Human Rights Violation: दुनिया के ऐसे देश जहां आम नागरिकों पर किसी न किसी किस्म का पहरा लगा हुआ। कहीं पढ़ने के लिए स्कूल नहीं जा सकने पर पाबंदी लगी हुई है, तो कहीं खुद आप यह तय नहीं कर सकते हैं कि क्या पहन सकते हैं और क्या नहीं।आइए जानते हैं कि मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट क्या कहती है?
Human Rights Violation: लोकतंत्र और मानवाधिकार किसी भी समाज की सबसे मजबूत बुनियाद होती हैं। इस आधुनिक दौर में भी दुनिया के कई देशों में नागरिकों की बुनियादी स्वतंत्रता पूरी तरह नहीं मिल पाई है। बोलने की आजादी हो, धर्म मानने की छूट हो या महिलाओं के अधिकार, दुनिया के कई देशों में आज भी आम लोगों की जिंदगी सरकारी नियमों और पाबंदियों के बीच गुजर रही है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट के मुताबिक कई देशों में सरकार की बुराई करना, अपनी पसंद के कपड़े पहनना या इंटरनेट को खुलकर इस्तेमाल करना भी बड़ा अपराध माना जाता है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां संविधान ने हमें खुलकर बोलने, अपनी पसंद का धर्म चुनने और हक के लिए आवाज उठाने की पूरी आजादी दी है। देश में सरकार की बातों पर सही तरीके से सवाल उठाना, अपनी पसंद का धर्म अपनाना और सम्मानजनक जीवन जीना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। भारत में मीडिया और आम लोगों को अपनी बात खुलकर और सही तरीके से रखने की आजादी मिली हुई है। लेकिन दुनिया में कई ऐसे देश भी हैं जहां मानवाधिकार केवल कागजों तक सीमित हैं। सरकारें नागरिकों के निजी जीवन, उनकी सोच और उनके अधिकारों को पूरी तरह से नियंत्रित कर रही हैं।
उत्तर कोरिया को दुनिया के सबसे ज्यादा पाबंदियों और सूचना नियंत्रण वाले देशों में गिना जाता है। करीब 2.6 करोड़ की आबादी वाले इस देश में आम नागरिकों को इंटरनेट के इस्तेमाल की आंशिक पाबंदी है। यहां की पूरी आबादी केवल सरकारी मीडिया और राज्य द्वारा नियंत्रित सूचनाओं पर निर्भर है। प्रशासन के खिलाफ कोई भी बयान देना या असहमति जताना यहां राजद्रोह के समान है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, विदेशी मीडिया, सोशल मीडिया या वेबसाइट्स का इस्तेमाल करते हुए पकड़े जाने पर नागरिकों को जेल या कठोर श्रम शिविरों में भेज दिया जाता है। इस देश में नागरिक स्वतंत्रता का कोई अस्तित्व नहीं है और हर गतिविधि पर स्टेट का सख्त पहरा है।
तकनीक और विकास में दुनिया को टक्कर देने वाला चीन, मानवाधिकारों के मुद्दे पर अक्सर दुनिया भर के सवालों का सामना करता है। चीन के शिनजियांग प्रांत में करीब 1.1 से 1.2 करोड़ उइगर और अन्य मुस्लिम समुदाय निवास करते हैं। उइगर एक तुर्की भाषा बोलने वाला मुस्लिम समुदाय है, जिसकी अपनी अलग संस्कृति और पहचान है। मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक, इस इलाके में लोगों पर कड़ी डिजिटल निगरानी रखी जाती है। सड़कों पर लगे फेस स्कैनिंग कैमरों से लेकर मोबाइल और दूसरे डिजिटल उपकरणों तक, हर गतिविधि पर सरकार की नजर रहती है। रिपोर्ट्स के अनुसार धार्मिक गतिविधियों, सांस्कृतिक पहचान और मस्जिदों पर सख्त नियंत्रण है। वहीं, चीन पर लाखों लोगों को 'री-एजुकेशन कैंप' हिरासत केंद्रों में रखने के आरोप भी लगते रहे हैं, पर चीनी सरकार इन्हें कौशल विकास केंद्र बताती है।
अफगानिस्तान में सत्ता में तालिबान की वापसी के बाद करोड़ों महिलाओं और लड़कियों की जिंदगी पूरी तरह बदल गई है। करीब 4.2 करोड़ की आबादी वाले इस देश में लगभग 2 करोड़ महिलाएं हैं। हालात इतने बुरे हैं कि महिलाओं और लड़कियों घर से बाहर निकलना भी मुश्किल हो गया है। सरकार ने लड़कियों के स्कूल और कॉलेज जाने पर ताला लगा दिया है, जिसकी वजह से 14 लाख से ज्यादा बच्चियां शिक्षा से दूर हो गई हैं। महिलाएं अपनी मर्जी से नौकरी नहीं कर सकतीं और किसी पुरुष रिश्तेदार को साथ में लिए बगैर कहीं सफर नहीं कर सकती हैं। दुनिया भर में इसे महिलाओं के अधिकारों का सबसे बड़ा संकट माना जा रहा है, क्योंकि एक पूरी आबादी को घर के अंदर कैद कर दिया गया है। दुनियाभर में इसे महिलाओं के मूल मानवाधिकारों काहनन माना जा रहा है।
ईरान में महिलाओं के पहनावे और उनके रहन-सहन को लेकर कानून बहुत ज्यादा कड़े हैं। लगभग 9 करोड़ की आबादी वाले इस देश में मोरल पुलिस का हर वक्त पहरा रहता है, जो यह देखती है कि महिलाओं ने हिजाब पहना है या नहीं। अगर कोई महिला हिजाब नहीं पहनती, तो उसे सख्त सजा दी जाती है। कुछ समय में इन पाबंदियों के खिलाफ ईरान की महिलाओंने बड़ा आंदोलन भी किए था, मानवाधिकार संस्थाओं की रिपोर्ट के अनुसार इन प्रदर्शनों को दबाने के लिए सरकार ने इंटरनेट बंद करके हजारों प्रदर्शनकारियों गिरफ्तारियां भी किया था।ईरान में सोशल मीडिया पर भी सरकार की कड़ी नजर रहती है, जिससे आम नागरिक अपनी बात रखने से भी डरता है।
अमेरिका दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्रों में से एक है, लेकिन वहां भी नस्लीय भेदभाव गोरे और अश्वेत लोगों के बीच एक बड़ी समस्या बनी हुई है। करीब 34 करोड़ की आबादी वाले अमेरिका में 4.8 करोड़ अश्वेत नागरिक हैं, जिनकी संपत्ति और कमाई गोरे परिवारों के मुकाबले काफी कम है। आर्थिक असमानता के साथ-साथ वहां की पुलिस और कानूनी सिस्टम पर भी भेदभाव के आरोप लगते रहते हैं। अश्वेत लोगों के खिलाफ पुलिस की सख्ती और नाइंसाफी की वजह से ही अमेरिका में 'ब्लैक लाइव्स मैटर' (Black Lives Matter) जैसे बड़े आंदोलन हुए। एक विकसित देश होने के बाद भी सबको बराबर न्याय और सम्मान दिलाना अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती है।
मानवाधिकारों का हनन एक वैश्विक चुनौती है। हर देश में पाबंदियों की वजह अलग हो सकती है कहीं तानाशाही का खौफ है, कहीं धर्म के नाम पर कट्टरता है, तो कहीं समाज में गहरा भेदभाव। कारण चाहे जो भी हो, एक आम इंसान की आजादी पर इसका सीधा असर पड़ता है। किसी से उसके बुनियादी हक छीन लिए जाते हैं, तो वह अपनी पहचान खो देता है। भारत में बोलने की आजादी व अन्य लोकतांत्रिक अधिकार मिले हैं, वे कितने अनमोल हैं। मानवाधिकारों की रक्षा करना सिर्फ किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की जिम्मेदारी है। इंसानियत को बचाने के लिए अभी वैश्विक स्तर पर ठोस प्रयासों की जरूरत है।