
अपने बेजोड़ स्वाद से देश-विदेश में पहचान रखने वाली गाडरवारा की तुअर दाल का कारोबार कई तरह के संकट से सिमट रहा है। जिस गाडरवारा क्षेत्र में कभी करीब 60 मिलें संचालित होती थीं, वहां आज बामुश्किल दो-तीन मिलें ही चल पा रही हैं, जिनका उत्पादन भी क्वालिटी वाली उपज न मिलने से घट रहा है।
जिले में एक जिला एक उत्पाद के तहत गाडरवारा की तुअर दाल शामिल है लेकिन तुअर का रकबा लगातार घटने से न केवल मिलों बल्कि एफपीओ को भी कम तुअर मिल रही है। यही वजह है कि बाजार में गाडवारा की तुअर दाल के नाम पर दूसरे स्थानों की दालें बिक रही हैं। वास्तविक गाडरवारा तुअर दाल की ब्रांडिंग कमजोर पड़ रही है।
जिले में गाडरवारा की तुअर दाल की पहचान नर्मदा की तलहटी की मिट्टी में पैदा होने वाली तुअर और पारंपरिक प्रसंस्करण पद्धति से जुड़ी रही है। जिले में बीते साल जहां करीब 42 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में अरहर की खेती हुई थी, इस बार रकबा घटकर 30 हजार हेक्टेयर हो गया है। लगातार घटते रकबे से स्थानीय दाल कारोबार को अपेक्षित विस्तार नहीं मिल पा रहा है। तुअर का रकबा घटने, प्रसंस्करण सुविधाओं की कमी और बाजार तक सीधी पहुंच नहीं होने से किसानों और कारोबारियों के सामने चुनौतियां बनी हुई हैं।
गाडरवारा की दाल को जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया भी चल रही है लेकिन यह टैग अब तक नहीं मिल सका है। बताया जाता है कि जिले में वर्ष 1926 में पहली दाल मिल खुली थी, इसके बाद मिलों की संख्या न केवल गाडरवारा बल्कि नरसिंहपुर, करेली में भी बढ़ती गई। लेकिन तुअर के सिमटते रकबे से कारोबारियों के साथ ही किसान भी निराश हैं।
जिले में एफपीओ के माध्यम से समूहों के जरिए तुअर की खरीद, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और ब्रांडिंग की व्यवस्था विकसित की जा रही है। जिससे किसानों को बाजार से जोडऩे और स्थानीय उत्पाद को व्यापक स्तर पर पहुंचाने की संभावनाएं बढ़ सकें।
आजीविका मिशन के करेली बीपीएम प्रमोद पारे कहते हैं कि रमखिरिया, राम पिपरिया, मानेगांव आदि गांवों में महिलाओं के समूह तुअर की दाल पांरपरिक तरीके से बनाते हैं। जो शक्ति पूजा प्रोड्यूसर कंपनी के जरिए दाल का विक्रय करते हैं। जबसे एक जिला एक उत्पाद योजना के तहत गाडरवारा की दाल को शामिल किया गया है तो समूहों में भी कार्य करने के लिए जागरूकता बढ़ी है। हालांकि तुअर दाल की मात्रा सीमित होती है, अन्य दालेें भी समूह तैयार करते हैं।
गाडरवारा के कारोबारी महेश मालपानी कहते हैं कि दलहन के दाम नहीं बढ़ने से किसानों का रूझान तुअर की खेती में कम हुआ है। पहले गाडरवारा क्षेत्र में करीब 60 दाल मिलें चलतीं थीं लेकिन अब दो ही मुश्किल से चल पाती हैं, जो सालाना 40 से 50 हजार क्विंटल दाल उत्पादन करती हैं।
गाडरवारा की दाल की जो पहचान है उसे बनाए रखने के लिए अच्छी क्वालिटी की तुअर भी मुश्किल से 30 प्रतिशत ही मिल पाती है। जिससे बहुत से मिलें बंद हो गई हैं। पहले पीस बैगन के जरिए कारोबारी दाल भेजते थे लेकिन अब रैक की सुविधा दी गई है। बैंकों ने भी पहले कारोबार को गतिमान बनाए रखने रूचि नहीं दिखाई। जिससे कारोबार लगातार घटता रहा। सरकार यदि दलहन के दामों में वृद्धि करे और किसान फसल का रकबा बढ़ाएं तो ही गाडरवारा की दाल की पहचान लौट सकती है। आज बाजार में गाडरवारा के नाम से कई स्थानों की दाल बिक रही है। ऐसे में स्थानीय उत्पाद की वास्तविक पहचान और गुणवत्ता को सुरक्षित रखना बड़ी चुनौती है।
गाडरवारा की दाल को अलग ब्रांड के रूप में स्थापित करने के लिए पैकेजिंग, गुणवत्ता की पहचान और विपणन व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है। गाडरवारा के ही कारोबारी कीर्तिराज लूनावत कहते हैं कि तुअर का उत्पादन घटने से दाल कारोबार सिमट रहा है। तुअर में किसान को उत्पादन कम मिलता है, बाजार में दाम भी ठीक नहीं मिलते इसलिए किसान दूसरी फसलें ले रहे हैं। किसान तुअर की खेती के लिए तभी प्रेरित होगा जब उसे दाम अच्छे मिलेंगे।