permafrost thawing alert: दुनिया भर के वैज्ञानिक वर्षों से कर रहे हैं अलर्ट, पहली बार 2006 में बढ़ता दिखा खतरा, जानें आखिर क्या है पृथ्वी पर अदृश्य दुनिया की बढ़ती हलचल...
permafrost thawing alert: अब तक हम नेचर के बीच इंसानी दखल को पृथ्वी पर ग्लोबल वार्मिंग का बड़ा कारण मानते आए हैं। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि अब हमारी धरती खुद ही ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बढ़ाने लगी है। यही कारण है कि धरती के नीचे हजारों सालों से जमी बर्फ अब तेजी से पिघल रही है और एक नये खतरे को जन्म दे रही है।
दरअसल पर्माफ्रॉस्ट वह मिट्टी है, जो पृथ्वी के नीचे हजारों साल से बर्फ की तरह जमी हुई है। इसमें बड़ी मात्रा में कार्बन, मृत पौधे और सूक्ष्म जीव दबे होते हैं। जब तापमान बढ़ता है, तो यह परत पिघलने लगती है और इसमें मौजूद कार्बन गैसों के रूप में बाहर आने लगता है। सबसे खतरनाक स्थिति है वह है कि, इन गैसों में मीथेन भी शामिल होती है। यह गैस कार्बनडाइ ऑक्साइड से कई गुना ज्यादा ताकतवर ग्रीनहाउस गैसों में गिनी जाती है।
वैज्ञानिकों की भाषा में इसे 'क्लाइमेट फीडबैक लूप' कहा जाता है। इसका अर्थ होता है एक ऐसा चक्र जो खुद ही खुद को बढ़ाता है। एक विस्तृत अध्ययन से पता चला है कि औसतन, आर्कटिक, अंटार्कटिक और उच्च पर्वतीय क्षेत्रों के आसपास के पर्माफ्रॉस्ट का तापमान 2007 और 2016 के बीच 0.3 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया।
हालिया अध्ययनों में पाया गया कि यह गैसें पहले के अनुमान से 25-100 गुना तेजी से निकल सकती हैं। यानी जिसे अभी तक भविष्य का खतरा कहा जाता रहा, वह अब वर्तमान में ही असर दिखाने लगा है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि पर्माफ्रॉस्ट पिघलने की यह प्रक्रिया इसी तरह जारी रहती है, तो इसका असर देश-दुनिया पर दिखेगा। यहां समझें इसका इम्पैक्ट...
दरअसल यह संकट कहने भर को ही अकेल आर्कटिक के लिए है, क्योंकि पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना वहीं से शुरू हुआ है। लेकिन इसका असर पूरी दुनिया पर देखने को मिलेगा। इस असर से भारत भी अछूता नहीं रहेगा। यहां भी ग्लोबल वार्मिंग अपना भयानक असर दिखाएगी।
सूखा और गर्म लहरें तीव्र होने की संभावना है, जबकि शीत लहरें कमजोर पड़ने की संभावना है। गर्मी और लम्बे समय तक सूखे के कारण जंगलों में आग लगने की घटनाओं का समय भी बढ़ गया।
विषम मौसम के कारण खाद्य उत्पादन बाधित होता है, जिससे खाद्यान्नों का अभाव और कीमतों में वृद्धि होती है, जबकि बढ़ते तापमान के कारण वायु की गुणवत्ता प्रभावित होती है, गर्मी से होने वाले रोग बढ़ते हैं और रोगों का संचरण होता है।
कहना होगा कि जिस संकट को अब तक हम भविष्य की गर्त से माप रहे थे, वो आने वाले समय में आम जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित कर सकते हैं।
एमपी के पर्यावरणविद सुभाष सी पांडे इस सवाल का जवाब देते हुए कहते हैं, नहीं। उनका मानना है कि पर्फ्रॉस्ट के पिघलने से हजारों साल पुराने सूक्ष्म जीव एक्टिव हो सकते हैं। ये न सिर्फ गैसें पैदा कर सकते हैं, बल्कि पर्यावरण संतुलन को और ज्यादा बिगाड़ सकते हैं।हजारों सालों से पुराने बैक्टिरिया और वायरस फिर से एक्टिव हो सकते हैं, इन खतरों के लिए इंसानी शरीर इम्यूनिटी डेवलप नहीं कर सकेगा। इससे नई महामारी और पुराने रोगों की वापसी हो सकती है। बतौर उदाहरण ऐसे समझें- 2016 में जब जमीन की बर्फ पिघली, तो वहां 75 साल से मिट्टी में दबे एंथ्रेक्स संक्रमित रेनडियर (बारहसिंगा) का शव भी बाहर आ गया। उसके वायरस पहले पिघली बर्फ और उसके नीचे दबी जमी हुई मिट्टी में ही एक्टिव हो गए, फिर हवा और पानी के जरिए पूरे साइबेरिया में फैल गए।
तब वहां 2000 से ज्यादा बारहसिंगा मारे गए थे। वहीं एक बच्चे समेत 13 की मौत हुई थी। इस घटना के बाद स्थानीय चरवाहों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित किया गया और पशुओं का टीकाकरण किया गया। लोग लगातार संक्रमित हो रहे थे। 90 से ज्यादा लोगों को क्वारंटाइन किया गया। यह भयावह घटना भारत समेत दुनिया भर को कोविड-19, कोरोना काल के लॉक डाउन की भयावह याद दिलाती है। वहीं हमें अलर्ट भी करती है कि ग्लोबल वार्मिंग कैसे पुरानी महामारियों को वापस ला सकती है।
ये स्थितियां केवल आर्कटिक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है। हजारों वर्ष से बने रहे हिमनदों की बर्फ पिघल रही है।
हाल ही में तिब्बत के पठार के हिमनदों में 15,000 वर्ष पुराने वायरस पाए गए हैं।
मीथेन एक प्राकृतिक गैस है, जिसमें एक कार्बन परमाणु चार हाइड्रोजन परमाणुओं से जुड़ा होता है। हालांकि वायुमंडल में मीथेन की मात्रा केवल 0.00018 प्रतिशत ही है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में वैश्विक तापमान वृद्धि के लगभग एक-छठे (1/6) हिस्से के लिए इसे ही जिम्मेदार माना गया है। आर्कटिक से मीथेन उत्सर्जन का अनुमान 2006 में 0.5 मिलियन टन से बढ़कर 3.8 मिलियन टन प्रति वर्ष हो गया था और 2013 में बढ़कर 17 मिलियन टन तक पहुंच गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारे पास अभी तक सटीक माप उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन हम जानते हैं कि यह घटना तेजी से बढ़ रही है। नॉब्लॉच एट अल. (2018) द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि उत्तरी ध्रुव की पर्माफ्रॉस्ट मिट्टी वर्ष 2100 तक एक गीगाटन या 1000 मिलियन टन मीथेन उत्पन्न करेगी।
सुभाष बताते हैं कि अगर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को तुरंत और बड़े स्तर पर कम नहीं किया गया, तो यह प्रक्रिया तेजी पकड़ सकती है। एक बार इस चक्र ने यदि गति पकड़ ली, तो इसे नियंत्रित किया जाना लगभग असंभव हो जाएगा।
बता दें कि ग्लोबल वार्मिंग को अब तक इंसानी गतिविधियों का नतीजा माना जाता रहा है, लेकिन पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना एक बड़े खतरे की आहट लेकर आ रहा है। क्योंकि अब धरती खुद भी संकट की ओर बढ़ रही है। सवाल सिर्फ यह है कि क्या हम इस सच्चाई को समय रहते समझ पाएंगे या फिर यह प्राकृतिक टाइम बम आने वाले सालों में पूरी दुनिया के लिए खतरा बन जाएगा।