
Pedestrian Safety India : वर्ष 1998-99 की बात है। राजधानी दिल्ली में सेंट स्टीफंस कॉलेज कैंपस से लगते हुए फुटपाथ पर हिंदू कॉलेज का एक दृष्टिहीन छात्र चलता हुआ आ रहा था और अचानक नाले में गिर पड़ा। वहां खड़े अन्य लड़कों ने उसे तत्काल निकाला और उसे स्वास्थ्य केंद्र ले गए। उसे प्राथमिक उपचार से सही समय पर मिला और खैरियत यह रही कि वह एक-दो दिन में पूरी तरह से ठीक हो गया। हालांकि, उसे नाले की बदबू कई महीनों तक डराती रही। लेकिन, यह भी सच है कि इस देश में हजारों पैदल चलने वाले की जानें हर साल चली जाती है। आइए हम इस रिपोर्ट में भारत और दुनिया में पैदल चलने वालों की मुश्किलों के बारे में समझने की कोशिश करते हैं।
देश में फुटपाथ की कमी या उनपर अतिक्रमण के चलते सबसे ज्यादा दिक्कत स्कूल जाने वाले बच्चे, बुजुर्ग, दिव्यांग और कम आय वाले लोगों को होती है। फुटपाथ नहीं होने की वजह से देश में लोगों को गाड़ियों के बीच से चलना पड़ता है। इसका अंजाम यह होता है कि हर वर्ष हजारों लोगों की जान चली जाती है जबकि कई लाख लोग घायल भी हो जाते हैं। वर्ष 2019 से लेकर 2024 के बीच भारत में 1.8 लाख से अधिक पैदल यात्रियों को जान से हाथ धोना पड़ा। इनमें लगभग 30% मौतें राष्ट्रीय राजमार्गों पर हुईं।
वहीं दुनिया में हर 2 मिनट में एक पैदल यात्री या साइकिल चालक सड़क हादसे में मारे जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में सड़क दुर्घटनाओं में हर साल करीब 11.9 लाख लोगों की मौत होती है। इनमें बड़ी संख्या पैदल यात्रियों, साइकिल चालकों और दोपहिया उपयोगकर्ताओं की होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सड़क दुघर्टना में एक स्कूली बच्चे की मौत के मामले की सुनवाई करते हुए कहा है कि फुटपाथ पर चलना एक मौलिक अधिकार है। हालांकि, इस अधिकार को केवल इंजीनियरिंग समाधान तक सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए ऐसे समावेशी सार्वजनिक स्थान बनाने होंगे जहां हर व्यक्ति सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से चल सके। इतना ही नहीं माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से आग्रह किया कि वह इस बारे में एक ऐसा कानून बनाए जो इस अधिकार को स्पष्ट मान्यता दे।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (d) के तहत भारत के क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से घूमने के अधिकार और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से जुड़े मौलिक अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए। देश में अभी तक सिर्फ मोटर वाहन अधिनियम, 1988 में वाहन चालकों की पैदल यात्रियों के प्रति कुछ जिम्मेदारियां तय की गई हैं, लेकिन यह कानून मुख्य रूप से वाहनों के लिए है और यह पैदल यात्रियों के अधिकारों की पूरी सुरक्षा नहीं करता।
भारत की पहचान दुनिया में सबसे अधिक सड़क दुर्घटना मौतों वाले देशों में होती है। दरअसल, सड़क पर अभिजात वर्ग यानी बड़ी और भारी-भरकम मोटरकार वालों का अलिखित कब्जा है। तीन लेन की सड़क हो या चार लेन की, कार या बड़ी गाड़ी चालक आगे निकलने या जल्दी पहुंचने की होड़ में हर लेन में घुसकर भयावह स्थिति पैदा कर देते हैं। रात में सड़कों पर पैदल यात्री, साइकिल चालक और दुपहिया वाहन चालकों और उनके परिजनों की जान घर या मंजिल तक पहुंचने तक हलक में ही फंसी रहती है।
दुनिया के कुछ मुल्कों को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर मुल्कों की शहरों में सड़कें गाड़ियों के चलने के लिए डिजाइन की जाती है। सड़क निर्माण योजना में पैदल यात्रियों का ख्याल न्यूनतम ही किया जाता है। अगर शहर में कहीं सड़क के किनारे फुटपाथ बनी होती है तो उसपर रेहड़ी, पटरी वाले अपना कब्जा जमा लेते हैं। ट्रैफिक जाम या पीक आवर्स में मोटरबाइक वाले फुटपाथ पर होकर जल्दबाजी में निकल जाना चाहते हैं। ऐसे में पैदल चलने वालों की हालत छोटे से लेकर बड़े शहरों में बहुत दयनीय हो चुकी है। देश में ज्यादातर फुटपाथों के नीचे से शहर का बड़ा और गहरा नाला गुजर रहा होता है और वह कई जगहों पर टूटी-फूटी या जानलेवा की हद तक बर्बाद हालत में पाए जाते हैं। कायदे से एक अच्छे पैदल मार्ग के लिए छाया देने वाले पेड़, एक-दो किलोमीटर के अंतराल पर बैठने की साफ कुर्सियां या बेंच, पीने योग्य पानी और खाने की दुकानों का होना जरूरी है।
हालांकि कुछ छोटे और बड़े शहरों में सामाजिक दबाव बनता हुआ दिख रहा है। इसका असर यह हुआ है कि दिल्ली, बेंगलुरु, इंदौर, अहमदाबाद, कोलकाता, भुवनेश्वर में पैदल यात्रियों को ध्यान में रखकर चुनिंदा इलाकों में पहले के मुकाबले सुविधाएं थोड़ी बेहतर हुई हैं। हालांकि, देश की ज्यादातर सरकारों को स्कूल, अस्पताल, बस अड्डा, रेलवे स्टेशन, बाजार और कार्यालयों के आसपास पैदल चलने वाले यात्रियों की सुविधाओं को बेहतर ढंग से क्रियान्वित करें।
सड़क सुरक्षा के लिए कई दशकों से काम करे सामाजिक कार्यकर्ता राजेंद्र रवि ने पत्रिका से बातचीत में कहा, 'महात्मा गांधी ने दुनिया को एक ऐसा जंतर दिया, जिसके आधार पर हम अपने हर प्रयास और निर्णय का मूल्यांकन कर सकते हैं। उन्होंने कहा था कि किसी भी कार्य को करने से पहले यह विचार करना चाहिए कि उससे समाज के सबसे कमजोर और वंचित व्यक्ति को कितना लाभ मिलेगा। उनके शब्दों में, “किसी समाज की वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और असुरक्षित लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है।”
प्रश्न: यदि हम इस कसौटी पर अपनी सड़कों और शहरी परिवहन व्यवस्था को परखें, तो क्या हम सचमुच सफल दिखाई देते हैं?
इस सवाल के जवाब में राजेंद्र रवि ने बताया कि महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के विचार को आगे बढ़ाते हुए विश्व प्रसिद्ध शहरी चिंतक जेन जैकब्स (Jane Jacobs) ने कहा था कि, “शहर तभी सभी के लिए उपयोगी बनते हैं, जब उनका निर्माण और विकास हर वर्ग की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाए। इसमें पैदल चलने वालों के अधिकार भी शामिल हैं।”
प्रसिद्ध शहरी डिजाइन विशेषज्ञ जन गहल (Jan Gehl) का मानना है कि, “सबसे पहले मनुष्यों के जीवन और उनकी गतिविधियों को महत्व दिया जाना चाहिए, उसके बाद सार्वजनिक स्थानों और भवनों की योजना बनाई जानी चाहिए। सुरक्षित और सुविधाजनक पैदल मार्ग इसी सोच का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।”
कोलंबिया के विख्यात शहरी परिवहन योजनाकार एनरिक पेनोलोसा (Enrique Peñalosa) ने विकसित समाज की परिभाषा देते हुए कहा था, “विकसित समाज वह नहीं है जहाँ गरीब भी कार रखते हों, बल्कि वह है जहाँ अमीर लोग भी सार्वजनिक परिवहन और पैदल चलने को सम्मानजनक विकल्प मानते हों।”
शहरी नियोजन के अग्रणी विचारक लुईस मम्फोर्ड (Lewis Mumford) ने भी मानव-केंद्रित शहरों की वकालत करते हुए कहा कि शहरों का उद्देश्य केवल यातायात को तेज़ करना नहीं, बल्कि लोगों के जीवन को अधिक सुरक्षित, सहज और मानवीय बनाना होना चाहिए।
परिवहन विशेषज्ञ जेनेट सादिक-खान (Janette Sadik-Khan) के अनुसार, “सड़कें हमारे शहरों की सबसे बड़ी सार्वजनिक जगहें हैं, इसलिए उन्हें हर व्यक्ति-विशेषकर पैदल यात्रियों, बच्चों, बुजुर्गों और दिव्यांगजनों- के लिए सुरक्षित, सुलभ और उपयोगी बनाना आवश्यक है।”
प्रश्न : देश में फुटपाथों पर पैदल चलने की जगह लगातार कम होती जा रही है। आपकी क्या राय है?
उत्तर : मेरी राय में देश के अधिकांश शहरों में पैदल चलने वालों के लिए उपलब्ध स्थान लगातार सिमटते जा रहे हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि शहरी विकास की योजनाएं अब भी मोटर वाहनों को केंद्र में रखकर बनाई जाती हैं। परिणामस्वरूप, फुटपाथ या तो बनाए ही नहीं जाते, बनाए जाने के बाद उनके रखरखाव की अनदेखी की जाती है, अथवा वे अतिक्रमण, पार्किंग और व्यावसायिक गतिविधियों के कब्ज़े में चले जाते हैं। इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव बच्चों, बुज़ुर्गों, महिलाओं, दिव्यांगजनों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों पर पड़ता है, जिनके लिए पैदल चलना आवागमन का प्रमुख साधन है।
मेरे विचार से सड़कें केवल वाहनों के लिए नहीं, बल्कि सबसे पहले मनुष्यों के लिए होती हैं। सुरक्षित, चौड़े और निर्बाध फुटपाथ किसी भी सभ्य, समावेशी और संवेदनशील समाज की पहचान हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट किया है कि सुरक्षित और चिन्हित फुटपाथों पर चलना नागरिकों का एक बुनियादी अधिकार है। इसलिए सरकारों और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है कि वे फुटपाथों का निर्माण, संरक्षण तथा उन्हें अतिक्रमण-मुक्त रखने की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करें।
प्रश्न : देश में कई बार साइकिल कॉरिडोर बनाने की बात हुई, लेकिन वे सफल क्यों नहीं हो पाईं?
देश में साइकिल कॉरिडोर विकसित करने की अनेक योजनाएँ बनीं, लेकिन अधिकांश स्थानों पर वे अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सकीं। इसका मुख्य कारण यह है कि इन्हें समग्र परिवहन नीति और दीर्घकालिक शहरी नियोजन के हिस्से के रूप में विकसित करने के बजाय अक्सर प्रतीकात्मक परियोजनाओं के रूप में लागू किया गया।
कई शहरों में साइकिल लेन अधूरी, असंबद्ध और असुरक्षित बनी रहीं। समय के साथ उन पर मोटर वाहनों की पार्किंग, अतिक्रमण या अन्य गतिविधियों का कब्ज़ा हो गया। इसके अलावा, शहरी परिवहन नीतियों में अब भी मोटर वाहनों को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि साइकिल चालकों के लिए सुरक्षित, निरंतर और सार्वजनिक परिवहन से जुड़े हुए मार्गों की व्यवस्था का अभाव है।
सामाजिक दृष्टि से भी साइकिल को अक्सर मजबूरी का साधन माना जाता है, जबकि इसे एक सस्ता, स्वास्थ्यवर्धक, पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ परिवहन विकल्प के रूप में सम्मान और प्रोत्साहन मिलना चाहिए। जब तक नीतिगत प्राथमिकताओं में पैदल यात्रियों और साइकिल चालकों को उचित स्थान नहीं मिलेगा, तब तक ऐसी योजनाओं की सफलता सीमित ही रहेगी।