
Shree Mahalaxmi Temple Ratlam: आस्था जब अपनी सीमाएं लांघकर परंपरा बन जाती है और परंपरा जब पूरी दुनिया का ध्यान खींचने लगे तो वह केवल धार्मिक आयोजन नहीं रह जाती, बल्कि एक शहर की पहचान बन जाती है। रतलाम के माणकचौक स्थित प्राचीन महालक्ष्मी मंदिर की दीपावली भी कुछ ऐसी ही है।
यहां मां के चरणों में श्रद्धालु केवल फूल, प्रसाद और दीप नहीं चढ़ाते, बल्कि अपने घरों और प्रतिष्ठानों की वर्षों से संजोकर रखी संपत्ति, तिजोरियां, सोने-चांदी के आभूषण और नकदी तक समर्पित कर देते हैं। पांच दिनों तक मां का दरबार करोड़ों की धन-संपदा से सजा रहता है। अपने इसी अद्भुत शृंगार और अनूठी परंपरा के कारण रतलाम का यह मंदिर पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो गया है। दीपोत्सव के दौरान यहां होने वाले शृंगार को देखने और मां के दर्शन करने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु पहुंचते हैं।
मंदिर में धन-संपदा का यह वैभव केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं की उस अटूट आस्था का प्रतीक है, जिसमें वे अपनी कमाई और संपन्नता को मां महालक्ष्मी के चरणों में समर्पित कर स्वयं को धन्य मानते हैं। किसी की तिजोरी में पीढ़ियों से सुरक्षित रखे सोने-चांदी के आभूषण होते हैं तो किसी के प्रतिष्ठान की नकदी और बहुमूल्य वस्तुएं। पांच दिनों के लिए यह सब मां के दरबार का हिस्सा बन जाता है। श्रद्धालुओं की निजी संपन्नता सामूहिक आस्था के इस अनूठे स्वरूप में बदल जाती है।
महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली पर धन-संपदा से शृंगार की परंपरा वर्षों पुरानी है। प्राचीन समय में रतलाम राजघराने की ओर से माता के शृंगार और पूजन के लिए सामग्री भेजी जाती थी। समय के साथ मां महालक्ष्मी के प्रति श्रद्धा बढ़ती गई और यह परंपरा अपने अनूठे स्वरूप में विकसित होती चली गई। धीरे-धीरे शहर के व्यापारी, प्रतिष्ठित परिवार और आम श्रद्धालु भी इसमें सहभागी बनने लगे।
आज स्थिति यह है कि केवल रतलाम ही नहीं, देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु अपनी तिजोरियां, नकदी और बहुमूल्य आभूषण लेकर माता के दरबार में पहुंचते हैं। घरों और प्रतिष्ठानों में सुरक्षित रखी संपदा को पांच दिनों के लिए मां के चरणों में समर्पित करना श्रद्धालुओं के लिए विशेष पुण्य और सौभाग्य का अवसर बन गया है। यही अनूठी परंपरा रतलाम के महालक्ष्मी मंदिर को देश-दुनिया के धार्मिक स्थलों में अलग पहचान दिलाती है।
इस बार दीपावली पर माता का शृंगार भी विशेष आकर्षण का केंद्र रहेगा। मां को हीरे का हार पहनाया जाएगा। माणक-मोती से सजी आकर्षक पोशाक उनके अलौकिक स्वरूप को और भव्य बनाएगी। सोने-चांदी के आभूषण, चांदी के सिक्के, विदेशी करेंसी और नोटों की गड्डियां दरबार की शोभा बढ़ाएंगी। नोटों की लड़ियां और चांदी के हाथियों से सजी सजावट मंदिर को किसी कुबेर के खजाने जैसा स्वरूप देगी।
माता के इस शृंगार में शामिल हर वस्तु के पीछे किसी न किसी श्रद्धालु की आस्था जुड़ी है। कोई अपनी तिजोरी मां के दरबार में रखवाता है तो कोई वर्षों से संभालकर रखे आभूषण अर्पित करता है। पांच दिनों तक मंदिर में धन-संपदा का यह अनूठा संसार श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। यहां आने वाले भक्तों के लिए यह केवल वैभव देखने का अवसर नहीं, बल्कि मां महालक्ष्मी के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने का पर्व भी है।
पांच दिवसीय दीपोत्सव की शुरुआत धनतेरस से होगी। मंदिर के अश्विनी पुजारी ने बताया कि धनतेरस की सुबह 5 बजे महालक्ष्मी मंदिर के पट श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दिए जाएंगे। आरती और पूजन के बाद महिला श्रद्धालुओं को अभिमंत्रित कुबेर पोटली वितरित की जाएगी। इसे प्राप्त करने के लिए भी बड़ी संख्या में महिलाएं मंदिर पहुंचती हैं।
मान्यता है कि कुबेर पोटली को घर या प्रतिष्ठान में रखने से सुख-समृद्धि बनी रहती है तथा धन-धान्य में वृद्धि होती है। श्रद्धालु इसे मां महालक्ष्मी और कुबेर के आशीर्वाद के प्रतीक के रूप में अपने घर ले जाते हैं। दीपावली के अवसर पर इसे घर की तिजोरी या पूजा स्थल में रखना शुभ माना जाता है।
धनतेरस से भाईदूज तक मंदिर में पांच दिवसीय उत्सव मनाया जाएगा। धनतेरस, रूप चतुर्दशी, दीपावली, पड़वा और भाईदूज पर श्रद्धालु माता के अलग-अलग शृंगार और भव्य दरबार के दर्शन कर सकेंगे। इन पांच दिनों में मंदिर में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहेगी।
करोड़ों की धन-संपदा, सोने-चांदी के आभूषण और बहुमूल्य वस्तुओं के कारण सुरक्षा की विशेष व्यवस्था भी की गई है। मंदिर परिसर में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं और पुलिस जवान तैनात रहेंगे।
रतलाम के इस मंदिर की खासियत यही है कि यहां संपन्नता का अर्थ केवल धन का संग्रह नहीं, बल्कि उसे मां के चरणों में अर्पित करने की भावना है। श्रद्धालु अपनी तिजोरियों के साथ अपनी खुशियां, उम्मीदें और परिवार की समृद्धि की कामना भी मां के दरबार में लेकर आते हैं। पांच दिनों तक करोड़ों की संपदा से सजा यह दरबार दुनिया को रतलाम की उस आस्था से परिचित कराता है, जिसकी चमक सोने-चांदी और हीरे-मोती से कहीं अधिक है।