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अब पृथ्वी खुद बढ़ा रही ग्लोबल वार्मिंग, अदृश्य दुनिया का बढ़ता खतरा, कहीं पड़ न जाए भारी!

permafrost thawing alert: दुनिया भर के वैज्ञानिक वर्षों से कर रहे हैं अलर्ट, पहली बार 2006 में बढ़ता दिखा खतरा, जानें आखिर क्या है पृथ्वी पर अदृश्य दुनिया की बढ़ती हलचल...

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Apr 07, 2026
hidden climate bomb permafrost thawing(photo:patrika creative)

permafrost thawing alert: अब तक हम नेचर के बीच इंसानी दखल को पृथ्वी पर ग्लोबल वार्मिंग का बड़ा कारण मानते आए हैं। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि अब हमारी धरती खुद ही ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बढ़ाने लगी है। यही कारण है कि धरती के नीचे हजारों सालों से जमी बर्फ अब तेजी से पिघल रही है और एक नये खतरे को जन्म दे रही है।

दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि आर्कटिक क्षेत्र की जमी हुई परत पर्माफ्रॉस्ट तेजी से पिघल रही है। इसके पिघलने से खतरनाक गैसें बाहर आने लगी हैं। यही जहरीली गैसें पृथ्वी पर ग्लोबल वार्मिंग को कई गुना तक बढ़ा सकती हैं और इसकी जद में भारत भी आएगा… एक ऐसा संकट जिससे बचने अभी शुरू करना होगा काम, वरना यह टाला नहीं जा सकेगा।जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट की आहट सुनाती संजना कुमार की खास रिपोर्ट

क्या है पर्माफ्रॉस्ट और क्यों मानी जा रही खतरनाक

दरअसल पर्माफ्रॉस्ट वह मिट्टी है, जो पृथ्वी के नीचे हजारों साल से बर्फ की तरह जमी हुई है। इसमें बड़ी मात्रा में कार्बन, मृत पौधे और सूक्ष्म जीव दबे होते हैं। जब तापमान बढ़ता है, तो यह परत पिघलने लगती है और इसमें मौजूद कार्बन गैसों के रूप में बाहर आने लगता है। सबसे खतरनाक स्थिति है वह है कि, इन गैसों में मीथेन भी शामिल होती है। यह गैस कार्बनडाइ ऑक्साइड से कई गुना ज्यादा ताकतवर ग्रीनहाउस गैसों में गिनी जाती है।

What is Permafrost : Photo: (patrika creative)

ये है 'क्लाइमेट फीडबैक लूप' जानें कैसे बढ़ा रहा खतरा?

वैज्ञानिकों की भाषा में इसे 'क्लाइमेट फीडबैक लूप' कहा जाता है। इसका अर्थ होता है एक ऐसा चक्र जो खुद ही खुद को बढ़ाता है। एक विस्तृत अध्ययन से पता चला है कि औसतन, आर्कटिक, अंटार्कटिक और उच्च पर्वतीय क्षेत्रों के आसपास के पर्माफ्रॉस्ट का तापमान 2007 और 2016 के बीच 0.3 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया।

permafrost Structure (photo:patrika creative)

इसे ऐसे समझें

  • तापमान बढ़ा तो - बर्फ पिघलती है
  • बर्फ पिघली तो - गैसें निकलने लगती हैं
  • गैसें निकली तो- तापमान और ज्यादा बढ़ेगा
  • यह प्रक्रिया यदि तेज हो जाए तो, इसे रोक पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा।

नई रिसर्च ने क्यों बढ़ाई चिंता?

हालिया अध्ययनों में पाया गया कि यह गैसें पहले के अनुमान से 25-100 गुना तेजी से निकल सकती हैं। यानी जिसे अभी तक भविष्य का खतरा कहा जाता रहा, वह अब वर्तमान में ही असर दिखाने लगा है।

Permafrost thawing fuels a vicious cycle of global warming (patrika creative)

दुनिया भर पर क्या दिखेगा असर

वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि पर्माफ्रॉस्ट पिघलने की यह प्रक्रिया इसी तरह जारी रहती है, तो इसका असर देश-दुनिया पर दिखेगा। यहां समझें इसका इम्पैक्ट...

  • ग्लोबल तापमान में तेजी आएगी
  • समुद्र का जल स्तर तेजी से बढे़गा
  • मौसमी घटनाएं चरम पर होंगी और बढ़ेंगी

पर्माफ्रॉस्ट पिघलने का भारत पर कैसा असर

दरअसल यह संकट कहने भर को ही अकेल आर्कटिक के लिए है, क्योंकि पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना वहीं से शुरू हुआ है। लेकिन इसका असर पूरी दुनिया पर देखने को मिलेगा। इस असर से भारत भी अछूता नहीं रहेगा। यहां भी ग्लोबल वार्मिंग अपना भयानक असर दिखाएगी।

ग्लोबल वार्मिंग का भारत पर असर

समुद्री जल स्तर में वृद्धि

  • वर्ष 1880 के बाद से वैश्विक समुद्र स्तर में लगभग 8 इंच की वृद्धि हुई है तथा यह अनुमान है कि 2100 तक इसमें कम-से-कम एक फुट की वृद्धि होगी, जिससे तटीय क्षेत्र जलमग्न हो जाएंगे, समुदाय विस्थापित होंगे तथा पारिस्थितिकी तंत्र बाधित होगा।
  • महासागर महत्त्वपूर्ण मात्रा में CO2 अवशोषित करते हैं, जिससे अम्लता में वृद्धि होती है, इससे समुद्री जीवन प्रभावित होता है।
  • जैव विविधता का ह्वास: बढ़ते तापमान और बदलते मौसम के कारण पारिस्थितिकीय तंत्र बाधित हो रहा है, जिससे कई प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा बढ़ रहा है।

सूखा और उष्ण लहरें तेज होने की संभावना

सूखा और गर्म लहरें तीव्र होने की संभावना है, जबकि शीत लहरें कमजोर पड़ने की संभावना है। गर्मी और लम्बे समय तक सूखे के कारण जंगलों में आग लगने की घटनाओं का समय भी बढ़ गया।

संभावित असर भी कम नहीं

विषम मौसम के कारण खाद्य उत्पादन बाधित होता है, जिससे खाद्यान्नों का अभाव और कीमतों में वृद्धि होती है, जबकि बढ़ते तापमान के कारण वायु की गुणवत्ता प्रभावित होती है, गर्मी से होने वाले रोग बढ़ते हैं और रोगों का संचरण होता है।

कहना होगा कि जिस संकट को अब तक हम भविष्य की गर्त से माप रहे थे, वो आने वाले समय में आम जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित कर सकते हैं।

क्या सिर्फ गैसें ही है खतरा?

एमपी के पर्यावरणविद सुभाष सी पांडे इस सवाल का जवाब देते हुए कहते हैं, नहीं। उनका मानना है कि पर्फ्रॉस्ट के पिघलने से हजारों साल पुराने सूक्ष्म जीव एक्टिव हो सकते हैं। ये न सिर्फ गैसें पैदा कर सकते हैं, बल्कि पर्यावरण संतुलन को और ज्यादा बिगाड़ सकते हैं।

सबसे बड़ा चिंताजनक पहलू ऐसे विषाणुओं और जीवाणुओं का उभार भी है जो महामारी पैदा करने की क्षमता रखते हैं। रोग पैदा करने में सक्षम ये सूक्ष्मजीव सैकड़ों या हजारों वर्षों तक निष्क्रिय बने रह सकते हैं। वर्ष 1918 के स्पेनिश फ्लू पेंडेमिक का कारण बनने वाले H1N1 इन्फ्लूएंजा वायरस के साथ ही चेचक (Smallpox) उत्पन्न करने वाले विषाणुओं की आनुवंशिक सामग्री पर्माफ्रॉस्ट में पाई गई है। चेचक, जिसका उन्मूलन कर दिया गया था वैसे वायरस का फिर से उभरना चिंताजनक होगा, जबकि इसके लिए अब नियमित टीकाकरण की गति धीमी पड़ गई है।

दुनिया भर के पर्यावरण और जलवायु संबंधी खतरों पर लगातार काम करने वाले मीडिया में प्रकाशित रिपोर्ट्स के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के कारण पर्माफ्रॉस्ट तेजी से पिघल रहा है, जो हिमालय और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से जमीन की स्थिरता कमजोर होती है, जिससे भूस्खलन, दरारें और भूमि धंसने की घटनाएं बढ़ सकती हैं। हाल के अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि अपेक्षित समय से पहले झीलों का सूखना और मिट्टी का ढीलापन इसी प्रक्रिया से जुड़ा है। इसके साथ ही, पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से उसमें फंसी जैविक सामग्री सड़ने लगती है, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं। ये गैसें वैश्विक तापमान को और बढ़ाती हैं, जिससे यह एक खतरनाक चक्र बन जाता है। हिमालय जैसे क्षेत्रों में, जहां पहले ध्यान केवल ग्लेशियरों पर था, अब पर्माफ्रॉस्ट के प्रभावों को समझना जरूरी हो गया है। जोशीमठ जैसी घटनाएं संकेत देती हैं कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में बड़े पर्यावरणीय और मानवीय संकट सामने आ सकते हैं।

पर्माफ्रॉस्ट पिघलने से क्या-क्या खतरे!

हजारों सालों से पुराने बैक्टिरिया और वायरस फिर से एक्टिव हो सकते हैं, इन खतरों के लिए इंसानी शरीर इम्यूनिटी डेवलप नहीं कर सकेगा। इससे नई महामारी और पुराने रोगों की वापसी हो सकती है। बतौर उदाहरण ऐसे समझें- 2016 में जब जमीन की बर्फ पिघली, तो वहां 75 साल से मिट्टी में दबे एंथ्रेक्स संक्रमित रेनडियर (बारहसिंगा) का शव भी बाहर आ गया। उसके वायरस पहले पिघली बर्फ और उसके नीचे दबी जमी हुई मिट्टी में ही एक्टिव हो गए, फिर हवा और पानी के जरिए पूरे साइबेरिया में फैल गए।

Reindeer(patrika creative)

तब वहां 2000 से ज्यादा बारहसिंगा मारे गए थे। वहीं एक बच्चे समेत 13 की मौत हुई थी। इस घटना के बाद स्थानीय चरवाहों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित किया गया और पशुओं का टीकाकरण किया गया। लोग लगातार संक्रमित हो रहे थे। 90 से ज्यादा लोगों को क्वारंटाइन किया गया। यह भयावह घटना भारत समेत दुनिया भर को कोविड-19, कोरोना काल के लॉक डाउन की भयावह याद दिलाती है। वहीं हमें अलर्ट भी करती है कि ग्लोबल वार्मिंग कैसे पुरानी महामारियों को वापस ला सकती है।

तिब्बत के पठार से प्राप्त वायरस के नमूने

ये स्थितियां केवल आर्कटिक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है। हजारों वर्ष से बने रहे हिमनदों की बर्फ पिघल रही है।
हाल ही में तिब्बत के पठार के हिमनदों में 15,000 वर्ष पुराने वायरस पाए गए हैं।

Methane emissions from thawing permafrost (AI graphic Source: based on Yumashev et al (2019)

मीथेन क्या है, क्यों है जानलेवा?

मीथेन एक प्राकृतिक गैस है, जिसमें एक कार्बन परमाणु चार हाइड्रोजन परमाणुओं से जुड़ा होता है। हालांकि वायुमंडल में मीथेन की मात्रा केवल 0.00018 प्रतिशत ही है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में वैश्विक तापमान वृद्धि के लगभग एक-छठे (1/6) हिस्से के लिए इसे ही जिम्मेदार माना गया है। आर्कटिक से मीथेन उत्सर्जन का अनुमान 2006 में 0.5 मिलियन टन से बढ़कर 3.8 मिलियन टन प्रति वर्ष हो गया था और 2013 में बढ़कर 17 मिलियन टन तक पहुंच गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारे पास अभी तक सटीक माप उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन हम जानते हैं कि यह घटना तेजी से बढ़ रही है। नॉब्लॉच एट अल. (2018) द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि उत्तरी ध्रुव की पर्माफ्रॉस्ट मिट्टी वर्ष 2100 तक एक गीगाटन या 1000 मिलियन टन मीथेन उत्पन्न करेगी।

  • ग्लोबल वार्मिंग का यह खतरा धीरे-धीरे लेकिन खतरनाक हो सकता है
  • सूक्ष्म बैक्टिरिया या वायरस हवा और पानी के स्रोतों में घुल सकते हैं
  • जमीन की गुणवत्ता को पूरी तरह खराब कर सकते हैं
  • खेती और पीने के पानी पर इसका असर नजर आ सकता है
  • यदि ग्लोबल असर बढ़ा, तो भारत में पहले से मौजूद जल संकट और भी गंभीर स्थिति में पहुंच सकता है
  • दरअसल सूक्ष्म जीव ऑर्गेनिक मैटर को तोड़ते हैं। इससे मीथेन गैस और कार्बन गैसें उत्सर्जित होती हैं। यानी ये सूक्ष्म जीव खुद ही गैस की फैक्ट्री बन जाते हैं और ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाकर और तेज कर देते हैं।
  • कुछ जीव ऐसे हो सकते हैं, जिन्हें विज्ञान भी नहीं जानता। इसके असर से इंसानी बीमारियां, जानवरों में संक्रमण और इको सिस्टम भी गड़बड़ाता नजर आ सकता है। हो सकता है कि यह खतरा लॉन्ग टर्म हो जाए।-यह फूड चेन पर असर दिखा सकता है और वाइल्डलाइफ पर भी।

क्या इस प्रक्रिया को रोका जा सकता है?

सुभाष बताते हैं कि अगर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को तुरंत और बड़े स्तर पर कम नहीं किया गया, तो यह प्रक्रिया तेजी पकड़ सकती है। एक बार इस चक्र ने यदि गति पकड़ ली, तो इसे नियंत्रित किया जाना लगभग असंभव हो जाएगा।

बता दें कि ग्लोबल वार्मिंग को अब तक इंसानी गतिविधियों का नतीजा माना जाता रहा है, लेकिन पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना एक बड़े खतरे की आहट लेकर आ रहा है। क्योंकि अब धरती खुद भी संकट की ओर बढ़ रही है। सवाल सिर्फ यह है कि क्या हम इस सच्चाई को समय रहते समझ पाएंगे या फिर यह प्राकृतिक टाइम बम आने वाले सालों में पूरी दुनिया के लिए खतरा बन जाएगा।

उपरोक्त तथ्यों को ध्यान रखा जाए तो पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से सिर्फ बर्फ ही नहीं टूट रही, बल्कि हजारों साल से बंद एक अदृश्य दुनिया बाहर आ रही है। इसमें जहरीली गैसों के साथ कई अनजान खतरे छिपे हैं। जिसके लिए वैज्ञानिक बार-बार चेता भी रहे हैं।

Published on:
07 Apr 2026 05:16 pm
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