CG News: बस्तर की मिट्टी में छुपी कला को नई पहचान देने और नन्हें हाथों में सृजन की मशाल सौंपने का काम कर रही हैं युवा मृदा शिल्प कलाकार पलक साहू। जगदलपुर स्थित बस्तर आर्ट गैलरी में बच्चों को मिट्टी से सपनों का आकार देना सिखाकर वे न केवल नई पीढ़ी को कला से जोड़ रही हैं, बल्कि बस्तर की पारंपरिक शिल्प परंपरा को भी संवार रही हैं।
CG News: बस्तर की मिट्टी सिर्फ जमीन नहीं है, यह इतिहास, परंपरा और संस्कृति की वाहक है। इसी मिट्टी को नई पहचान देने और नन्हें हाथों में रचनात्मकता की मशाल थमाने का काम कर रही हैं युवा मृदाशिल्प कलाकार पलक साहू। जगदलपुर के ऐतिहासिक दलपतसागर के समीप स्थित बस्तर आर्ट गैलरी में इन दिनों मिट्टी से खेलते बच्चों की मुस्कान ही सबसे बड़ी पहचान बन गई है।
गैलरी के एक कोने में मिट्टी से सजे हाथ, उत्सुक आँखें और कल्पनाओं की उड़ान दिखाई देती हैं। कोई दीया बना रहा है, तो कोई कप, और कोई अपनी ही दुनिया रच रहा है। इन मासूम आकृतियों को सलीके और सुंदरता का रूप देने की जिम्मेदारी पलक साहू निभा रही हैं। वे बच्चों को सिर्फ कला ही नहीं, बल्कि आत्मविश्वास भी सिखा रही हैं।
पलक साहू ने बीकॉम की पढ़ाई के बाद फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया। कला के प्रति उनका जुनून उन्हें पुणे और मुंबई तक ले गया, जहां उन्होंने मृदाशिल्प की बारीकियां सीखीं। पलक बताती हैं कि बस्तर की मिट्टी में ऑक्साइड की मात्रा अधिक होने के कारण इससे बनी कलाकृतियों में दरार और खुरदुरापन आ जाता है। इसलिए वे बैंगलुरु और नई दिल्ली से विशेष मिट्टी मंगवाती हैं, जिससे पॉटरी में चिकनाई आती है और पॉलिश करना आसान होता है।
शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए पलक बाहर गईं, लेकिन उनका मन हमेशा बस्तर में ही लगा रहा। वे कहती हैं कि बाहर जाकर सीखना जरूरी था, ताकि वापस आकर अपने क्षेत्र की कला को मजबूत किया जा सके। आज वे बच्चों और मृदाशिल्प सीखने के इच्छुक युवाओं को इसकी बारीकियां सिखा रही हैं।
पलक को बच्चों को सिखाना सबसे ज्यादा पसंद है। उनका मानना है कि बच्चों की कल्पनाशक्ति अनंत होती है। वे बिना डर के सोचते हैं और मिट्टी के जरिए अपने मन की बात बाहर लाते हैं। बच्चों के साथ काम करते हुए पलक को सुकून और संतोष मिलता है।
पलक साहू का विश्वास है कि अगर प्रशासनिक सहयोग और संसाधन मिलें, तो बस्तर मृदाशिल्प के क्षेत्र में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान बना सकता है। नन्हें हाथों में सृजन की मशाल थमाकर पलक साहू न केवल मृदाशिल्प को जीवित रख रही हैं, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त प्रयास भी कर रही हैं।