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Nepal: RSP सरकार को नहीं मिलेगा हनीमून पीरियड, 11 अरब डॉलर और 20 लाख नेपालियों को बचाना होगी बड़ी जिम्मेदारी

Nepal RSP : नेपाल में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को आम चुनाव में भारी जीत मिली है। हालांकि चुनाव परिणाम आने से पहले देश के सामने वैश्विक परिस्थितियों के चलते पहाड़ जैसी चुनौतियां खड़ी हो चुकी हैं। इससे निपटना RSP और उसके नेता बालेन शाह के लिए बड़ी चुनौतियां है। पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट।

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Mar 13, 2026
नेपाल के नेता बालेन शाह

Nepal New Government: नेपाल में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) की भारी जीत के बाद बालेन शाह का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय माना जा रहा है। हालांकि, यह भी बताया जा रहा है कि उनकी पार्टी के अंदर ही दो गुटों में लोग बंट गए हैं। इस चुनौती को पार्टी के लो मिलकर सुलझा भी लें तो बालेन शाह और उसकी पार्टी को लैंडस्लाइड विक्ट्री के बावजूद हनीमून पीरियड का कुछ वक्त भी शायद ही मिल पाए। इसकी वजह पश्चिम एशिया में युद्ध से उत्पन्न ऊर्जा और आर्थिक संकट का गहराता जाना।

नेपाल ऊर्जा जरूरतों के लिए भारत पर पूरी तरह निर्भर

नेपाल अपनी खपत के लिए डीजल, पेट्रोल, गैस और विमानन के लिए ईंधन पूरी तरह भारत से आयात करता है। सबसे बड़ी बात है कि मौजूदा संकट से निपटने के लिए उसके पास कोई रणनीतिक भंडार जैसी व्यवस्था नहीं है। भारत के पास 10 दिनों के लिए गैस का भंडार है और दूसरे देशों से भी तेल और गैस आयात करने के बारे में बात चल रही है। भारत पहले अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए 27 देशों पर निर्भर था लेकिन अब 13 अन्य वैकल्पिक देशों से इस बारे में बात चल रही है। भारत में एलपीजी सिलेंडरों के कमी को लेकर कई खबरें सामने आ रही हैं। रूस उनमें सबसे प्रमुख है। हालांकि, रूस व अन्य देशों से नई तेल और गैस की आपूर्ति को भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचने में कम से कम एक महीना का समय लग सकता है।

(Photo Credit @ShahBalen X Account)

नेपाल में गहराने वाला है ऊर्जा संकट

ईरान-इजराइल और अमेरिका के बीच संघर्ष अब गंभीर रूप से बढ़ गया है और इससे वैश्विक पेट्रोलियम आपूर्ति बाधित हो रही है। दुनिया के लगभग 20% तेल और गैस का परिवहन हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से होता है, लेकिन इस समय अवरुद्ध है। फारस की खाड़ी से जापान (75%), भारत (50%) और चीन (38%) को तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा हासिल होता है। इस सप्ताह कच्चे तेल की कीमत लगभग दोगुनी होकर 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है।

ऊर्जा संकट से बढ़ेगी आवश्यक वस्तुओं की महंगाई

अगर ईरान-इजराइल व अमेरिका के बीच युद्ध खत्म भी हो जाए तो नेपाल में कुछ समय के लिए यह संकट गहराने वाला है। नेपाल में जल्द ही ईंधन की कीमतें बढ़ेंगी और इसके चलते वस्तुओं व सेवाओं की लागत भी बढ़ेगी। साफ शब्दों में कहा जाए तो नेपाल में खुदरा और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें आसमान छू सकती हैं। यह नई सरकार के लिए अच्छा संकेत नहीं है, खासकर तब जब लोगों की उससे इतनी अधिक उम्मीदें हैं।

भारत-नेपाल सीमा पर पहले भी हो चकी नाकाबंदी

भारत से ईंधन की आपूर्ति रुकने की घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं। खासकर 2015 की (सितंबर 2015 - फरवरी 2016) पांच महीने नाकाबंदी लागू रही। दोनों देशों के बीच सीमा के मुख्य चेकपोस्ट जैसे बीरगंज-रक्सौल बंद हो गए थे और ट्रकों का आवागमन रुक गया। परिणाम यह हुआ कि नेपाल में पेट्रोल, डीजल, एलपीजी गैस, दवाइयां और अन्य जरूरी सामान की भारी कमी हो गई। संभव है कि इस बार नेपाल कुछ हद तक झटका सहने की स्थिति में हो क्योंकि बैटरी से चलने वाले वाहनों की संख्या यहां बढ़ी है और घरों में कुछ हद तक बिजली से खाना पकाने का चलन भी बढ़ा है। लेकिन यह सब अभी बहुत सीमित मात्रा में ही है। यह जेठ की धूप में बारिश की कुछ बूंद साबित होने वाली है।

नेपाल में पर्यटन को होगा नुकसान

पिछले कुछ वर्षों में नेपाल में सड़क नेटवर्क का प्रसार तेजी से हुआ, जिसके चलते डीजल और पेट्रोल की खपत भी बढ़ रही है। यदि युद्ध लंबा चलता है, तो विमानन ईंधन की गंभीर कमी हो सकती है, जिससे ट्रेकिंग और पर्वतारोहण के मौसम की शुरुआत में पर्यटन को नुकसान पहुंच सकता है। पहले से ही देशभर में रसोई गैस की कमी है, जिसका उपयोग लगभग 62% नेपाली परिवार करते हैं।

ईंधन संकट का असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा और RSP सरकार के पदभार संभालते ही ईंधन कीमतों पर सब्सिडी के जरिए नियंत्रण, जमाखोरी और कालाबाजारी पर रोक और लंबे समय में परिवह और खाना पकाने के लिए बिजली के उपभोग को बढ़ाना ही राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी सरकार की प्राथमिकताएं होंगी।

विदेशों में रोजगार करने वाले भेजते हैं 11 अरब डॉलर सालाना

इस युद्ध का दूसरा असर पश्चिम एशिया में रोजगार और वहां से भेजे जाने वाले धन में कमी आएगी। इससे नेपाली परिवारों के खर्च, निवेश और देश की अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ेगा। हर साल नेपाली लोग लगभग 11 अरब डॉलर घर भेजते हैं, जिनमें से लगभग आधा पश्चिम एशियाई देशों से आता है। नेपाल का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड 21.09 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, लेकिन यदि खरीदने के लिए ईंधन ही न हो तो यह पैसा भी बेकार साबित हो सकता है। इससे देश से रोजगार के लिए पलायन में बढ़ोतरी दर्ज होगी लेकिन खाड़ी देशों में तनाव के चलते नेपालियों के लिए मारामारी के हालात पैदा होंगे।

20 लाख नेपाली प्रवासियों को बचाना होगी जिम्मेदारी

यूएई, कतर, कुवैत और सऊदी अरब में लगभग 20 लाख नेपाली काम करते हैं और इज़राइल में लगभग 7,000 नेपाली हैं। इनमें से अधिकांश महिलाएं देखभाल कर्मी हैं। अगर खाड़ी देशों में तनाव के हालात लंबे समय तक बनें रहें तो वहां रह रहे 20 लाख नेपाली नागरिकों को बचाना भी देश की नई सरकार की जिम्मेदारी होगी।

पलायन और वतन वापसी से कैसे पार पाएगी नई सरकार?

हाल ही में नेपाल में हुए राष्ट्रीय चुनाव में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने पलायन पर लगाम लगाने का मुद्दा जोरशोर से उठाया था। सोशल मीडिया पर यह बात बहुत जोरशोर से उठती रही कि आएसपी के सत्ता में विदेशों में रह रहे नेपालियों की वतन वापसी होगी। विदेशों में रहने वाले नेपालियों ने भी इसी उम्मीद में अपने पीछे छूटे देश में रह रहे परिवार के सदस्यों से आरएसपी के पक्ष में मतदान करवाया। खाड़ी देशों में बसे नेपाली प्रवासी, जिन्होंने चुनाव को प्रभावित किया, अब यह देखेंगे कि काठमांडू में उनकी समर्थित सरकार क्षेत्र में युद्ध के फैलने के बीच उनकी कैसे मदद करती है।

कैबिनेट बनाना आसान हो सकता है, लेकिन ब्यूरोक्रेसी, न्यायपालिका, पुलिस और उच्च सदन अब भी पुराने दलों के समर्थकों से भरे हुए हैं। ऐसे में सत्ता की राह आरएसपी के लिए आसान नहीं दिख रही है।

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