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Corruption : वर्दी का रौब, जमीन का खेल, वाहन चालक ने कहां से बना ली 35.46 करोड़ की संपत्ति?

Corruption : 24 साल की नौकरी, 75 लाख का वेतन और 35.46 करोड़ की संपत्तियां; इंदौर के प्रधान आरक्षक पर लोकायुक्त की कार्रवाई ने उठाया बड़ा सवाल- क्या जमीन के खेल में पद का प्रभाव भी ताकत बन रहा है? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह इस तरीके का पहला या अकेला मामला नहीं है। इस मामले के बारे में जानने के लिए पढ़िए अनिल कर्मा की खास रिपोर्ट।
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Oct 22, 2026
Police Corruption
पुलिस विभाग में वाहन चालक ने 24 वर्षों की नौकरी में 35 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति बना ली। (ChatGpt)

Corruption : पुलिस की नौकरी में काम था वाहन चलाना। लेकिन 24 साल की नौकरी के बाद लोकायुक्त की जांच में कहानी सिर्फ वेतन और नौकरी तक सीमित नहीं रही। जमीन, प्लॉट, मकान, वाहन, बैंक खाते और कारोबार से जुड़ी संपत्तियों का ऐसा नेटवर्क सामने आया, जिसकी परतें अब लगातार खुल रही हैं।

इंदौर के पुलिस प्रशिक्षण महाविद्यालय में पदस्थ प्रधान आरक्षक (चालक) फिरोज खान के इंदौर और देवास स्थित 15 ठिकानों पर 14 अक्टूबर को लोकायुक्त ने कार्रवाई शुरू की थी। शुरुआत में 33 अचल संपत्तियां सामने आई थीं। जांच आगे बढ़ी तो इनकी संख्या 38 हो गई। लोकायुक्त के मुताबिक इनकी सरकारी गाइडलाइन कीमत करीब 12.97 करोड़ रुपए और अनुमानित बाजार कीमत 35.46 करोड़ रुपए है। चल और अचल संपत्तियों पर अब तक करीब 15.52 करोड़ रुपए खर्च किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। दूसरी ओर, 24 साल की नौकरी में वेतन करीब 75 लाख रुपए और ज्ञात स्रोतों से कुल आय करीब 1.93-1.94 करोड़ रुपए आंकी गई है।

लेकिन इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल सिर्फ यह नहीं है कि एक पुलिसकर्मी की संपत्ति उसकी आय से इतनी ज्यादा कैसे हुई। असली सवाल जमीन का है।

कहानी संपत्ति से जमीन तक पहुंचती है

लोकायुक्त की जांच में सामने आई संपत्तियों में जमीन, आवासीय प्लॉट और अन्य अचल संपत्तियां शामिल हैं। इनमें कुछ संपत्तियां परिवार के सदस्यों, परिचितों, सहयोगियों और फर्मों के नाम पर दर्ज बताई गई हैं। जांच एजेंसी अब इनके स्वामित्व, खरीद में लगी रकम और उसके स्रोत की पड़ताल कर रही है।

देवास के राजोदा में 1.15 हेक्टेयर कृषि भूमि भी जांच में सामने आई है, जो रोशनी वर्मा के नाम दर्ज बताई गई है। इसके अलावा सांवेर क्षेत्र की 21.75 बीघा जमीन से जुड़े दस्तावेज भी जांच के दायरे में हैं। कुछ रिपोर्टों में जमीन के विवादित सौदों में फिरोज खान की भूमिका और पुलिस पद के प्रभाव के इस्तेमाल के आरोपों का उल्लेख है। इन आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच के बाद ही होगी।

यहीं से यह मामला सामान्य ‘आय से अधिक संपत्ति’ की खबर से आगे निकल जाता है। अगर किसी पुलिसकर्मी पर यह आरोप है कि उसने अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल जमीन के विवाद या सौदे में किया, तो सवाल सिर्फ भ्रष्ट कमाई का नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या वर्दी का प्रभाव जमीन के कारोबार में एक अतिरिक्त ताकत बन सकता है?

इंदौर के पुलिस प्रशिक्षण महाविद्यालय में पदस्थ प्रधान आरक्षक (चालक) फिरोज खान (Photo: Patrika)

जमीन के विवाद में वर्दी क्यों महत्वपूर्ण है?

इंदौर और आसपास के इलाकों में जमीन का एक विवाद कई स्तरों से गुजरता है। कब्जे का सवाल हो, धोखाधड़ी का आरोप हो, रजिस्ट्री का विवाद हो या जमीन के मालिकाना हक को लेकर टकराव- किसी न किसी मोड़ पर मामला पुलिस तक पहुंच सकता है।यहीं पुलिस की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

जिस व्यक्ति के पास कानून लागू करने की शक्ति है, उसका प्रभाव निजी जमीन विवाद में इस्तेमाल होने लगे तो मामला सिर्फ दो पक्षों के बीच का विवाद नहीं रह जाता। इसलिए किसी पुलिसकर्मी पर जमीन के मामलों में पद के प्रभाव के इस्तेमाल का आरोप अपने आप में गंभीर जांच का विषय है।

इस मामले में लोकायुक्त को मिले दस्तावेजों में 22 बैंक खातों और कई संपत्तियों से जुड़े वित्तीय लेन-देन की भी पड़ताल की जा रही है। यानी जांच अब यह पता लगाने में जुटी है कि पैसा कहां से आया, किसके नाम पर संपत्ति खरीदी गई और उसके पीछे वास्तविक आर्थिक स्रोत क्या था।

फिरोज खान का बंगला (Photo: Rajasthan Patrika)

नाम किसी और का, नेटवर्क किसका?

जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी है कि संपत्तियां सिर्फ फिरोज खान के नाम पर ही नहीं हैं। परिवार, परिचितों, सहयोगियों और कारोबारी संस्थाओं के नाम सामने आए हैं। लेकिन यहां जल्दबाजी खतरनाक होगी।किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर संपत्ति होना अपने आप में उसे ‘बेनामी’ साबित नहीं करता। इसलिए जांच पूरी होने से पहले इसे बेनामी संपत्ति कहना उचित नहीं होगा। असली सवाल यह है कि खरीद के लिए पैसा किसका था, लाभ किसे मिलना था और संपत्ति पर वास्तविक नियंत्रण किसका था। यही वह वित्तीय कड़ी है, जिसे लोकायुक्त अब तलाश रही है।

ऐसा पहली बार नहीं है

मध्य प्रदेश में पुलिस के निचले पद पर तैनात कर्मचारी के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति की कार्रवाई का यह पहला मामला नहीं है। नवंबर 2021 में जबलपुर के तिलवारा थाने में पदस्थ प्रधान आरक्षक सच्चिदानंद सिंह के घर और फार्महाउस पर लोकायुक्त ने आय से अधिक संपत्ति की शिकायत के बाद तलाशी ली थी। उस कार्रवाई में करीब 4.39 करोड़ रुपए की संपत्ति के दस्तावेज और अन्य संपत्तियां सामने आने की रिपोर्ट थी। इसमें मकान, कृषि भूमि, फार्महाउस, वाहन और मामले की अहमियत इसलिए भी है कि यह सिर्फ मीडिया रिपोर्ट तक सीमित नहीं रहा।

लोकायुक्त का छापा (Photo: Patrika)

आय से अधिक संपत्ति के मामले में तलाशी में सभी के होश उड़ गए

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के 2024 के आदेश में दर्ज है कि सच्चिदानंद सिंह के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति की शिकायत पर 2 नवंबर 2021 को तलाशी हुई और उसी दिन भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत FIR दर्ज की गई थी। हालांकि अदालत के उस रिकॉर्ड में मामला उस समय लंबित था और आरोपों को अंतिम रूप से सिद्ध नहीं माना गया था। यानी दोनों मामलों को एक जैसा मानना सही नहीं होगा, लेकिन एक सवाल जरूर बनता है- जब पुलिस के अपेक्षाकृत निचले पदों पर तैनात कर्मचारियों के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति की जांच में जमीन और बड़ी संपत्तियां सामने आती हैं, तो विभागीय निगरानी का सिस्टम कहां है?

75 लाख से 35.46 करोड़ तक का सवाल

फिरोज खान मामले के आंकड़े अपने आप में बहुत कुछ कहते हैं।
24 साल की नौकरी
↓
करीब 75 लाख रुपए वेतन
↓
करीब 1.93-1.94 करोड़ रुपए ज्ञात आय
↓
38 अचल संपत्तियां
↓
करीब 35.46 करोड़ रुपए अनुमानित बाजार मूल्य

ये लोकायुक्त की जांच में सामने आए प्रारंभिक आंकड़े हैं। जांच अभी जारी है। इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा। लेकिन सवाल अभी भी खड़ा है- इतना बड़ा संपत्ति नेटवर्क बनता रहा तो निगरानी किस स्तर पर हो रही थी?क्या संपत्ति की घोषणाओं की नियमित जांच हुई? क्या जीवनशैली और आय में अंतर कभी दिखाई नहीं दिया? क्या जमीन और कारोबार से जुड़े लेन-देन पर विभागीय स्तर पर कोई सवाल उठा?

लोकायुक्त का छापा (Photo: Patrika)

वर्दी का मतलब अधिकार है, प्रभाव नहीं

पुलिस की वर्दी का अर्थ जनता के लिए भरोसा है। यह कानून लागू करने का अधिकार देती है, निजी विवाद में प्रभाव इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं। इसलिए फिरोज खान मामले की जांच का दायरा सिर्फ यह पता लगाने तक सीमित नहीं होना चाहिए कि संपत्ति कितनी है। यह भी सामने आना चाहिए कि जमीन के कारोबार में कौन-कौन लोग जुड़े थे, किन मामलों में पुलिस पद का नाम या प्रभाव सामने आया और क्या उस प्रभाव का किसी आर्थिक लाभ से संबंध था।क्योंकि जमीन के सौदे में पैसा बड़ा हो सकता है, संपर्क बड़े हो सकते हैं, रसूख बड़ा हो सकता है।

लेकिन सवाल यही है, क्या जमीन के खेल में वर्दी का रौब भी एक ‘एसेट’ बन गया है?
फिरोज खान मामले की जांच से शायद इसी सवाल का जवाब मिल पाएगा।

Updated on:
22 Oct 2026 10:59 am
Published on:
22 Oct 2026 10:59 am