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सर्विलांस, ड्रोन और एआई की ताकत से सिमटता लाल गलियारा, नक्सल मुक्त बस्तर का डेडलाइन मार्च 2026

Naxal Free Bastar: बस्तर में नक्सल उन्मूलन अभियान तेज, एआई आधारित निगरानी, लक्षित ऑपरेशन और आत्मसमर्पण नीति के बीच बड़ा सवाल—क्या 2026 तक सच में नक्सल मुक्त होगा बस्तर? ग्राउंड रिपोर्ट और विश्लेषण।

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बस्तर का मार्च 2026 डेडलाइन (photo source- Patrika)

Naxal Free Bastar: छत्तीसगढ़ में नक्सल उन्मूलन अभियान अब अपने निर्णायक दौर में प्रवेश करता दिख रहा है। 8 फरवरी को Raipur में केंद्रीय गृहमंत्री Amit Shah ने उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक लेकर सुरक्षा हालात और अभियान की प्रगति का आकलन किया। बैठक में स्पष्ट निर्देश दिए गए कि तय समयसीमा के भीतर देश को नक्सलमुक्त घोषित करने के लिए सभी एजेंसियां समन्वित और परिणामोन्मुख रणनीति अपनाएं। विशेष जोर बचे हुए नक्सलियों के आत्मसमर्पण पर रहा।

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तकनीक आधारित नई रणनीति

सूत्रों के अनुसार, अब अभियान में पारंपरिक कॉम्बिंग ऑपरेशन के साथ-साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा एनालिटिक्स का व्यापक उपयोग किया जा रहा है।

ड्रोन और इमेजिंग सिस्टम से जंगल क्षेत्रों की निगरानी

संदिग्ध गतिविधियों की पहचान के लिए एआई आधारित विश्लेषण

डिजिटल डेटा के आधार पर सुरक्षा बलों की सटीक तैनाती

नक्सलियों के परिवारों और नेटवर्क पर निगरानी

इस तकनीकी बढ़त से सुरक्षा बलों को रीयल-टाइम इनपुट मिल रहे हैं, जिससे ऑपरेशन अधिक लक्षित और प्रभावी हो रहे हैं।

बस्तर के तीन जिलों पर फोकस

Sundarraj P., आईजी बस्तर रेंज, के मुताबिक कार्ययोजना पर प्रभावी ढंग से अमल हो रहा है। विशेष रूप से Sukma, Bijapur और Narayanpur जिलों में लक्षित अभियान चलाए जा रहे हैं, जहां शेष नक्सली संरचना को खत्म करने पर फोकस है। मार्च 2026 तक “नक्सल मुक्त बस्तर” के लक्ष्य को हासिल करने के लिए सातों जिलों में समन्वित और बहुआयामी अभियान जारी हैं।

बड़े झटके और नेतृत्व का पतन

पिछले 15 महीनों में 400 से अधिक नक्सली अलग-अलग मुठभेड़ों में मारे जा चुके हैं। शीर्ष नेतृत्व को भी भारी नुकसान हुआ है।

Basavaraju उर्फ बसवा राजू
Hidma

सहित लगभग डेढ़ दर्जन केंद्रीय कमेटी सदस्य मारे गए या निष्क्रिय हुए हैं। कई बड़े नेताओं ने आत्मसमर्पण भी किया है। सूत्रों के मुताबिक अब देवजी, मिसिर बेसरा और पापाराव जैसे आधा दर्जन शीर्ष नक्सली ही सक्रिय बचे हैं, जिनमें से कुछ के तेलंगाना में छिपे होने की आशंका है।

दबाव, दहशत और सामाजिक बदलाव

लगातार ऑपरेशन और संगठन के कमजोर पड़ते ढांचे से नक्सली कैडर में असमंजस और भय का माहौल है। कई इलाकों में स्थानीय स्तर पर दहशत और हिंसक प्रतिक्रियाओं की घटनाएं भी सामने आई हैं। सुरक्षा एजेंसियां इन परिस्थितियों से निपटने के लिए सतर्क हैं और नागरिक सुरक्षा को प्राथमिकता दे रही हैं।

आत्मसमर्पण और पुनर्वास पर जोर

रणनीति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू पुनर्वास है। सरकार की आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति के तहत मुख्यधारा में लौटने वाले नक्सलियों को आर्थिक सहायता, कौशल प्रशिक्षण और पुनर्वास पैकेज दिया जा रहा है। सुरक्षा बलों का मानना है कि सख्ती और संवेदनशीलता के संतुलित दृष्टिकोण से ही स्थायी शांति संभव है।

मार्च 2026 तक नक्सल मुक्त बस्तर के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पुलिस बस्तर के सभी सातों जिलों में समन्वित और बहुआयामी कार्ययोजना पर प्रभावी रूप से अमल किया जा रहा है। विशेष रूप से सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर जिलों पर केंद्रित प्रयास किए जा रहे हैं, जहां शेष नक्सली संरचना को समाप्त करने हेतु लक्षित अभियान' संचालित है- सुंदरराज पी., आईजी बस्तर रेंज

आत्मसमर्पण से टूट रहा नक्सलियों का गढ़

बस्तर संभाग लंबे समय से वाम उग्रवाद का प्रमुख गढ़ रहा है। घने जंगल, सीमावर्ती राज्य और दूरस्थ गांवों के कारण यहां नक्सली संगठन ने वर्षों तक समानांतर प्रभाव कायम रखा। वर्ष 2010 के बाद केंद्र और राज्य सरकार ने संयुक्त रूप से सुरक्षा ढांचे को मजबूत करना शुरू किया—नए सुरक्षा कैंप, सड़क निर्माण, मोबाइल टावर, राशन व स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच और शिक्षा संस्थानों का विस्तार किया गया।

केंद्र सरकार की “सुरक्षा और विकास” की दोहरी रणनीति के तहत एक ओर आक्रामक ऑपरेशन चलाए गए, तो दूसरी ओर आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति को प्रोत्साहित किया गया। हाल के वर्षों में बड़े कमांडरों के मारे जाने और सैकड़ों कैडर के आत्मसमर्पण से संगठन का ढांचा कमजोर पड़ा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक आधारित निगरानी, बेहतर खुफिया समन्वय और स्थानीय विकास योजनाओं के संयुक्त प्रभाव से नक्सली प्रभाव क्षेत्र सिमटता जा रहा है। हालांकि शेष बचे शीर्ष नेतृत्व और सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय छोटे समूह अब भी चुनौती बने हुए हैं।

Updated on:
17 Feb 2026 02:48 pm
Published on:
17 Feb 2026 02:47 pm
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