
मो. इरशाद खान/Bijapur Bridge Project: कभी नक्सल हिंसा, बारूदी सुरंगों और मुठभेड़ों के कारण देशभर की सुर्खियों में रहने वाला बीजापुर आज तेजी से बदल रहा है। वर्षों तक जिस जिले की पहचान बंदूक, भय और अलगाव से होती थी, वहां अब विकास की नई इबारत लिखी जा रही है। सड़कें जंगलों को चीरते हुए गांवों तक पहुंच रही हैं, पुल दूरियों को खत्म कर रहे हैं, मोबाइल नेटवर्क लोगों को दुनिया से जोड़ रहा है और कभी हथियार उठाने वाले लोग अब रोजगार और सम्मानजनक जीवन की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। यह बदलाव किसी एक परियोजना तक सीमित नहीं है। यह सुरक्षा, विकास और जनविश्वास की उस संयुक्त प्रक्रिया का परिणाम है, जिसने बीजापुर की तस्वीर और तकदीर दोनों बदलनी शुरू कर दी हैं।
भैरमगढ़ विकासखंड के फुंडरी गांव में इंद्रावती नदी पर बन रहा हाई लेवल ब्रिज अब अंतिम चरण में पहुंच चुका है। यह पुल केवल कंक्रीट और लोहे का ढांचा नहीं, बल्कि हजारों ग्रामीणों के लिए नई जिंदगी का रास्ता है। पुल तैयार होने के बाद बीजापुर और नारायणपुर के बीच आवागमन पहले से कहीं अधिक आसान हो जाएगा। बीजापुर के बांगोली, बैल, ताकिलोड़, मर्रामेटा और इतामपारा सहित नारायणपुर जिले के डुंगा, थुरथली, रेखावाया और पिड़ियाकोट समेत आसपास के गांवों के 13 हजार से अधिक ग्रामीणों को सीधा लाभ मिलेगा।
अब तक बरसात के मौसम में इंद्रावती नदी लोगों की जिंदगी रोक देती थी। मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पाते थे, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती थी और राशन व जरूरी सामान की आपूर्ति भी बाधित रहती थी। पुल बनने के बाद स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, रोजगार, बाजार और सरकारी योजनाओं तक पहुंच पहले से कहीं अधिक आसान और तेज होगी।
बीते एक वर्ष में बीजापुर में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास किए गए। कर्रेगुट्टा पहाड़ के दुर्गम क्षेत्रों में तीन नए फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस (FOB) स्थापित किए गए। जिन इलाकों में कभी सुरक्षा बलों का पहुंचना भी मुश्किल माना जाता था, वहां अब प्रशासन की मौजूदगी लगातार बढ़ रही है।
इन सुरक्षा शिविरों के बाद सड़क निर्माण, बिजली, पेयजल, स्वास्थ्य शिविर और राशन वितरण जैसी सुविधाएं दूरस्थ गांवों तक पहुंचने लगी हैं। ग्रामीणों में विश्वास बढ़ा है और सरकारी योजनाओं का लाभ भी पहले की तुलना में तेजी से मिलने लगा है।
बीजापुर के बदलाव की सबसे बड़ी कहानी उन लोगों की है जिन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। 25 जून 2025 से 25 जून 2026 के बीच जिले में 573 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि बदलती सोच और बढ़ते विश्वास का संकेत है।
आत्मसमर्पण करने वाले पूर्व नक्सलियों को मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना के तहत राजमिस्त्री, इलेक्ट्रिशियन, वाहन चालक, सिलाई, कृषि और अन्य रोजगारपरक प्रशिक्षण दिए जा रहे हैं। उद्देश्य सिर्फ उन्हें हथियार छोड़ने के लिए प्रेरित करना नहीं, बल्कि सम्मानजनक और आत्मनिर्भर जीवन देना है।
बीजापुर के कई ऐसे गांव, जहां कभी सड़क, मोबाइल नेटवर्क और सरकारी अधिकारी तक नहीं पहुंच पाते थे, अब वहां विकास कार्य दिखाई देने लगे हैं। सड़क निर्माण के साथ एंबुलेंस की पहुंच आसान हुई है। मोबाइल टावर लगने से लोग डिजिटल सेवाओं से जुड़ रहे हैं। राशन वितरण, स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा की सुविधाएं भी धीरे-धीरे मजबूत हो रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले कई गांव बरसात के मौसम में महीनों तक कट जाते थे, लेकिन अब पुल और सड़कों के बनने से हालात बदल रहे हैं।
हालांकि बदलाव की तस्वीर उत्साहजनक है, लेकिन चुनौतियां अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। जिले के कई दूरस्थ क्षेत्रों में अब भी बुनियादी सुविधाओं का विस्तार होना बाकी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, रोजगार और डिजिटल कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में लगातार काम करने की जरूरत बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा के साथ यदि विकास की रफ्तार लगातार बनी रही, तो आने वाले वर्षों में बीजापुर देश के उन जिलों में शामिल हो सकता है, जिन्होंने संघर्ष से विकास तक का सबसे बड़ा सफर तय किया।
बीजापुर अब केवल नक्सल प्रभावित जिला नहीं, बल्कि बदलाव की एक मिसाल बनने की ओर बढ़ रहा है। जहां कभी गोलियों की आवाज सुनाई देती थी, वहां आज पुल बन रहे हैं। जहां कभी डर का माहौल था, वहां अब बच्चे स्कूल जा रहे हैं। जहां कभी प्रशासन की पहुंच मुश्किल थी, वहां अब विकास की योजनाएं पहुंच रही हैं। यह बदलाव बताता है कि जब सुरक्षा, प्रशासन और जनभागीदारी एक साथ काम करते हैं तो सबसे कठिन हालात भी बदले जा सकते हैं। बीजापुर की यह कहानी केवल एक जिले की नहीं, बल्कि उस उम्मीद की कहानी है जो विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रही है।