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खाली नहीं, बूढ़े हो रहे हैं गांव! जनगणना के आंकड़े बयां कर रहे हैं ग्रामीण भारत में पलायन की नई कहानी

Rural Migration: भारतीय गांवों में पलायन की स्थिति कैसी है, इसका महज एक उदाहरण बना है, उत्तराखंड, जहां 1792 गांव खाली हो चुके हैं। वहीं देश भर के कई राज्यों में भी गांवों से युवाओं का बढ़ता पलायन चिंता का विषय है, हालांकि कुछ अध्ययन बताते हैं कि पलायन हमेशा बुरा नहीं होता, विकास का हिस्सा भी होता है, लेकिन उत्तराखंड की स्थिति नीति निर्माताओं के लिए चेतावनी बन गई है। अगर अब भी गांवों को महात्मा गांधी और नेहरू की नजर से नहीं देखा, तो परिणाम गंभीर भी हो सकते हैं
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Rural Migration in India

Rural Migration in India: भारत के गांवों से 20-39 साल के युवा बड़ी संख्या में पलायन कर रहे हैं। जिससे गांवों में बुजुर्गों और आश्रितों की संख्या बढ़ रही है। (photo source AI Generated)

Rural Migration in India: महात्मा गांधी मानते थे भारत की आत्मा उसके गांवों में बसती है और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने गांवों की आधुनिकता उनके विकास को भारत के विकास का आधार बताया। लेकिन उत्तराखंड के हजारों गांवों का निर्जन होना, युवाओं का रोजगार की तलाश में गांव छोड़कर दूसरे शहरों में पलायन करना बताता है कि स्थिति बेहतर नहीं है। रोजगार की तलाश में लगातार पलायन अब सामान्य हो चला है। देश के गांव अब खास तौर पर अपनी युवा और कमाई करने वाली उम्र की वो आबादी खो रहे हैं, जो उनकी अर्थव्यस्था को सहारा दे सकती है। 2011 की जनगणना, श्रम सर्वेक्षण और कई अध्ययनों का विश्लेषण किया जाए, तो पलायन की ये तस्वीर किसी एक गांव या राज्य की नहीं है, बल्कि बदलते ग्रामीण भारत की नई कहानी बयां कर रही है, क्या भारत की ये आत्मा धीरे-धीरे बुजुर्ग हो रही है? क्या नेहरू के सपनों का भारत बिखर रहा है? सवाल अहम हैं और जरूरी भी अपना गांव क्यों छोड़ रहे लोग, किन राज्यों में पलायन बढ़ा है, अपना घर छोड़ ये लोग जा कहां रहे हैं और इनके जाने से गांवों की अर्थव्यवस्था, खेती और सामाजिक ढ़ांचे पर कैसे असर पड़ रहा है? पढ़ें संजना कुमार की खास रिपोर्ट…

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