Gadget Addiciton: अब युवाओं के दिमाग पर भारी पड़ रही है। छोटे-छोटे फैसलों की लगातार भरमार ने युवाओं को ‘डिसीजन फटीग’ यानी निर्णय थकान का शिकार बना दिया है।
Gadget Addiciton: आज की डिजिटल दुनिया में स्मार्टफोन युवाओं की दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुका है। पढ़ाई, मनोरंजन, सोशल कनेक्शन—हर जरूरत के लिए मोबाइल पर निर्भरता तेजी से बढ़ी है। लेकिन यही सुविधा अब धीरे-धीरे समस्या का रूप लेती जा रही है। लगातार स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से दिमाग पर दबाव बढ़ रहा है। हर कुछ मिनट में आने वाले नोटिफिकेशन, मैसेज और अपडेट्स दिमाग को लगातार सक्रिय रखते हैं, जिससे उसे आराम नहीं मिल पाता। इसका असर यह होता है कि युवाओं की एकाग्रता क्षमता घटने लगती है और वे लंबे समय तक किसी एक काम पर फोकस नहीं कर पाते।
स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने नई पीढ़ी की जिंदगी को आसान तो बनाया है, लेकिन इसके साथ ही मानसिक दबाव भी तेजी से बढ़ा है। लगातार स्क्रीन पर रहने, नोटिफिकेशन की भरमार और त्वरित प्रतिक्रिया देने की आदत ने युवाओं की सोचने-समझने और सही निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल ओवरलोड के कारण दिमाग थकने लगा है, जिससे एकाग्रता और निर्णय क्षमता दोनों पर असर पड़ रहा है।
अनगिनत विकल्प, लगातार नोटिफिकेशन और हर पल स्क्रीन से जुड़ी जिंदगी। यही आधुनिक लाइफस्टाइल अब युवाओं के दिमाग पर भारी पड़ रही है। छोटे-छोटे फैसलों की लगातार भरमार ने युवाओं को ‘डिसीजन फटीग’ यानी निर्णय थकान का शिकार बना दिया है। स्थिति यह है कि अब सामान्य फैसले लेना भी मुश्किल होता जा रहा है और मानसिक थकान तेजी से बढ़ रही है। केंद्र सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में भी इस खतरे को लेकर चेतावनी दी गई है।
रिपोर्ट के अनुसार स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, गेमिंग और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म का अत्यधिक उपयोग 15 से 29 वर्ष के युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य संकट पैदा कर रहा है। वहीं सैपियन लैब्स की ग्लोबल माइंड हेल्थ रिपोर्ट 2025 बताती है कि भारतीय युवाओं का माइंड हेल्थ क्वोशेंट काफी कम है, जो डिजिटल ओवरलोड और घटते ह्यूमन कॉन्टेक्ट की ओर इशारा करता है।
जानकारों की मानें तो डिजिटल दौर में जहां विकल्प बढ़े हैं, वहीं मानसिक दबाव भी बढ़ा है। ऐसे में जरूरी है कि तकनीक का उपयोग संतुलित तरीके से किया जाए, ताकि सुविधा के साथ मानसिक स्वास्थ्य भी सुरक्षित रह सके। ये हैं ‘डिसीजन फटीग’ के लक्षण: छोटे-छोटे मामलों (जैसे क्या खाएं, क्या पहनें) में भी फैसला करने में असमर्थ महसूस करना। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आना या मानसिक रूप से तनावग्रस्त होना।
आज युवाओं के सामने विकल्पों की अधिकता है। सोशल मीडिया, कॅरियर के अनगिनत मौके और ऑनलाइन शॉपिंग ऐप्स। इससे दिमाग ‘डिसीजन पैरालाइज’ की स्थिति में पहुंच जाता है, जहां फैसला लेना ही मुश्किल हो जाता है। डिजिटल ओवरलोड भी बड़ी वजह है। लगातार स्क्रीन टाइम और सूचनाओं का सैलाब दिमाग को लगातार एक्टिव रखता है, जिससे वह जल्दी थक जाता है। इसके साथ ही कॅरियर का दबाव भी युवाओं को मानसिक रूप से प्रभावित कर रहा है।
डॉ. हिना चावड़ा, मनोवैज्ञानिक सलाहकार नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी रायपुर
&जब हम गैजेट्स पर निर्भर होने लगते हैं तो हमारी डिसीजन मेकिंग कमजोर हो जाती है। हमें लगातार फीड्स देखने की आदत पड़ जाती है, जिससे दिमाग हर समय व्यस्त रहते हुए भी जल्दी थक जाता है। अब ऐसे मरीज भी हमारे पास पहुंच रहे हैं, जिन्हें निर्णय लेने में दिक्कत हो रही है। इम्पल्सिविटी यानी जल्दबाजी तेजी से बढ़ रही है और वेटिंग कैपेसिटी कम हो जाती है।
लोगों को हर चीज का रिजल्ट और रिस्पॉन्स तुरंत चाहिए। अगर मन मुताबिक जवाब नहीं मिलता तो दिमाग में उत्तेजना बढ़ती है, जिससे चिड़चिड़ापन, गुस्सा और कई बार लड़ाई-झगड़े तक की स्थिति बन जाती है। मेंटल फटीग इतनी जल्दी हो जाता है कि 30 मिनट से ज्यादा कंसंट्रेट करना मुश्किल हो रहा है। ब्रेन के फंक्शन्स स्लो हो जाते हैं और इमोशनल रिस्पॉन्स भी कमजोर पडऩे लगते हैं। इसे डोपामिन लूप कहते हैं, जिसमें रील्स या ऐप्स का इस्तेमाल लगातार चलता रहता है और नहीं करने पर विड्रॉल जैसा महसूस होता है।
प्राथमिकता तय करें, सभी काम एक साथ न करें
जरूरी कामों पर ही ध्यान केंद्रित करें
डिसीजन फटीग को नजरअंदाज न करें, यह क्रोनिक स्ट्रेस और बर्नआउट तक ले जा सकता है
समय प्रबंधन सुधारें
बड़ों और अनुभवी लोगों की सलाह लेने की आदत डालें
रोजाना स्क्रीन टाइम सीमित करें
पढ़ाई या काम के दौरान नोटिफिकेशन बंद रखें
डिजिटल डिटॉक्स (कुछ समय मोबाइल से दूरी) अपनाएं
ऑफलाइन गतिविधियों जैसे खेल, किताब पढ़ना, बातचीत को बढ़ावा दें