Astronomy: भारत में एक सर्वे में यह बात सामने आई है कि हाई स्कूल के बच्चों में एस्ट्रोनॉमी की पढ़ाई में दिलचस्पी बढ़ रही है लेकिन वह इसको क्यों आगे नहीं बढ़ा पाते हैं? इस बारे में एक्सपर्ट्स् बता रहे हैं। छात्रों की दिलचस्पी खत्म ना हो, इसके लिए वे पत्रिका के पाठकों से उपाय भी साझा कर रहे हैं।
Astronomy Education in India : भारत में एक सर्वे में यह बात सामने आई कि कक्षा 9 तक के 86 फीसदी स्टूडेंट खगोल विज्ञान में रुचि रखते हैं लेकिन वहीं यह बात सामने आई कि सिर्फ 25 प्रतिशत स्टूडेंट्स के पास ही दूरबीन या तारामंडल की सुविधा उपलब्ध है। इस अध्ययन में यह बात भी सामने आ रही है कि छात्रों में वैज्ञानिक तरीके से सोचने और समझने का रुझान बढ़ा है। आइए जानते हैं कि भारत में विज्ञान की तरफ बढ़ने में क्या परेशानी पैदा हो रही हैं?
इस सर्वेक्षण में छात्रों की ज्योतिष में आस्था की भी पड़ताल की गई और इसमें अपेक्षाकृत सकारात्मक दृष्टिकोण पाया गया। करीब 66% छात्रों ने अपनी कुंडली के आधार पर यात्रा योजनाओं को रद्द करने में अनिच्छा व्यक्त की है।
देश में विज्ञान में भारतीय छात्रों की दिलचस्पी बढ़ रही है, लेकिन सुविधाओं के अभाव में कैसे विकसित भारत का सपना पूरा होगा? इस सवाल के जवाब में महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन की जीवनी पर 'विनम्र विद्रोही' और महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस की जीवनी 'द साइंटिफिक सूफ़ी' के लेखक मेहर वान ने पत्रिका से बताया कि विज्ञान में भारतीय छात्रों की रुचि में बढ़ोत्तरी एक सकारात्मक संकेत है। हालांकि इस बढ़ती रुचि को सकारात्मक सहयोग देने के लिए नवाचारयुक्त तरीके अपनाए जा सकते हैं। यह सच है, हर स्कूल में एक अच्छा टेलिस्कोप उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण है।
फिर भारत में विज्ञान के प्रति बढ़ती छात्रों की दिलचस्पी को कैसे सींचा जा सकता है? इस सवाल पर जवाब देते हुए वह कहते हैं, 'देश के शिक्षकों और शिक्षा से जुड़े संस्थानो को नए वैकल्पिक और आसान तरीके विकसित करने होंगे। जैसे- मोबाइल पर कुछ अच्छे और फ्री ऐप्स की मदद से तारों की स्थिति, गतिविधि और एस्ट्रोनॉमिकल घटनाओं को आसानी से समझाया जा सकता है। साधारण किस्म के टेलिस्कोप स्कूलों में स्वयं बनाकर बच्चों को उपकरण विकास की शिक्षा बचपन से दी जा सकती है। विज्ञान के तमाम सिद्धांत बच्चों के आसपास उपलब्ध खिलौनों और साधारण चीजों से बने उपकरणों से समझाए जा सकते हैं। इस दिशा में देश के सम्माननीय विज्ञान संस्थान वर्चुअल लैब्स बनाकर भी अपना योगदान कर सकते हैं। बच्चों की जिज्ञासा को कम साधनों के बावजूद सही दिशा दी जा सकती है। इसके लिए बड़े स्तर पर प्रयासों की आवश्यकता है।'
यह सर्वेक्षण 10 राज्यों के 34 विद्यालयों के 2,000 से अधिक छात्रों पर किए गए एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें शामिल छात्र विभिन्न पृष्ठभूमियों से थे और अध्ययन से पता चला कि रुचि होने के बावजूद, खगोलीय आकार, दूरी और चंद्रमा की कलाओं जैसी मूलभूत अवधारणाओं की उनकी समझ सीमित थी।
मेहर बताते हैं, 'हालांकि अक्सर शिक्षा से जुड़ी अलग अलग मुश्किलों और चुनौतियों के बारे में भिन्न-भिन्न स्तरों पर चर्चा होती रहती है, मगर इस समय की जिस महत्वपूर्ण चुनौती के बारे में मुझे चिंता होती है, वह है - बच्चों के पास विषय के बारे में सोचने समझने के लिए जरूरी समय की कमी। बहुत कम समय में बच्चों को सभी विषयों में उच्च स्तर की परफोर्मेंस देने के दबाव में दिलाए गए आसान रास्ते और गैरजरूरी सपोर्ट बच्चों को विषय के बारे में गहन सोचने और समझने का समय और स्पेस नहीं देते। विज्ञान जैसे विषय के लिए यह बहुत कठिनाई का सबब है। बिना पर्याप्त तराई के और सूखने के समय दिए बनाए गए घरों को हल्के से भूकंप के झटकों में खुद को सम्हाल पाने में मुश्किल होती है।'
एस्ट्रोनॉमी एजुकेशन जर्नल में प्रकाशित इस सर्वेक्षण में शामिल 70 प्रतिशत छात्रों ने उच्च कक्षाओं या कॉलेज में खगोल विज्ञान की पढ़ाई करने में सकारात्मक रुचि दिखाई। खगोलशास्त्री बनने के मार्ग के बारे में छात्रों की समझ के बारे में पूछताछ करते हुए अध्ययन में कहा गया, "हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि इस संबंध में छात्रों में स्पष्टता की व्यापक कमी है। अधिकांश उत्तरदाताओं ने विशिष्ट विवरण दिए बिना केवल विज्ञान, भौतिकी या खगोल विज्ञान की पढ़ाई करने का सुझाव दिया।"
साधन के अभाव में बच्चे खगोल विज्ञान या विज्ञान की पढ़ाई कैसे करेंगे? इस सवाल के जवाब में खगोल विज्ञान के एक्सपर्ट और स्टारस्केप्स एक्सपीरिएंशेज (Starscapes Experiences) के मेंटर अमिताभ पांडे ने पत्रिका से बातचीत में बताया कि आज से 20 से 25 वर्ष पहले दूरबीन की उपलब्धता बहुत मुश्किल है। मैं दिल्ली के स्कूलों में जाकर बच्चों को दूरबीन बनाना सिखाता था, लेकिन आज जो सबसे बड़ी दिक्कत है, वह यह कि स्कूलों में अच्छे और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी का होना। इसके चलते छात्र-छात्राओं में विज्ञान के प्रति दिलचस्पी कम होती जाती है।
अमिताभ दिल्ली विश्वविद्यालय के एस्ट्रो फिजिक्स डिपार्टमेंट का उदाहरण देते हुए कहते हैं, 'लगभग 10 साल पहले एक सज्जन डिपार्टमेंट हेड बने तो उन्होंने ऑब्जर्वेटरी (Observatory) के बारे में पूछा तो पता चला कि वहां वर्षों से ताला लटका हुआ है। बड़ी मुश्किल से उसे खुलवाया गया तो वहां जाले हुए थे और टेलिस्कोप उपयोग में लिए ही नहीं गए थे। आप इस उदाहरण से यह अंदाजा लगा सकते हैं कि सर्वे में 25 फीसदी छात्रों की पहुंच में टेलिस्कोप न होने की बात कही गई है। मैंने दिल्ली के कई महंगे स्कूलों में पाया कि वहां की ऑब्जर्वेटरी का ताला खोलने में किसी शिक्षक की दिलचस्पी ही नहीं है। टीचर ने थ्योरी तो पढ़ ली है लेकिन उन्हें टेलिस्कोप का इस्तेमाल करना नहीं आता है। टीचर ट्रेनिंग भी नहीं लेना चाहते हैं। यह मैं दिल्ली की बात कर रहा हूं। छोटे शहरों और गांवों की तो बात ही छोड़ दीजिए।
यह सर्वेक्षण महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, केरल, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और जम्मू एवं कश्मीर के विद्यालयों में किया गया। इसमें 34 विद्यालयों के 2,038 विद्यार्थी शामिल थे। इनमें से 22 विद्यालय संसाधनहीन थे जबकि 12 विद्यालय संसाधन संपन्न थे। सर्वेक्षण में शामिल विद्यार्थियों में से कुल 1,014 विद्यार्थी छात्राएं और 871 विद्यार्थी थे।