
Illegal Sand mining and Crisis: नदियां, जिन्हें प्रदेश की जीवनरेखा कहा जाता है, आज अवैध खनन (Illegal Mining) के कारण एक मौन त्रासदी से जूझ रही हैं। इन नदियों में न केवल पानी कम हो रहा है, बल्कि सदियों से इनमें फलने-फूलने वाली मछलियों की कई दुर्लभ प्रजातियां अब इतिहास बनने की कगार पर हैं। नर्मदा (Narmada) की रानी कही जाने वाली राजकीय मछली महाशीर से लेकर चंबल की विशाल गूँज तक, जलीय जैव-विविधता का ग्राफ तेजी से नीचे गिर रहा है।
प्रदेश की प्रमुख नदियों में मछलियों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक बनी हुई है।
नर्मदा बेसिन : नर्मदा, सोन और जोहिला नदी में अधिक गिरावट दर्ज की गई है। राजकीय मछली महाशीर अपने प्राकृतिक प्रजनन स्थल खो रही है। इसके साथ ही चितला और हिलसा जैसी मछलियां अब केवल पुरानी यादों में सिमटती जा रही हैं।
चंबल की धारा: चंबल में डॉल्फिन और घड़ियालों के सह-अस्तित्व वाली मछलियां अवैध शिकार की भेंट चढ़ रही हैं। विशाल कैटफिश बगैरियस (गूँज) अब गिने-चुने स्थानों पर ही शेष है।
बेतवा-केन और सोन: बेतवा में ताजे पानी की शार्क कही जाने वाली वल्लागो अट्टू और सोन नदी में बटर कैटफिश (पाबदा) की संख्या में भारी कमी आई है।
अत्यधिक रेत उत्खनन के चलते मछलियां गायब हो रही हैं। नदियों के तल से मशीनों द्वारा रेत निकालने के कारण मछलियों के प्राकृतिक ब्रीडिंग ग्राउंड पूरी तरह नष्ट हो गए हैं।
नदियों पर ऊंचे-ऊंचे बांध बनाए जाने के चलते मछलियों का प्रवास मार्ग बाधित हुआ है। प्रजनन के लिए धारा के विपरीत ऊपर जाने वाली मछलियां अवरोधों के कारण बीच में ही दम तोड़ रही हैं।
प्रदेश की नदियों में विदेशी हमलावर मछली की प्रजातियां आ गई हैं जिसके चलते देशी मछलियों के अस्तित्व को खतरा पैदा हो चुका है। तिलापिया जैसी विदेशी मछलियों के आक्रमण ने स्थानीय प्रजातियों के भोजन और आवास पर कब्जा कर लिया है, जिससे हमारी देशी मछलियां पनप नहीं पा रही हैं।
मछलियों के गायब होने का सीधा असर नदियों की स्वच्छता और स्वास्थ्य पर पड़ता है। मछलियां जलीय पारिस्थितिकी तंत्र की सफाईकर्मी होती हैं, जो जैविक कचरे को साफ कर जल को शुद्ध रखती हैं। इनके खत्म होने से जल प्रदूषण बढ़ेगा, लाखों मछुआरों की आजीविका छिनेगी और पूरी खाद्य श्रृंखला असंतुलित हो जाएगी।
अमरकंटक के आइजीएनटीयू में जूलॉजी के प्रो. योगेंद्र प्यासी ने पत्रिका से बताया कि नदियों का पारिस्थितिकी तंत्र केवल बहते पानी से नहीं, बल्कि उसमें मौजूद जैव-विविधता से बनता है। महाशीर जैसी मछलियों की घटती संख्या इस बात का स्पष्ट संकेत है कि हमारी नदियां 'बीमार' हैं। यदि हमने समय रहते 'फिश लैडर' और 'रिवर रांचिंग' जैसे ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ी इन मछलियों को केवल किताबों के पन्नों पर ही देख पाएगी।