Overprotective Parenting :ओवर प्रोटेक्टिव पेरेंटिंग, क्या आप भी हैं ऐसे ही पेरेंट्स? अगर हां तो ये जानकारी आपकी आंखें खोल देगी...
Overprotective Parenting: भारत में एक नया ट्रेंड तेजी से बढ़ता नजर आ रहा है यह ट्रेंड जिम, हॉस्पिटल या फिर किसी मेडिकल रिपोर्ट में नहीं बल्कि, बच्चों के अपने ही घरों में है। आजकल पेरेंट्स बच्चों को सुरक्षित माहौल उपलब्ध करवा रहे हैं या करवाना चाहते हैं लेकिन उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से बेहद कमजोर भी बना रहे हैं। उनकी बदलती लाइफ स्टाइल एक बड़ा संकेत दे रही है कि आने वाला समय उनकी सेहत पर बड़ा संकट ला सकता है। बचपन में ही बढ़ता मोटापा, चश्मा, विटामिन डी की कमी, स्टेमिना से लेकर इम्युनिटी तक कमजोर होना, मानसिक समस्याएं ये बताती हैं अब तस्वीर तेजी से बदल रही है, अगर इसे आज और अभी सुधारा नहीं गया, तो फिर संभालना मुश्किल होगा। पढ़ें संजना कुमार की खास रिपोर्ट…
एक समय ऐसा भी था जब बच्चे मिट्टी में खेलते, धूल से सने, गिरने से घुटने पर चोट का दर्द लिए रोते-रोते घर के अंदर पहुंचते थे, लेकिन कभी ना डांट खाते थे न ही पिटते थे। इसी धूल-मिट्टी और धूप के पोषण के बीच पलते और बढ़ते थे। घंटों तक उनके खेल-कूद उन्हें थकाते नहीं थे, हंसते-खेलते वो घर लौटते थे और जमकर वही खाना खाते थे जो घर में बनाकर रखा जाता था। उनकी यही लाइफ स्टाइल उनके चेहरों के तेज और खुशी में नजर आती थी। वे न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी स्ट्रॉन्ग और शार्प होते थे। लेकिन आज का जमाना नया है, आज की पेरेंटिंग ऐसी नहीं रही अब बच्चे ज्यादा सुरक्षित माहौल और हाइजीन के बीच पल-बढ़ रहे हैं। लेकिन एक्सपर्ट् का कहना है कि आने वाला समय ऐसी परवरिश के बच्चों के लिए बिल्कुल भी सेफ नहीं है।
कोविड के बाद से जहां परिवार साफ-सफाई और हाइजीन को लेकर अवेयर हुए हैं, वहीं ज्यादातर परिवार ऐसे हैं जहां इस अवेयरनेस को जरूरत से ज्यादा ही महत्व दिया जा रहा है। बच्चे धूप में नहीं खेल सकते, मिट्टी से दूर रखे जा रहे हैं, स्कूल-ट्यूशन के बीच खेलने-कूदने का समय उनके पास बिल्कुल नहीं है। और अगर है भी तो सिर्फ मोबाइल-लैपटॉप या कम्प्यूटर पर आंखें गड़ाए रखने का टाइम उन्हें जरूर दिया जा रहा है।
भारत में ज्यादातर परिवार में अपने बच्चों की पढ़ाई को लेकर ज्यादा गंभीर नजर आते हैं। लेकिन देखा यह भी गया है कि उनकी हेल्थ पर फोकस केवल खाना-खिलाने को लेकर किया जाता है, न की खेलने-कूदने पर। ऐसे में पढ़ाई का महत्व तो बढ़ रहा है, लेकिन फिजिकल हेल्थ वैल्यूज कहीं पीछे छूटती जा रही हैं। सूरत, गुजरात के पीडियाट्रिशियन डॉ. संजीव राव कहते हैं खेल को मेडल के रूप में देखने के बजाय बच्चे की फिजिकल और मेंटल हेल्थ के नजरिये से भी देखना शुरू कर दीजिए। आउटडोर गेम्स शारीरिक और मानसिक हेल्थ को स्ट्रॉन्ग करते हैं।
हाल ही में आई World Obesity Federation की रिपोर्ट के अनुसार भारत 4.1 करोड़ बच्चे ओवरवेट या ऑबेसिटी की समस्या से जूझ रहे हैं। इस रिपोर्ट में शोधकर्ताओं ने चौंकाने वाला खुलासा किया है और चेतावनी भी दी है कि अगर यही ट्रेंड बना रहा तो 2040 तक ऐसे बच्चों की संख्या दोगुनी तेजी से बढ़ सकती है। इस रिपोर्ट में इसके कारण भी बताए गए हैं, जिनमें...
UNICEF 2025 की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में बच्चों से लेकर युवाओं तक में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक सामान्य से कम वजन के साथ ही मोटापे के मामले भी अब देश के लिए समस्या बन चुके हैं। पहली बार दुनिया में स्कूल जाने वाले बच्चों में मोटापा, कुपोषण और पोषण की कमी बड़े हेल्थ इश्यू बनकर उभर रहे हैं।
अगर आप भी मानते हैं कि घर का खाना खाने से शरीर पूरी तरह सुरक्षित रहता है। लेकिन यह बात आपको चौंका देगी कि भरपूर पोषण वाली थाली में अब उतना पोषण नहीं रहा। जयपुर की डायटिशियन एक्सपर्ट विजेता शर्मा कहती हैं कि आज के खानपान में पोषण पहले जैसा नहीं रहा। फास्ट फूड, प्रोसेस्ड स्नैक्स और मीठे पेय बच्चों की डाइट का हिस्सा बन चुके हैं। वहीं दूसरी तरफ उनके खाने में प्रोटीन के साथ ही फायबर की मात्रा कम होती जा रही है।
केंद्र सरकार की रिपोर्ट children in india 2025 में गुजरात को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े भी सामने आए हैं। इस रिपोर्ट में 10-19 साल के बच्चों में डायबिटीज प्रीवेलेंस के मामले 2.9 फीसदी तक दर्ज किए गए हैं। 5-9 साल के बच्चों में 20 फीसदी से ज्यादा बच्चे ऐसे हैं जो प्री डायबिटीक की श्रेणी में आते हैं। इस रिपोर्ट में बच्चों की बिगड़ती सेहत का कारण भी बताया गया है। इनमें मोटापा, सेंडेंटरी लाइफ स्टाइल, शुगरी फूड, लगातार स्क्रीन देखना शामिल है।
2025 की Meta Analysis में भारत के हजारों बच्चों, टीन एजर्स की हेल्थ को लेकर डेटा विश्लेषण किय गया। इस विश्लेषण में पाया गया कि भारतीय बच्चों और किशोरों में विटामिन D की कमी की औसत दर करीब 66 फीसदी तक पाई गई है। इसका कारण आजकल बच्चों का धूप में न रहना या कम से कम समय रहना। घर में रहने वाली लाइफस्टाइल फॉलो करना औऱ खराब डाइट को इसका बड़ा कारण माना गया है।
ये समस्याएं आज के बच्चों में कॉमन हो गई हैं। जरा सा गिरने भर पर उन्हें गंभीर चोट लग सकती है, हड्डियों में फ्रेक्चर के मामले सामने आ सकते हैं।
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के मुताबिक अब भारतीय बच्चों के लिए नया ग्रोथ स्टेंडर्ड तैयार किया जा रहा है। इसका बड़ा कारण
आज के युवाओं और बच्चों में देर रात तक मोबाइल इस्तेमाल आम हो चुका है। इसका असर सिर्फ आंखों पर नहीं, बल्कि हार्मोन और मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। अमेरिका की University of Chicago की रिसर्च के मुताबिक लगातार कम नींद लेने से पुरुषों में testosterone level तक गिर सकता है। डॉक्टरों का कहना है कि अच्छी नींद, नियमित एक्सरसाइज, संतुलित भोजन, तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
कई हेल्थ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि कई परिवारों में बेटा-बेटी का फर्क भी देखा जाता है। लड़कियों को ज्यादा संभालकर रखा जाता है। उन्हें बाहर खेलने, स्पोर्ट्स में पार्टिसिपेट करने से रोका जाता है, लेकिन बेटे को उतनी ही आजादी दी जाती है। जबकि मजबूत शरीर की जरूरत अकले लड़कों को नहीं लड़कियों को भी है। इसलिए दोनों को आजादी दें।
कुल मिलाकर कहना होगा कि बच्चों की सेहत लाइफस्टाइल और कुपोषण दोनों ही घटक प्रभावित कर रहे हैं। जिससे न केवल शारीरिक कमजोरी, मेटाबॉलिज्म की खराबी, हार्मोनल डिसबेलेंस और मानसिक तनाव के मामले बढ़ रहे हैं। ये सामान्य खतरा नहीं बल्कि बच्चों की सेहत का ऐसा बड़ा खतरा है जो उनकी आने वाली पीढ़ियों पर साफ नजर आएगा। यानी अब पेरेंट्स से सवाल ये नहीं कि आपके बच्चे पढ़ कितना रहे हैं, इसके साथ यह भी होना चाहिए कि वे कितने स्वस्थ हैं?
हाल ही में चीन की एक रिपोर्ट ने हर किसी को चौंका दिया। दुनिया भर में कम हाइट पर्सनैलिटी के लिए जाना-पहचाना जाने वाला चीन अब दुनिया भर के लिए प्रेरणा बन रहा है कि कैसे पोषण के सहारे सेहत से लेकर जिंस तक को सुधारा जा सकता है। अकेले चीन ही नहीं कई देश पोषण और फिटनेस को लेकर बड़े स्तर पर काम कर रहे हैं। पोषण से भरपूर थाली, स्पोर्ट्स और हेल्थ प्रोग्राम के कारण इन देशों में नई पीढ़ी की औसत फिटनेस और हाइट भी इम्प्रूव होती नजर आई। लेकिन भारत में अब भी ज्यादातर बच्चे, किशोर और युवा प्रोटीन, धूप और एक्सरसाइज को लेकर भ्रम में ही जी रहे हैं।
चना, राजमा, लोबिया, मूंग, दालें, अंडे या अन्य प्रोटीन स्रोत को नियमित रूप से खाने में शामिल करना चाहिए। इससे शरीर की मांसपेशियां, इम्युनिटी और ऊर्जा बेहतर रहती है।
बच्चों का हर समय सुरक्षित रखने के प्रयास (ओवरकेयर पेरेंटिंग) में हम उनकी नेचुरल क्षमता कमजोर करते जा रहे हैं। शरीर को मजबूत बनाए रखने के लिए एक्टिविटी के साथ ही नेचुरल एक्सपोजर बेहद जरूरी है।
डॉ. संजीव राव, पीडियाट्रिक एक्सपर्ट, सूरत, गुजरात