Patrika Interview: मिडिल क्लास परिवारों की सच्चाई, सिचुएशनल कॉमेडी की गहराई और महिला किरदारों के यथार्थ चित्रण को लेकर उनकी सोच बाजार से अलग है। अभिनेत्री और लेखिका समता सागर से पत्रिका की बातचीत
Patrika Interview: ताबीर हुसैन. अभिनेत्री और लेखिका समता सागर उन रचनाकारों में हैं, जिन्होंने अपने लेखन और अभिनय से आम जिंदगी की कहानियों को खास बना दिया है। थिएटर, टेलीविजन और लेखन का उनका अनुभव उन्हें एक संवेदनशील नजरिया देता है। मिडिल क्लास परिवारों की सच्चाई, सिचुएशनल कॉमेडी की गहराई और महिला किरदारों के यथार्थ चित्रण को लेकर उनकी सोच बाजार से अलग है। भारत रंग महोत्सव में शामिल होने आईं समता सागर ने पत्रिका से बातचीत में अपने रचनात्मक संतोष, बचपन के अनुभवों, कॉमेडी की समझ, थिएटर की भूमिका और भारतीय टेलीविजन पर महिलाओं के मौजूदा चित्रण पर खुलकर विचार रखे।
जब मैं अपने लिखे किरदारों को किसी और को निभाते हुए देखती हूं, तो एक अलग तरह का आनंद मिलता है। आपने जो एक दुनिया क्रिएट की होती है, वह आपके सामने सजीव हो जाती है। वहीं जब मैं किसी किरदार को खुद निभाती हूं, तो उसका भी अपना मजा है। सच कहूं तो दोनों ही सूरतों में मुझे बहुत ज्यादा आनंद और संतोष मिलता है, इसलिए मैं दोनों की तुलना नहीं कर पाती।
मेरी कहानियां मेरे बचपन से आती हैं। छोटे शहरों में बिताया समय, गर्मियों की छुट्टियां, शादियां और समाज में रंग को लेकर जो ऑब्सेशन है, वह सब मैंने बहुत करीब से देखा है। मुझे बचपन से लोगों को ऑब्जर्व करना अच्छा लगता था। मिडिल क्लास परिवारों की छोटी-छोटी खुशियां, जरूरतें और संघर्ष ही मेरी कहानियों की असली जमीन हैं।
कॉमेडी लिखना और करना सच में मुश्किल है। मैं जबरदस्ती हंसाने में भरोसा नहीं करती। मेरे गुरु बंसीजी का मानना था कि सबसे सुंदर हंसी गहरे दुख के बाद निकलती है। अगर आप जिंदगी को ध्यान से देखें, तो हर दुख के भीतर भी एक कॉमिक पहलू छिपा होता है। मैं उसी सच्चे और सहज हास्य को पकडऩे की कोशिश करती हूं।
थिएटर ने मेरी झिझक खत्म की और आत्मविश्वास दिया, लेकिन थिएटर और स्क्रीन एक्टिंग में काफी फर्क है। मंच पर हम थोड़े लाउड होते हैं, ताकि आखिरी सीट तक बात पहुंचे। कैमरे के सामने बहुत नेचुरल और सूक्ष्म होना पड़ता है। अगर किसी को सिर्फ टीवी या फिल्म में काम करना है, तो उसके लिए अलग तरह की ट्रेनिंग जरूरी है। थिएटर मददगार है, लेकिन यह कोई शॉर्टकट नहीं है।
ईमानदारी से कहूं तो टीवी पर महिलाओं का चित्रण देखकर मुझे शर्म महसूस होती है। टीआरपी के चक्कर में बहुत सतही और बनावटी कंटेंट दिखाया जा रहा है। रोना, चिल्लाना और साजिशें ही महिला किरदारों की पहचान बन गई हैं। यह समाज के लिए नुकसानदेह है। फिर भी मुझे भरोसा है कि यह दौर बदलेगा। मैं खुद भी ऐसे किरदारों से बचने की कोशिश करती हूं और तभी काम करती हूं, जब रोल थोड़ा रियल और सच्चा लगे।