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Menstrual Hygiene : सुप्रीम कोर्ट ने की भावुक अपील, सरकारों को दिए निर्देश, धन्यवाद देकर महिलाओं ने कहा- दो दिन की मिले छुट्टी

Menstrual Hygiene Supreme Court Order : सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता तक पहुंच बालिका के जीवन, गरिमा, स्वास्थ्य और शिक्षा के अधिकार का अभिन्न अंग है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को इस बारे में अनिवार्य निर्देश जारी किए। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का महिलाओं ने स्वागत किया। पीरियड हाइजन को लेकर पत्रिका ने डॉक्टर से भी बातचीत की।

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Jan 31, 2026
स्कूलों में पीरियड हाइजिन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

Menstrual Hygiene Supreme Court Order : सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता तक पहुंच बालिका के जीवन, गरिमा, स्वास्थ्य और शिक्षा के अधिकार का अभिन्न अंग है और सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को देश भर के प्रत्येक विद्यालय में मुफ्त सैनिटरी नैपकिन, अलग शौचालय और मासिक धर्म स्वास्थ्य जागरूकता सुनिश्चित करने के लिए व्यापक निर्देश जारी किए। न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और आर. महादेवन की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए कि "मासिक धर्म एक सजा है और इसका अंत होना चाहिए। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सरकार का यह सकारात्मक दायित्व है कि वह स्वास्थ्य के अधिकार, विशेष रूप से बालिकाओं के मासिक धर्म स्वास्थ्य की रक्षा करे।

लड़कियों को चिथड़े या पुराने कपड़े का लेना पड़ता है सहारा

न्यायमूर्ति परदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने आदेश में बताया कि मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन (एमएचएम) उत्पादों तक पहुंच की कमी लड़कियों को अस्वच्छ विकल्पों जैसे कि चिथड़े या कपड़े का सहारा लेने या लंबे समय तक मासिक धर्म अवशोषक का उपयोग करने के लिए मजबूर करती है, जिसके उनके स्वास्थ्य पर स्पष्ट रूप से प्रतिकूल परिणाम होते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, "मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन उपायों की अनुपलब्धता एक बच्ची की गरिमा को कम करती है।"

लड़कियों को क्यों छोड़ना पड़ता है स्कूल, सुप्रीम कोर्ट ने बताया

शिक्षा पर पड़ने वाले प्रभाव को उजागर करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्वच्छ शौचालयों, मासिक धर्म के दौरान इस्तेमाल होने वाले सोखने वाले उत्पादों और सुरक्षित निपटान सुविधाओं की अनुपस्थिति लड़कियों को या तो अनुपस्थित रहने या स्कूल से पूरी तरह से बाहर निकलने के लिए मजबूर करती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'शिक्षा में भागीदारी केवल कक्षा में शारीरिक उपस्थिति तक सीमित नहीं है। इसमें स्कूल जाने, पाठों के दौरान ध्यान केंद्रित करने और साथियों के साथ समान स्तर पर शैक्षणिक और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों में भाग लेने की क्षमता शामिल है।'

सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में लड़कियों के लिए हों ऐसी व्यवस्था

न्यायमूर्ति परदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने आदेश दिया कि सभी सरकारी और निजी स्कूलों में महिलाओं के लिए अलग शौचालय होने चाहिए जिनमें उपयोग योग्य पानी की सुविधा, साबुन के साथ हाथ धोने की सुविधा और विकलांग बच्चों के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा हो।

स्कूलों में लगे सैनिटरी नैपकिन की वेंडिंग मशीन

सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म के दौरान त्वचा को सोखने वाले उत्पादों की उपलब्धता के संबंध में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि प्रत्येक स्कूल में ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन मुफ्त में उपलब्ध कराए जाएं। स्कूल कैंपस के अंदर शौचालयों में सैनिटरी मशीन की वेंडिंग मशीन लगाई जाएं। इसमें अतिरिक्त यूनिफॉर्म, इनरवियर और अन्य आवश्यक सामग्रियों से सुसज्जित मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन कॉर्नर स्थापित करने का भी प्रावधान किया गया था।

न्यायमूर्ति परदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने आगे निर्देश दिया कि स्कूलों को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के अनुसार स्वच्छता अपशिष्ट के निपटान के लिए सुरक्षित, स्वच्छ और पर्यावरण के अनुकूल तंत्र से सुसज्जित होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'प्रत्येक शौचालय इकाई में स्वच्छता सामग्री के संग्रहण के लिए एक ढका हुआ कूड़ेदान होना चाहिए, और ऐसे कूड़ेदानों की स्वच्छता और नियमित रखरखाव हर समय सुनिश्चित किया जाना चाहिए।' कोर्ट ने इसके साथ ही एनसीईआरटी और राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषदों को आदेश दिया कि वे मासिक धर्म, यौवन और संबंधित स्वास्थ्य चिंताओं पर लिंग-संवेदनशील पाठ्यक्रम शामिल करें ताकि कलंक और वर्जनाओं को तोड़ा जा सके।

पुरुष और महिला शिक्षकों को मासिक धर्म स्वच्छता की मिले ट्रेनिंग

न्यायमूर्ति परदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि सभी शिक्षकों, चाहे वे पुरुष हों या महिला को मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में पर्याप्त प्रशिक्षण और जागरूकता प्रदान की जाए। जिला शिक्षा अधिकारी को विद्यालय के बुनियादी ढांचे का वार्षिक निरीक्षण करने और छात्रों से विशेष रूप से तैयार किए गए सर्वेक्षणों के माध्यम से अनिवार्य रूप से गुमनाम प्रतिक्रिया प्राप्त करने का कार्य सौंपा गया है।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राज्य आयोगों को कार्यान्वयन की निगरानी करने और अनुपालन न करने के मामलों में कार्रवाई करने के लिए कहा गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश जारी करते हुए केंद्र और सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों को तीन महीने के भीतर निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया और कहा कि वह अनुपालन रिपोर्टों के माध्यम से प्रगति की निगरानी करेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने पीरियड की पीड़ा को लेकर की भावुक अपील

अंत में न्यायमूर्ति परदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने भावुक अपील करते हुए कहा, 'यह घोषणा केवल कानूनी व्यवस्था के हितधारकों के लिए ही नहीं है, बल्कि उन कक्षाओं के लिए भी है जहां लड़कियाँ मदद मांगने में संकोच करती हैं, उन शिक्षकों के लिए है जो मदद करना चाहते हैं लेकिन संसाधनों की कमी के कारण ऐसा नहीं कर पाते, और उन माता-पिता के लिए है जो शायद अपनी चुप्पी के प्रभाव को नहीं समझते, और समाज के लिए है ताकि यह स्थापित हो सके कि प्रगति का मापन इस बात से होता है कि हम सबसे कमजोर लोगों की रक्षा कैसे करते हैं।'

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बारे में दिल्ली सरकार के स्कूल में प्रधानाध्यापिका रहीं अनिता भारती ने कहा, 'पूरे देश की लड़कियों के पीरियड हाइजिन को उनके जीवन और शिक्षा के अधिकार से जोड़ने की बात सुप्रीम कोर्ट ने कही है। यह बहुत उत्सावर्धक है।' उन्होंने कहा कि दिल्ली में पिछली सरकार द्वारा छठी कक्षा से 12वीं कक्षा तक की बच्चियों को सैनिटरी नैपकिन दिया जाने लगा। उससे पहले जब लड़कियों को स्कूलों में सैनिटरी नैपकिन नहीं मिलता था, तो उनके यूनीफार्म गंदे होने से लेकर उनकी अनेक परेशानियों को हमने महसूस किया। सुप्रीम कोर्ट का आदेश सभी स्कूलों में सख्ती से लागू होना चाहिए।

पीरियड के पहले दो दिन स्कूल और वर्किंग प्लेस से मिले छुट्टी

अजीम प्रेमजी फाउंडेशन में टीचर एडुकेटर के बतौर काम करने वाली अनुपमा तिवाड़ी ने पत्रिका से बातचीत में कहा, पीरियड के पहले दो दिन बहुत दिक्कत भरे होते हैं। महिलाएं काफी पीड़ा में रहती हैं और उस दौरान उन्हें साफ-सफाई का काफी ख्याल रखना पड़ता है। उन्हें न चाहते हुए भी टॉयलेट बार-बार जाना पड़ता है। दिक्कत यह है कि एक तो महिलाओं के लिए अलग से टॉयलेट बहुत कम ही जगह बने होते हैं। साफ-सुथरे टॉयलेट तो बहुत दूर की कौड़ी है। ऐसे में किसी से वह अपनी पीड़ा बता भी नहीं बता पाती है। स्कूल में पढ़ने वाली महिला हों या कामकाजी हो, उन्हें पीरियड की पहले दो दिन अवकाश मिलनी चाहिए।

'पीरियड के दौरान गंदे टॉयलेट का इस्तेमाल लड़कियों के लिए जानलेवा'

उन्होंने कहा कि एक महत्वपूर्ण बात और कि महिलाओं के गुप्तांग खुले होते हैं, उनका खुले में शौच करना जोखिम भरा होता है। स्कूलों में लड़कियों के लिए हर जगह टॉयलेट नहीं बने हैं और बने भी हों तो उनका इस्तेमाल मजबूरी में करना पड़ता है। गंदे टॉयलेट को इस्तेमाल में लाने से उनका यूरीन इन्फेक्शन बढ़ जाता है। वह अपनी बीमारी के बारे में किसी से बात नहीं कर पाती हैं। बीमारी छिपाने के चलते उनकी बीमारी बढ़ती जाती है और कई बार जानलेवा हो जाती है। इन हालातों से स्कूल जाने वाली लड़कियों और काम पर जाने वाली महिलाओं का विशेष ख्याल रखा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बहुत अच्छा है और उम्मीद करती हूं कि इसको अमल में लाने के लिए सभी सरकारें सार्थक कदम उठाएंगी।

मासिक धर्म को मानवाधिकार का मुद्दा मानें

लखनऊ की सीनियर डॉक्टर ज्योत्सना श्रीवास्तव ने पत्रिका से बातचीत में कहा कि इस मुद्दे को 'लड़कियों का मुद्दा है' के तौर पर नहीं देखना चाहिए बल्कि इसे मानवाधिकार के मुद्दे के बतौर देखना चाहिए। मासिक धर्म के चलते हर महीने करोड़ों लड़कियां और महिलाएं परेशानी से गुजरती हैं। मासिक धर्म अब सिर्फ स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं रह गया। यह सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक समानता का मुद्दा रह गया है। इसमें सबसे बड़ी जो समस्या है, वो जागरूकता की कमी है। समाज में लोग इस बारे में बात नहीं करना चाहता है। मासिक धर्म को गंदी या अशुद्ध प्रक्रिया माना जाता है। इस दौरान उन्हें पूजा—पाठ, रसोईघर से दूर रखा जाता है। इन सब मनाही के चलते लड़कियां खुद को अशुद्ध मानने लग जाती हैं और इन्हें शर्म का विषय मानने लगती हैं।

पीरियड में क्यों बढ़ जाते हैं इंफेक्शन के खतरे

उन्होंने कहा कि इस मामले में दूसरी समस्या आर्थिक तंगी की है। सैनिटरी नैपकिन, टैंपून जैसे उत्पाद गरीब लड़कियों के इस्तेमाल के लिहाज से काफी महंगे हैं और सुदूर ग्रामीण इलाकों में मिलते भी नहीं हैं। यही वजह है कि महिलाएं गोबर, गंदे कपड़े, बोरे इत्यादि का इस्तेमाल करने लग जाती हैं। इसके साथ टॉयलेट की कमी महिलाओं को यूरीन रोककर रखने को बाध्य होती हैं। इनसे इंफेक्शन का खतरा कई गुणा बढ़ जाता है। इसके अलावा साफ पानी की कमी, शौचालय की कमी और प्राइवेसी नहीं मिल पाना भी बड़ी दिक्कतें हैं। इन कमियों के अलावे लड़कियां स्कूल में अपने शिक्षक से इस बारे में बोल नहीं पाती हैं। इसके चलते उनकी पढ़ाई भी प्रभावित होती हैं।

सैनिटरी प्रोडक्ट्स बेचने वाली कंपनियां की भी जवाबदेही तय हो

मेरा मानना है कि स्कूलों में मासिक शिक्षा को लेकर बातचीत करने को अनिवार्य करना चाहिए। लड़कियां जिस समाज से आती हैं, वहां इस बारे में जागरूकता फैलाने की भी जरूरत है। इसके अलावा सरकार को पीरियड से जुड़े उत्पादों को किफायती दामों में मुहैया कराने को लेकर काम करना चाहिए। देश में सैनिटरी से जुड़े प्रोडक्ट बनाते और बेचते हैं, उनकी सामाजिक जवाबदेही तय करनी चाहिए कि वे ग्रामीण इलाकों में कुछ फ्री उत्पाद भी बांटे और तभी कंपिनयों को सामान बेचने का लाइसेंस मिले।

जन औषधि योजना के तहत सैनिटरी प्रोडक्ट्स पर मिले सब्सिडी

उन्होंने कहा कि सरकार को साफ टॉयलेट, साफ पानी, टॉयलेट में हाथ साफ करने के लिए साबुन, सैनिटाइजर आदि स्कूल से लेकर शहर और गांव के कॉमन टॉयलेट में उपलब्ध कराना चाहिए। स्वच्छता अभियान के तहत जो टॉयलेट बने, उनकी साफ-सफाई करवाकर ताले खुलवा देने ​चाहिए। सरकार को जन औषधि योजना में इन उत्पादों को किफायती दरों पर उपलब्ध कराना चाहिए।

उन्होंने यह भी बताया कि लड़कियों या महिलाओं को पीरियड के दौरान क्या-क्या करना चाहिए और क्या-क्या नहीं करना चाहिए।

  • पीरियड के दौरान हर 4-6 घंटे में बदलें। अगर टैम्पोन इस्तेमाल करती हों तो उन्हें 4-8 घंटे से ज्यादा न रखें। मेंस्ट्रुअल कप को हर 12 घंटे में साफ करें।
  • पीरियड के दौरान जननांगों को हर रोज सिर्फ साफ पानी से धोएं। गुनगुने पानी का प्रयोग किया जा सकता है। साबुन या सुगंधित लिक्विड शॉप का उपयोग न करें, क्योंकि इससे पीएच संतुलन बिगड़ सकता है।
  • जननांगों को धोने के बाद हमेशा आगे से पीछे की ओर पोंछें। पीछे से आगे नहीं।
  • पीरियड में इस्तेमाल किए गए पैड को अखबार में लपेटकर कूड़ेदान में डालें, फ्लश न करें।
  • पीरियड के दौरान हवा के संचार के लिए सूती अंडरवियर ही पहनें और उसे नियमित तौर पर बदलते रहें।
  • संक्रमण और गंध से बचने के लिए प्रतिदिन स्नान करना बहुत महत्वपूर्ण है।
  • पीरियड के दौरान क्या न करें?
  • पैड या टैम्पोन को लंबे समय तक न छोड़ें। अन्यथा, इससे चकत्ते निकल सकते हैं या संक्रमण हो सकता है।
  • जननांग के अंदरुनी हिस्से को साफ़ न करें, क्योंकि यह प्राकृतिक तरीके से खुद को साफ करता रहता है।
  • साफ-सफाई के लिए बहुत अधिक सुगंधित उत्पादों का उपयोग न करें।
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