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Illegal Sand mining: अवैध खनन से थम रही जलीय जीवन की सांसें, महाशिर से लेकर कई प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर

Illegal Mining : मध्य प्रदेश में रेत उत्खनन और बांधों की दीवार ने मछलियों का रास्ता रोक लिया है। इसके चलते नर्मदा, चंबल और बेतवा के पारिस्थितिकी तंत्र पर संकट मंडराने लगा है।
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Jul 08, 2026
Illegal Mining Sand Mining
नदियों में रेत उत्खनन और बड़े बांधों के चलते मछली और जलीय जीव पर संकट (Photo: AI Generated)

Illegal Sand mining and Crisis: नदियां, जिन्हें प्रदेश की जीवनरेखा कहा जाता है, आज अवैध खनन (Illegal Mining) के कारण एक मौन त्रासदी से जूझ रही हैं। इन नदियों में न केवल पानी कम हो रहा है, बल्कि सदियों से इनमें फलने-फूलने वाली मछलियों की कई दुर्लभ प्रजातियां अब इतिहास बनने की कगार पर हैं। नर्मदा (Narmada) की रानी कही जाने वाली राजकीय मछली महाशीर से लेकर चंबल की विशाल गूँज तक, जलीय जैव-विविधता का ग्राफ तेजी से नीचे गिर रहा है।

कहां, कौन सी प्रजाति पर है खतरा?

प्रदेश की प्रमुख नदियों में मछलियों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक बनी हुई है।

नर्मदा बेसिन : नर्मदा, सोन और जोहिला नदी में अधिक गिरावट दर्ज की गई है। राजकीय मछली महाशीर अपने प्राकृतिक प्रजनन स्थल खो रही है। इसके साथ ही चितला और हिलसा जैसी मछलियां अब केवल पुरानी यादों में सिमटती जा रही हैं।

चंबल की धारा: चंबल में डॉल्फिन और घड़ियालों के सह-अस्तित्व वाली मछलियां अवैध शिकार की भेंट चढ़ रही हैं। विशाल कैटफिश बगैरियस (गूँज) अब गिने-चुने स्थानों पर ही शेष है।

बेतवा-केन और सोन: बेतवा में ताजे पानी की शार्क कही जाने वाली वल्लागो अट्टू और सोन नदी में बटर कैटफिश (पाबदा) की संख्या में भारी कमी आई है।

क्यों गायब हो रही हैं मछलियां?

अत्यधिक रेत उत्खनन के चलते मछलियां गायब हो रही हैं। नदियों के तल से मशीनों द्वारा रेत निकालने के कारण मछलियों के प्राकृतिक ब्रीडिंग ग्राउंड पूरी तरह नष्ट हो गए हैं।

नदियों पर ऊंचे-ऊंचे बांध बनाए जाने के चलते मछलियों का प्रवास मार्ग बाधित हुआ है। प्रजनन के लिए धारा के विपरीत ऊपर जाने वाली मछलियां अवरोधों के कारण बीच में ही दम तोड़ रही हैं।

प्रदेश की नदियों में विदेशी हमलावर मछली की प्रजातियां आ गई हैं जिसके चलते देशी मछलियों के अस्तित्व को खतरा पैदा हो चुका है। तिलापिया जैसी विदेशी मछलियों के आक्रमण ने स्थानीय प्रजातियों के भोजन और आवास पर कब्जा कर लिया है, जिससे हमारी देशी मछलियां पनप नहीं पा रही हैं।

क्या हो रहा है नुकसान?

मछलियों के गायब होने का सीधा असर नदियों की स्वच्छता और स्वास्थ्य पर पड़ता है। मछलियां जलीय पारिस्थितिकी तंत्र की सफाईकर्मी होती हैं, जो जैविक कचरे को साफ कर जल को शुद्ध रखती हैं। इनके खत्म होने से जल प्रदूषण बढ़ेगा, लाखों मछुआरों की आजीविका छिनेगी और पूरी खाद्य श्रृंखला असंतुलित हो जाएगी।

संरक्षण के लिए क्या हों उपाय?

  • नदियों के संवेदनशील हिस्सों को नो-माइनिंग जोन घोषित कर वहां मानवीय हस्तक्षेप पूरी तरह प्रतिबंधित हो।
  • महाशीर जैसी महत्वपूर्ण मछलियों के लिए कृत्रिम हैचरी विकसित कर उन्हें वापस नदियों में छोड़ने की व्यवस्था हो।
  • पुराने और नए बांधों में मछलियों के आवागमन के लिए विशेष फिश पैसेज या फिश लैडर बनाए जाने चाहिए।
  • स्थानीय मछुआरों को जागरूक कर उन्हें दुर्लभ और छोटी प्रजातियों को पकडऩे से रोकना होगा।

'हमारी नदियां बीमार हो रही हैं'

अमरकंटक के आइजीएनटीयू में जूलॉजी के प्रो. योगेंद्र प्यासी ने पत्रिका से बताया कि नदियों का पारिस्थितिकी तंत्र केवल बहते पानी से नहीं, बल्कि उसमें मौजूद जैव-विविधता से बनता है। महाशीर जैसी मछलियों की घटती संख्या इस बात का स्पष्ट संकेत है कि हमारी नदियां 'बीमार' हैं। यदि हमने समय रहते 'फिश लैडर' और 'रिवर रांचिंग' जैसे ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ी इन मछलियों को केवल किताबों के पन्नों पर ही देख पाएगी।

Updated on:
08 Jul 2026 12:26 pm
Published on:
08 Jul 2026 12:25 pm