। ख़ुद उनका नाम भी बाद में याद रह जाने वाला क्योंकि वे उस कन्या को जन्म दिलाने वाली डाक्टर के रूप में इतिहास में कहीं मौजूद थीं।
इसी तरह लता मंगेशकर अपने पिता की थियेटर कम्पनी ‘बलवन्त संगीत मण्डली’ के साथ बचपन में पूना, कोल्हापुर, सातारा, गोवा, मिरज और सांगली घूमते हुए न जाने कितने शहरों की आबो-हवा की आर्द्रता महसूस करते हुए महाराष्ट्र को बहुत क़रीब से देख और समझ पायी हैं।
यह भी कम लोग ही जानते होंगे कि अपनी किशोरावस्था में उन्होंने समाज-सेवा का प्रण कर लिया था। इसके चलते वे राजनेता और क्रान्तिकारी वीर सावरकर से इस बात के लिए कई दिनों तक विमर्श में उलझी थीं कि उन्हें समाज-सेवा करते हुए राजनीति के पथ पर जाना है या कुछ और करना है? सावरकर जी ने ही उन्हें समझाया था कि तुम ऐसे पिता की सन्तान हो, जिनका शास्त्रीय संगीत और कला में शिखर पर नाम चमक रहा है। अगर देश की सेवा करनी ही है, तो संगीत के मार्फ़त समाज की सेवा करते हुए भी उसे किया जा सकता है। यहीं से लता मंगेशकर का मन भी बदला है, जो उन्हें संगीत की कोमल दुनिया में बड़े संघर्ष की तैयारी के लिए ले आया। एक तरह से हम भारतीयों को सावरकर का ऋणी होना चाहिए, जो उन्होंने एक बड़ी प्रतिभा को खिलकर सफल होने का जज़्बा दिया। उन्होंने अगर उस दिन लता मंगेशकर को कुछ दूसरे ढंग से समाज-सेवा करने से रोका न होता, तो आप उम्मीद कर सकते हैं कि पिछली अर्द्ध शताब्दी और यह नयी सदी सुरीलेपन से कितनी विपन्न होती?
लता मंगेशकर के जीवन की तमाम छोटी-छोटी बातें, उसी तरीके से बड़ी लगती हैं, जिस तरह किसी बड़े व्यक्ति के जीवन के पन्नों को पढ़ने पर उसका असर बड़ा दिखाई देता है। हम इस बात के लिए प्रसन्न हो सकते हैं और इस ख़ुशफहमी में जी सकते हैं कि वे जिस हवा में साँस ले रही हैं, उनमें हम भी कहीं मौजूद हैं। चाँदी की घण्टियों जैसे खनकते कोमल स्वर के साथ यह लता मंगेशकर ही हैं, जिनसे जीवन की ख़ामोशी और अकेलापन भी कई बार भरा-भरा और गरिमामय बन जाता है। लता जी की अलंकरणमुक्त सादगी और भव्य आवाज़ का सांगीतिक इतिहास जितना रोचक है, उनकी सहजता उतनी ही मार्मिक… और भीतर तक बेध देने वाली।
बम्बई में 1948 के एक आम दिन बम्बई में संगीतकार अनिल विश्वास के यहाँ एक गाना रेकाॅर्ड हो रहा था। लता मंगेशकर गोपाल सिंह नेपाली का लिखा हुआ एक गीत गा रही थीं- ‘कब आओगे बालमा, बरस-बरस बदली भी बिखर गयी’। यह गीत फ़िल्म ‘गजरे’ के लिए था। अनिल विश्वास अपनी धुन और लता जी की गायिकी पर इस कदर रीझे हुए थे कि उन्होंने रेकाॅर्डिंग की समाप्ति पर अपनी गायिका से कहा ‘मैं चाहता हूँ कि राजकपूर साहब मेरे रेकाॅर्डिंग स्टूडियो आकर तुम्हारा यह गाना सुनें।’ उन दिनों आर.के. फ़िल्म्स का आफिस महालक्ष्मी के पास फेमस बिल्डिंग में ऊपर किराये के दफ़्तर में था। इस बात को कुछ दिन बीत गये। लता मंगेशकर नाना चैक के अपने घर में मौजूद थीं, जब एक ख़ूबसूरत-सा नौजवान उनके घर पर मिलने आया। उसने लता जी से कहा ‘आपको राजकपूर साहब के लिए कुछ गीत गाने हैं, इसलिए आप आर.के. फ़िल्म्स में समय निकालकर थोड़ी देर के लिए मिलने आ जाइएगा।’ लता मंगेशकर ने इससे पहले कोल्हापुर में कभी पृथ्वीराज कपूर को देख रखा था। उनके व्यक्तित्व और ग्रीक देवताओं जैसी सुन्दरता की कायल वे उस नौजवान से मिलकर प्रसन्न हुईं। तब तक उन्हें उस लड़के के बारे मेें कोई भी जानकरी नहीं थी, सिवाय इसके कि वह राजकपूर का सन्देश लेकर आया था।
लता मंगेशकर ने अपनी बहन मीना से कहा ‘राजकपूर ने किसी को मेरे पास मिलने भेजा था। हो सकता है वह उनके आफिस में काम करने वाला कोई लड़का हो। ….मगर वह देखने में शालीन और सुन्दर था। मुझे लगता है कि आर.के. बैनर में काम करने वाले सभी लोग देखने में उतने ही बेहतर होते हैं, जितने कि ख़ुद कपूर ख़ानदान के लोग।’ मीना मंगेशकर को यह बताने के एक-दो दिनों बाद जब वे महालक्ष्मी में आर.के. आॅफिस गयीं, तब वहाँ पर वो आदमी मौजूद था, जिसका परिचय यह कहकर कराया गया कि ‘लता जी! ये हमारी टीम की संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन के जयकिशन जी हैं।’ इतना सुनते ही उनको बड़ी शर्मिन्दगी महसूस हुई कि वे जिस काबिल म्युजिक डायरेक्टर से मुख़ातिब थीं, उसको उन्होंने आर.के. बैनर के आफिस का कोई लड़का समझ रखा था। बाद में उनको शंकर से भी मिलवाया गया।
इस तरह जयकिशन के साथ उनकी मैत्री की शुरुआत हुई। ….और सिर्फ़ जयकिशन से ही नहीं, बल्कि राजकपूर की पूरी कोर टीम से, जिसमें शंकर और जयकिशन जैसे संगीतकार थे। हसरत जयपुरी और शैलेन्द्र जैसे गीतकारों के अलावा मुख्य पुरुष आवाज़ के लिए मुकेश मौजूद थे। ख़ुद राजकपूर जैसा संवेदनशील अभिनेता व नरगिस जैसी भाव-प्रवण अभिनेत्री का साथ भी वहाँ रोशनी की झालर की मानिन्द झिलमिला रहा था। इन सबके साथ आर.के. फ़िल्म्स के लिए स्त्री स्वर की केन्द्रीय उपस्थिति के रूप में लता मंगेशकर की आमद भी हो चुकी थी। यह एक ऐसा ग्रुप बनने जा रहा था, जो भविष्य में मैरीन ड्राइव पर लड़ियों से लगे लैम्प-पोस्ट की कतारों को भी फीका करने की सामथ्र्य रखने वाला था। यही टीम बाद में ऐसे सैकड़ों सुनहरे गीतों का नजराना पेश कर पायी, जिनमें जयकिशन की सदाबहार धुनों का अपना एक अलग ही संसार बन सका। उसी के कुछ दिनों बाद 1949 में ऐतिहासिक रूप से सफल होने जा रही ‘बरसात’ फ़िल्म का पहला गीत ताड़देव के फेमस स्टूडियो में रेकाॅर्ड हुआ। लता मंगेशकर आज से सड़सठ साल पहले वहाँ पहली बार यह गाना गा रही थीं…
‘जिया बेकरार है, छायी बहार है
आजा मोरे बालमा तेरा इन्तज़ार है….