MP News: मेजर ध्यान चंद की हॉकी स्टिक में जादू था, तो दिमाग में गोल करने का लक्ष्य, लेकिन उनके सीने में धड़कता था एक पिता का दिल, बड़ों का सम्मान और हर रिश्ते की कद्र, जिनके लिए वे हमेशा फिक्रमंद रहे, अनूठे अंदाज में प्रेम जताते रहे, patrika.com पर पढ़ें एक पिता मेजर ध्यान चंद के अनकहे किस्से...
MP News: संजना कुमार@ patrika.com: मेजर ध्यान चंद को एक खिलाड़ी के रूप में हर किसी ने देखा और जाना, लेकिन इससे इतर उनकी एक और छवि…एक और चेहरा…जिसे patrika.com ने उनके बेटे अशोक कुमार से जानने की कोशिश की…हॉकी से जग जीतने वाले खिलाड़ी मेजर ध्यान चंद बेहद फिक्रमंद और नरम दिल पिता के रूप में… पढ़ें अनकहे किस्से…
हमारे पिता फौज में थे, अनुशासन उनकी आदत में शुमार था। वे साल में दो से तीन महीने ही घर आते थे। उन्होंने वो अनुशासन हमें भी दिया। हमने बचपन से देखा कि उन्होंने अपने घर के बड़ों की हर बात मानी, उन्हें हमेशा साथ और आगे लेकर चले। वही हमने भी उनसे सीखा।
मेजर ध्यान चंद के बेटे अशोक कुमार एक किस्सा सुनाते हुए कहते हैं कि, 1932 की बात है। तब उनके पिता उनके बाबू जी की ड्यूटी वेस्ट फ्रंटियर पर लगी थी। उस समय भारत का विभाजन नहीं हुआ था। तब क्वेटा शहर में बड़ा भूकंप आया। 7.7 की तीव्रता का इस भूकंप ने क्वेटा शहर के साथ ही उसके आस-पास के ग्रामीण इलाकों को भी तबाह कर दिया था। हजारों लोग मारे गए, कई बेघर हुए। तब मेरे पिता ने अपने सिग्नेचर (ऑटोग्राफ) बेचे। उससे उन्होंने जितनी भी धन राशि कमाई, सब भूकंप पीड़ितों को दान कर दी।
मध्यप्रदेशके रहने वाले अशोक कुमार बताते हैं कि हमारा परिवार एक संयुक्त परिवार था। हमारे परिवार में चाचा का परिवार, बुआ का परिवार, ताऊ का परिवार सभी एक साथ रहते थे। उन सभी के पालन-पोषण की जिम्मेदारी हमारे बाबू जी पर ही थी।
हमारे पिता फौज में थे। घर बहुत कम आना-जाना होता था। हमारी मां एक ग्रामीण परिवेश से थीं। लेकिन बाबू जी के साथ रहते हुए वे धीरे-धीरे सब सीख गईं। यहां तक कि हम पिता से कम ही मिल पाते थे। लेकिन मां ने हमें कभी भी उनकी कमी महसूस नहीं होने दीं।
हम 11 बहन-भाई थे। हमारे पिता को जब भी फौज से छुट्टी मिलती और वो घर आते, तो उन्हें आते-आते रात हो जाया करती थी। हम बच्चे सो चुके होते थे। लेकिन घर आते ही वो सबसे पहले हमें जगाते और रबड़ी या रसगुल्ले खिलाते थे। वो पल आज भी उतने ही मीठे हैं, जितने कि उस वक्त हुआ करते थे।
अशोक कहते हैं कि हमारे पिता हमेशा से हमारी पढ़ाई और करियर को लेकर बेहद फिक्रमंद थे। उन्होंने कभी भी हॉकी की चर्चा हमसे नहीं की। सिर्फ इसलिए कि हमें हॉकी खेलने का शौक न लग जाए। लेकिन हम उनसे छिपकर हॉकी खेलते थे। छिप-छिपकर उनकी बातें सुना करते थे, जो वो उन लोगों से किया करते थे, जो उनसे मिलने घर आते थे।
उनकी हॉकी, उनका करियर, उनकी शोहरत, हर बात हम सुनते और उन्हें याद रखते उनसे सीखते थे। लेकिन एक पिता के रूप में उन्होंने हमेशा यही चाहा कि हम प्लेयर नहीं, बल्कि पढ़-लिखकर नौकरी करने वाले बने। ताकि अपनी भावी पीढ़ियों को सुनहरा भविष्य दे सकें। उस जमाने में खेल की वेल्यू नहीं थी, करियर या पैसा नहीं था, घर-परिवार पालना बड़ी जिम्मेदारी होता था। बता दें कि मेजर ध्यान चंद के बेटे अशोक कुमार पूर्व हॉकी खिलाड़ी और अब कोच हैं। वर्तमान में वेग्वालियर में रहते हैं।