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ऑर्गेनिक खेती से चमक रही किसानों की किस्मत, कम खर्च में मिल रही शानदार पैदावार, जानें इनकी प्रेरणादायक कहानी

Natural Farming: रासायनिक खाद संकट और बढ़ती लागत के बीच किसानों का रुझान अब जैविक खेती की ओर बढ़ रहा है। रायपुर और आसपास के कई किसान कम खर्च में अच्छी पैदावार लेकर ऑर्गेनिक खेती की नई मिसाल पेश कर रहे हैं।

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May 24, 2026
चमक रही किसानों की किस्मत (फोटो सोर्स- पत्रिका)

Organic Farming: @ताबीर हुसैन। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज चौहान द्वारा किसानों से कम से कम अपनी कुछ जमीन पर जैविक और प्राकृतिक खेती अपनाने की अपील ऐसे समय में आई है, जब देशभर में रासायनिक उर्वरकों की उपलब्धता और बढ़ती कीमतें चिंता का विषय बनी हुई हैं। हालांकि रायपुर और आसपास के कई किसान वर्षों पहले ही इस दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं। किसी को एक किताब ने प्रेरित किया, तो किसी ने दूसरों को प्रशिक्षण देते-देते खुद जैविक खेती शुरू कर दी।

आज ये किसान न केवल धान, सब्जियां और दलहन की जैविक खेती कर रहे हैं, बल्कि दूसरे किसानों को भी इसके लिए जागरूक कर रहे हैं। इन किसानों का मानना है कि जैविक खेती सिर्फ खेती का तरीका नहीं, बल्कि मिट्टी, स्वास्थ्य और भविष्य बचाने का माध्यम है।

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ओमप्रकाश सेन पिछले 2016 से तीन एकड़ में जैविक खेती कर रहे

रायपुर जिले के निस्दा (आरंग) निवासी ओमप्रकाश सेन पिछले 2016 से तीन एकड़ में जैविक खेती कर रहे हैं। वे धान के साथ मूंगफली, सूरजमुखी और सब्जियों की खेती भी करते हैं। ओमप्रकाश बताते हैं कि वे पहले एक एनजीओ में काम करते थे, जहां किसानों को जैविक खेती का प्रशिक्षण देने गांव-गांव जाते थे।

इसी दौरान उनके मन में विचार आया कि जब वे दूसरों को जैविक खेती अपनाने की सलाह दे रहे हैं, तो खुद भी इसकी शुरुआत करनी चाहिए। इसके बाद उन्होंने अपने खेत में प्रयोग शुरू किया और धीरे-धीरे पूरी तरह जैविक खेती की ओर बढ़ गए। उनकी मेहनत और नवाचार को देखते हुए उन्हें आत्मा परियोजना के तहत सम्मानित भी किया जा चुका है। उनका कहना है कि जैविक खेती से मिट्टी की सेहत बेहतर रहती है और लागत भी नियंत्रित होती है।

किताब ने बदली सोच, अब बन चुके हैं मास्टर ट्रेनर

जिले के कुकरा (आरंग-लखौली) निवासी ईश्वरी साहू वर्ष 2014 से जैविक खेती कर रहे हैं। उनका चार एकड़ का खेत जैविक प्रमाणीकरण संस्था से प्रमाणित भी है। वे धान के अलावा अरहर, प्याज, लहसुन और कोचई की खेती करते हैं। ईश्वरी बताते हैं कि एक दिन उन्हें जैविक खेती से जुड़ी एक पुस्तक पढ़ने को मिली, जिसने उनकी सोच पूरी तरह बदल दी।

पुस्तक में खेती के प्राकृतिक तरीकों और मिट्टी संरक्षण की जानकारी ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद उन्होंने रासायनिक खेती छोड़ जैविक खेती शुरू कर दी। उनकी उपलब्धियों को देखते हुए उन्हें वर्ष 2018 में उन्नत किसान सम्मान मिल चुका है। वर्तमान में वे कृषि विज्ञान केंद्र में मास्टर ट्रेनर के रूप में भी किसानों को प्रशिक्षण दे रहे हैं।

16 वर्ष की उम्र में शुरू की खेती, अब कर रहे जागरूक

धमतरी जिले के हथबंद निवासी थानेंद्र साहू ने महज 16 वर्ष की उम्र में जैविक खेती की शुरुआत कर दी थी। वर्ष 2012 से वे लगातार जैविक तरीके से खेती कर रहे हैं। वर्तमान में वे 11 एकड़ में धान की तीन किस्मों सेंटेड, औषधीय और सामान्य धान की खेती करते हैं। जैविक खेती में योगदान के लिए उन्हें राज्य सरकार की ओर से कृषक रत्न अलंकरण से सम्मानित किया जा चुका है।

जैविक खेती महंगी नहीं, बल्कि समझ और समर्पण की खेती

थानेंद्र का मानना है कि जैविक खेती महंगी नहीं, बल्कि समझ और समर्पण की खेती है। उनके अनुसार किसान जैविक खेती इसलिए नहीं अपनाते क्योंकि या तो उन्हें इसकी सही जानकारी नहीं होती, या फिर इच्छा और समय की कमी रहती है। वे अब गांव-गांव जाकर व्याख्यान और प्रशिक्षण के माध्यम से किसानों को जागरूक कर रहे हैं।

जैविक खेती किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर उभर रही

रासायनिक खाद के बढ़ते संकट और महंगी खेती के दौर में जैविक खेती किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर उभर रही है। रायपुर और धमतरी के किसानों की सफलता यह साबित करती है कि सही जानकारी, धैर्य और मेहनत से कम लागत में बेहतर पैदावार हासिल की जा सकती है। जैविक खेती न केवल मिट्टी की उर्वरता और लोगों के स्वास्थ्य को सुरक्षित रख रही है, बल्कि किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी मजबूत कदम साबित हो रही है।

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Updated on:
24 May 2026 04:36 pm
Published on:
24 May 2026 04:16 pm
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