Migratory birds: कई दशकों तक हर वर्ष सर्दियों के आगमन के साथ ही सुदूर साइबेरिया सहित अन्य ठंडे इलाकों से हजारों प्रवासी पक्षी यहां पहुंचते थे। जनवरी-फरवरी के महीनों में जलाशय का दृश्य किसी प्राकृतिक उत्सव से कम नहीं होता था।
Migratory birds: छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले का ऐतिहासिक छुईहा जलाशय, जो कभी शीत ऋतु में हजारों प्रवासी पक्षियों की रंग-बिरंगी चहचहाहट से गूंजा करता था, आज सन्नाटे का प्रतीक बनता जा रहा है। बीते कुछ वर्षों में यह जलाशय धीरे-धीरे अपनी वह पहचान खो रहा है, जिसके कारण यह पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध था।
कई दशकों तक हर वर्ष सर्दियों के आगमन के साथ ही सुदूर साइबेरिया सहित अन्य ठंडे इलाकों से हजारों प्रवासी पक्षी यहां पहुंचते थे। जनवरी-फरवरी के महीनों में जलाशय का दृश्य किसी प्राकृतिक उत्सव से कम नहीं होता था। किंतु बीते एक दशक के दौरान प्रवासी पक्षियों की संख्या में लगातार गिरावट देखी जा रही है। इस वर्ष भी हालात चिंताजनक रहे। जहां कभी हजारों पक्षी नजर आते थे, वहां अब महज कुछ सौ पक्षी ही दिखाई दे रहे हैं। इससे पर्यावरण प्रेमियों के साथ-साथ स्थानीय नागरिकों में भी निराशा व्याप्त है।
नगर सीमा से लगभग दो किलोमीटर दूर छुईहा ग्राम में स्थित यह जलाशय ब्रिटिशकालीन धरोहर है। लगभग सौ एकड़ क्षेत्र में फैला यह जलाशय बीबीसी (बलौदाबाजार ब्रांच केनाल) के माध्यम से भरा जाता है। यह जलाशय दर्जन भर गांवों की निस्तारी की जरूरतें पूरी करने के साथ-साथ पूरे बलौदाबाजार क्षेत्र के भूजल स्तर को रिचार्ज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
गर्मियों के मौसम में भी जलाशय में पानी उपलब्ध रहने से सोनपुरी, छुईहा मालगुजारी, छुईहा रैयतवारी, भरसेली, भरसेला सहित आसपास के कई गांवों के लोगों को राहत मिलती है। इसी कारण यह जलाशय क्षेत्र के लिए जीवनरेखा माना जाता रहा है।
वन्य प्राणी विशेषज्ञों के अनुसार, दो दशक पहले तक छुईहा जलाशय में 12 से 15 प्रजातियों के लगभग तीन से चार हजार प्रवासी पक्षी प्रतिवर्ष पहुंचते थे। वर्तमान में स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। हालिया निरीक्षण के दौरान जलाशय में मात्र 3 से 4 प्रजातियों के कुछ सौ प्रवासी पक्षी ही नजर आए, जिससे पूरा क्षेत्र सूना प्रतीत हो रहा है।
प्रवासी पक्षियों की घटती संख्या के पीछे कई गंभीर कारण सामने आए हैं। जलाशय के आसपास बढ़ता अतिक्रमण, शिकारियों की गतिविधियां, तेजी से होता औद्योगीकरण, कारखानों से निकलने वाला जल एवं ध्वनि प्रदूषण, तथा लोगों की अत्यधिक आवाजाही से पक्षियों का प्राकृतिक आवास प्रभावित हो रहा है। इसके अलावा, जलाशय के निर्माण के बाद से अब तक इसकी कभी योजनाबद्ध ढंग से सफाई और गहरीकरण नहीं किया गया। परिणामस्वरूप गर्मियों के दौरान जलाशय का जलस्तर तेजी से गिर जाता है, जिससे प्रवासी पक्षियों के लिए अनुकूल वातावरण समाप्त होता जा रहा है।
पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि यदि समय रहते जलाशय के संरक्षण हेतु ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में छुईहा जलाशय से प्रवासी पक्षियों का आना पूरी तरह बंद हो सकता है। प्रशासन की उदासीनता और संरक्षण योजनाओं के अभाव का असर अब स्पष्ट रूप से नजर आने लगा है।आवश्यक है कि जलाशय को बचाने के लिए अतिक्रमण हटाने, शिकार पर सख्ती, प्रदूषण नियंत्रण, नियमित सफाई और गहरीकरण जैसे कदम तत्काल उठाए जाएं, ताकि एक बार फिर छुईहा जलाशय में प्रवासी पक्षियों की चहचहाहट लौट सके और इसकी खोई हुई पहचान बहाल हो सके।