India Nuclear Power Future: दुनिया में बढ़ती बिजली मांग के बीच न्यूक्लियर पावर को भविष्य की ऊर्जा माना जा रहा है, लेकिन यूरोप के कई बड़े प्रोजेक्ट्स लागत और देरी की वजह से ‘मनी पिट’ बन गए। वहीं भारत स्वदेशी तकनीक, थोरियम और लंबी रणनीति के सहारे न्यूक्लियर सेक्टर में नया मॉडल तैयार कर रहा है।
Nuclear Power Future of India: दुनिया में बिजली की मांग तेजी से बढ़ रही है और हर देश सस्ती, साफ और भरोसेमंद ऊर्जा की तलाश में है। ऐसे में न्यूक्लियर पावर को भविष्य का बड़ा विकल्प माना जा रहा है। लेकिन इसे सच कर पाना इतना आसान नहीं है। यूरोप में बने कुछ बड़े न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स (Nuclear Projects) ने दिखाया है कि ये तकनीक जितनी ताकतवर है, उतनी ही महंगी और समय लेने वाली भी हो सकती है। वहीं भारत एक अलग रास्ता चुनकर न्यूक्लियर पावर को सस्ता और मजबूत बनाने की कोशिश कर रहा है। इस रिपोर्ट में हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर न्यूक्लियर पावर ‘मनी पिट’ क्यों बन जाता है और भारत इस खेल में अलग राह पर कैसे चल रहा है।
फिनलैंड का ओलकिलुओटो 3 प्रोजेक्ट (Finland's Olkiluoto nuclear power plant) दुनिया भर में मेगा प्रोजेक्ट्स की चुनौतियों का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। स्टैटिस्टा (Statista) की रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रोजेक्ट को शुरुआत में महज 3.2 बिलियन यूरो की लागत और 4 साल के समय में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन नई तकनीक की जटिलताओं और कड़े सुरक्षा मानकों के कारण इसे पूरा होने में 18 साल लग गए। समय के साथ इसकी लागत बढ़ते-बढ़ते 11 बिलियन यूरो तक पहुंच गई। यह शुरुआत के अनुमानित बजट से 3 गुणा से भी ज्यादा है। हालांकि, यह प्लांट फिनलैंड की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभा रहा है।
फ्रांस का फ्लेमनविले 3 (France Flamanville 3 Nuclear Project) प्रोजेक्ट को भी मात्र 3.3 बिलियन यूरो और 5 साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था, वह तकनीकी खामियों और कड़े सुरक्षा नियमों की वजह से 17 साल तक खिंच गया। इसकी लागत शुरुआती अनुमान से लगभग 7 गुणा बढ़कर 23.7 बिलियन यूरो तक पहुंच गई। यह प्रोजेक्ट दिखाता है कि परमाणु ऊर्जा जैसे जटिल क्षेत्रों में अगर प्लानिंग और एग्जीक्यूशन में तालमेल न हो, तो लागत और समय दोनों नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं, जो किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डाल देते हैं।
ब्रिटेन का हिंकले पॉइंट सी (Hinkley Point C Nuclear Project) प्रोजेक्ट तो लागत और समय के मामले में पिछले सभी रिकॉर्ड्स को पीछे छोड़ता दिख रहा है। जिस प्रोजेक्ट का बजट शुरुआत में 20.8 बिलियन यूरो तय किया गया था, वह अब बढ़कर करीब 55 बिलियन यूरो तक पहुंच गया है, जो कि शुरुआती योजना से 2.5 गुना से भी ज्यादा है। बार-बार बदलती समय सीमा और बढ़ती महंगाई के कारण यह प्रोजेक्ट दुनिया के सबसे महंगे ऊर्जा प्रोजेक्ट्स में गिना जा रहा है। यह परमाणु ऊर्जा के विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर में थोड़ी सी भी देरी और तकनीकी चुनौतियां बजट को किस कदर बेकाबू कर सकती हैं।
यूरोप के बड़े देश न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स की बढ़ती लागत और समय की देरी से परेशान हैं, वहीं भारत ने एक ठोस और दूरगामी रणनीति अपनाई है। वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन (World Nuclear Association ) की अनुसार भारत के पास करीब 24 न्यूक्लियर रिएक्टर हैं, जो देश की कुल बिजली का लगभग 2% (8 गीगावाट) हिस्सा पैदा करते हैं, लेकिन सरकार ने भविष्य के लिए एक लक्ष्य तय किए हैं। भारत का इरादा साल 2047 तक अपनी न्यूक्लियर क्षमता को बढ़ाकर 100 गीगावाट तक ले जाने का है। यह रणनीतिक बदलाव न केवल ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी है, बल्कि यह भी दिखाता है कि भारत अपनी स्वदेशी तकनीक और बेहतर मैनेजमेंट के जरिए परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में एक नई वैश्विक मिसाल कायम करने की तैयारी में है।
भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए '3 स्टेज न्यूक्लियर प्रोग्राम' (3-Stage Nuclear Programme) तैयार किया है, जो पूरी तरह भारत की भौगोलिक स्थिति पर आधारित है। इसके पहले चरण में 'प्रेशराइज्ड हैवी वॉटर रिएक्टर्स' (PHWRs) यूरेनियम का उपयोग करके बिजली और प्लूटोनियम पैदा करते हैं, जो अगले चरण के लिए आधार बनता है। दूसरे चरण में इसी प्लूटोनियम का इस्तेमाल 'फास्ट ब्रीडर रिएक्टर्स' (FBRs) में किया जाता है, जहां ईंधन से कहीं अधिक मात्रा में नया ईंधन "ब्रीड" या उत्पन्न किया जाता है, ताकि थोरियम आधारित चरण के लिए जरूरी यूरेनियम-233 तैयार हो सके। तीसरे चरण में, भारत में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थोरियम को यूरेनियम-233 में बदलकर सदियों तक स्वच्छ ऊर्जा प्राप्त करने की योजना है। भारत के पास यूरेनियम कम और थोरियम का दुनिया का सबसे बड़ा भंडार है, इसलिए यह स्वदेशी तकनीक भारत की लंबी अवधि की ऊर्जा सुरक्षा और परमाणु क्षेत्र में वैश्विक प्रभुत्व सुनिश्चित करने का सबसे बड़ा हथियार है।
राजस्थान के रावतभाटा परमाणु बिजलीघर का इतिहास भारत के परमाणु ऊर्जा सफर की चुनौतियों और सफलता, दोनों को दिखाता है। वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन (World Nuclear Association ) के अनुसार 1970 के दशक में कनाडाई तकनीक से यहां के पहले दो रिएक्टर शुरू हुए थे। इनमें राजस्थान-1 तकनीकी दिक्कतों के कारण लंबे समय तक परेशानी बना रहा और 2004 से बंद है। सरकार अभी इसके भविष्य पर विचार कर रही है। वहीं राजस्थान-2 ने बेहतर प्रदर्शन किया। 1990 में इसकी क्षमता कम की गई थी, लेकिन 2007 से 2009 के बीच बड़े सुधार और नवीनीकरण के बाद इसे फिर पूरी क्षमता से चालू किया गया। अब यह आयातित यूरेनियम की मदद से लगातार बिजली उत्पादन कर रहा है और देश की जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभा रहा है।