
Prediction of Sant Mavji Maharaj :‘वायरे बात होवेगा… डोरिये दीवा बरेंगा…’। यानि हवा के जरिये बात होगी और तारों के माध्यम से दीये जलेंगे। करीब 281 साल पहले जब यह बात लिखी गई, तब दूर-दूर तक बल्ब और टेलीफोन या मोबाइल के आविष्कार के मुमकिनी हालात नहीं दिख रहे थे, मगर ये बातें सच हुईं और आज हम वैज्ञानिक प्रमाण भी देख रहे हैं।
विद्युत बल्ब का आविष्कार थॉमस अल्वा एडिसन (Thomas Alva Edison) ने 1879 में किया था और टेलीफोन को अलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने 1876 में ईजाद कर पेटेंट करवाया था। इन आविष्कारों से करीब पौने 200 साल पहले ही मावजी ने भविष्यवाणी की थी।
दक्षिण राजस्थान के बेणेश्वर धाम के संग्रहालय व साबला में सुरक्षित-संरक्षित वागड़ के प्रसिद्ध संत मावजी महाराज की हस्तलिखित पांडुलिपियां ऐसे ही सैकड़ों भविष्यवाणियों का ऐसा खजाना है, जो मौजूदा समय में हैरतअंगेज करने वाला तो है ही, इसके साथ ही यह हजारों-लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का भी केन्द्र बन गया है। सैकड़ों साल पहले बेणेश्वर के टापू पर बैठकर संत मावजी ने हजारों पन्नों के चौपड़े लिखे। उन्हें कृष्णावतार माना जाता है। संत मावजी और उनकी लिखे ग्रंथों की पांडुलिपियां आज विश्वविद्यालयीय शोधार्थियों के लिए भी गहन अध्ययन और अनुसंधान का विषय हैं।
इन ग्रंथों की सबसे बड़ी ताकत उनकी भाषा में छिपी है। वागड़ी के सरल शब्दों में कही गई बातें अपने समय से कहीं आगे की कल्पना जैसी प्रतीत होती है। यही कारण है कि संरक्षित चोपड़े केवल धार्मिक आस्था की वस्तु नहीं, बल्कि वागड़ की साहित्यिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के महत्वपूर्ण दस्तावेज भी माने जाते हैं।
मावजी की परम्परा में लिखे गए चौपड़ों का नाम सम सागर, मेघ सागर, रतन सागर, प्रेम सागर और अनंत सागर है। इनमें दर्ज वाणी में प्रकृति, खेती, समाज, जीवन और समय के बदलाव के अनेक संकेत हैं। इनमें इतनी गहराई से हालातों की कल्पना की गई है कि लगता है समुद्र जैसी गहरी सोच छिपी हो।
मावजी महाराज ने लगभग 300 वर्ष पूर्व विभिन्न गीत व दोहों के माध्यम से भविष्यवाणियां की थी, जिसे आगमवाणी कहा जाता है। मावजी महाराज के अनुयायी, खासकर ‘साद समाज’ के लोग आज भी उनकी आगमवाणी को भजनों के रूप में गाते हैं। शेषपुर के हरिमंदिर में सुरक्षित रखे वस्त्र-पट-चित्र (कपड़े पर रंगों से बने चित्र) पर बने हुए उपग्रह एवं हवाई जहाज की चित्रात्मक कलाकृतियां तथा उनके नीचे लिखी इबारत ‘विज्ञान शास्त्र वधी ने आकाश लागेंगा उपग्रह वास करें’ कौतूहल का विषय है। गोपियों से संवाद के दौरान लिखे दोहों में 108 प्रश्नोतरी के माध्यम से विभिन्न भविष्यवाणियों के संकेत भी दिए गए हैं।
बांसवाड़ा, डूंगरपुुर व सलूम्बर जिलों की अलग-अलग जगहों पर संरक्षित हैं चौपड़े, जिनमें एक अंग्रेज ले गए।
राज्य सरकार की ओर से धाम पर ही मावजी महाराज पैनोरमा बना है। चौपड़ों का कुछ हद तक डिजिटलाइजेशन भी हुआ है। भक्तों के मुताबिक डूंगरपुर जिले के साबला, पूंजपुर, शेषपुर तथा सलूम्बर के झल्लारा व बांसवाड़ा शहर के एक मंदिन में अलग-अलग स्थानों पर ये चौपड़े तथा कुछ पांडुलिपियां सुरक्षित हैं। पांचवां अनन्त सागर चौपड़ा ब्रिटिशकाल के समय अंग्रेज अपने साथ ले गए। बताया जा रहा कि इस चौपड़े में विज्ञान की अद्भुत भविष्यवाणियां हैं।
ये चौपड़े अतीत और वर्तमान के बीच एक अनोखा संवाद रचते है। वागड़ के लोकविश्वास में कृष्णावतार माने जाने वाले संत मावजी महाराज ने ऐसी सैकड़ों भविष्यवाणियां की हैं। मोबाइल, बिजली, ग्लेशियर या जलवायु परिवर्तन जैसे आधुनिक अर्थों को पांडुलिपियों की भविष्यवाणियों के आधार पर लोकव्याख्याओं का बल मिला। इनका महत्व इस बात में भी है कि सदियों पुराने शब्द आज की पीढ़ी को अपने अतीत से जोड़ते हैं और समय को देखने का एक अलग नजरिया देते हैं। वागड़ के जनमानस में ये आज भी पढ़े, सुने और समझे जाते हैं और हर बदलते दौर के साथ उनकी व्याख्या में एक नया अध्याय भी जुड़ता जाता है।
बेणेश्वर से पांच किमी दूर साबला में संवत् 1771, माघ सुदी पंचमी यानि 28 जनवरी, 1715 ई. को भगवान श्रीकृष्ण के अंशवतारी के रूप में मावजी महाराज का जन्म होने की मान्यता है। दालम ऋषि व केसर बां के कोख से उनका अवतरण माना जाता है। मावजी बाल्यकाल से ही आध्यात्मिक थे। वह सोम-माही के संगम स्थल बेणके (बेणेश्वर) में जाकर चिन्तन और साधना करते थे। संत मावजी ने अपनी तपोभूमि बेणेश्वरधाम पर रास लीलाएं की। वह श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त, भविष्य वक्ता, ज्योतिषाचार्य व साहित्यकार व खगोलविद् थे। 31 वर्ष के अल्प जीवनकाल में ही उन्होंने पांच चौपड़े लिख दिए थे।