
भारत देश इस बार 80वां स्वतंत्रता दिवस हर साल की तरह ही काफी धूमधाम और उत्साह के साथ मनाएगा। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश के लिए बलिदान देने वाले वीर सपूतों का जिक्र अवश्य होता है। इस आजादी के अवसर पर जब भी 1857 की क्रांति का जिक्र होता है, तो मंगल पांडे, रानी लक्ष्मीबाई और बहादुर शाह जफर जैसे क्रांतिकारियों का नाम सबसे पहले याद आते हैं। उत्तर प्रदेश में मेरठ की धरती पर एक स्थानीय राजा राव कदम सिंह ने भी अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला था।
राव कदम सिंह का नाम इतिहास के पन्नों में उतना प्रचलित नहीं हुआ, जितना कि उनका शौर्य था। मेरठ के गांव पूठी निवासी राव कदम सिंह परीक्षितगढ़ रियासत के राजा थे। उन्होंने 1857 की क्रांति में अहम भूमिका निभाई। राजा राव कदम सिंह ने क्रांतिकारियों के साथ मिलकर मेरठ के पूर्वी हिस्से में अंग्रेजी हुकूमत की जमीन हिला दी।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में राव कदम सिंह मेरठ के पूर्वी क्षेत्र में क्रांतिकारियों के नेता थे। उनके साथ 10 हजार क्रांतिकारी जुड़े थे, जो मुख्य रूप से मवाना, हस्तिनापुर और बहसूमा क्षेत्र से आते थे। मेरठ में सैनिक विद्रोह की चिंगारी 10 मई 1857 को भड़की, जब धन सिंह गुर्जर के नेतृत्व में क्रांति की शुरुआत हुई। 10 मई 1857 को सैनिक विद्रोह की खबर फैलते ही मेरठ के पूर्वी क्षेत्र में क्रांतिकारियों ने राव कदम सिंह के निर्देश पर सभी सड़कें बंद कर दीं और अंग्रेजों के यातायात और संचार को पूरी तरह ठप कर दिया। यह घटना दिखाती है कि कदम सिंह ने विद्रोह की शुरुआत से ही रणनीतिक भूमिका निभानी शुरू कर दी थी।
मेरठ में राजा राव कदम सिंह के नेतृत्व में शुरू हुए स्वतंत्रता संग्राम के विद्रोह को खुद अंग्रेजी अधिकारियों के पत्राचार में दर्ज हुआ। मेरठ के तत्कालीन कलेक्टर आर.एच. डनलप द्वारा मेजर जनरल हैविट को 28 जून 1857 को लिखे पत्र से पता चलता है कि क्रांतिकारियों ने पूरे जिले में खुलकर विद्रोह कर दिया। यह केवल स्थानीय अफवाह या लोककथा नहीं, बल्कि औपनिवेशिक प्रशासनिक रिकॉर्ड में दर्ज एक ऐतिहासिक घटना है। मेरठ गजेटियर के हवाले से एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कदम सिंह ने स्वयं को परीक्षितगढ़ और मवाना का राजा घोषित किया। इसके बाद 1803 से छिपाकर रखी गई तोपों को निकलवाया और अपने साथियों को हथियारबंद होने का आह्वान किया।
राव कदम सिंह की सेना की सबसे खास पहचान उनकी सफेद पगड़ी थी, जो कफन का प्रतीक मानी जाती थी। ये क्रांतिकारी कफन के प्रतीक के तौर पर सिर पर सफेद पगड़ी बांधकर चलते थे। इसका मतलब है कि वे मरने-मारने के इरादे से मैदान में उतरे थे, हार मानने या पीछे हटने का कोई विकल्प उनके पास नहीं था। यह प्रतीकवाद बताता है कि यह विद्रोह किसी अस्थायी आक्रोश का नतीजा नहीं, बल्कि सुनियोजित और संकल्पबद्ध संघर्ष था।
राव कदम सिंह के नेतृत्व में क्रांतिकारी सिर्फ ऐलान तक सीमित नहीं रहे, बल्कि सीधी कार्रवाई भी की। राव कदम सिंह और उनके भाई दलेल सिंह के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने परीक्षितगढ़ की पुलिस चौकी पर हमला बोल दिया। क्रांतिकारियों ने पुलिसकर्मियों को खदेड़ते हुए मेरठ तक उनका पीछा किया। इसके बाद संभावित युद्ध की आशंका को देखते हुए किले की तैयारी भी की गई।
अंग्रेजों से संभावित युद्ध की तैयारी में परीक्षितगढ़ के किले की बुर्ज पर 3 तोपें चढ़ा दी गईं, जिन्हें राव कदम सिंह के पूर्वज राजा नत्था सिंह ने पहले छिपाकर रखा था। इसके बाद 30-31 मई को हिंडन नदी के तट पर क्रांतिकारी सेना और अंग्रेजी फौज के बीच सीधा संघर्ष हुआ।
राव कदम सिंह का यह विद्रोह अकेले मेरठ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पड़ोसी जिलों तक फैल गया। राव कदम सिंह के भाई दलेल सिंह, पिर्थी सिंह और देवी सिंह के नेतृत्व में बिजनौर के विद्रोहियों के साथ साझा मोर्चा बनाया गया। इसके साथ ही मंडावर, दारानगर और धनौरा क्षेत्र में हमले करके वहां भी अंग्रेजी शासन को हिला दिया गया।
इसी दौर में मेरठ-दिल्ली मार्ग पर पड़ने वाले गांवों में भी बड़े स्तर पर विद्रोह भड़का। नजदीकी क्षेत्र दादरी और बुलंदशहर जिलों में गुर्जर क्रांतिकारियों का नेतृत्व राव उमराव सिंह भाटी और वलिदाद खां कर रहे थे। मेरठ-दिल्ली के बीच पड़ने वाले गांवों ने भी बड़े स्तर पर क्रांति में हिस्सा लिया।
विद्रोह के दमन के बाद अंग्रेजों ने कूटनीतिक चाल चली। डलहौजी ने परीक्षितगढ़ किले का एक हिस्सा लांडौरा रियासत के अधीन कर दिया। जिससे लांडौरा के राजा हरवंश सिंह और कुंवर रणवीर सिंह जैसे स्थानीय शासकों को अपने पक्ष में कर लिया गया। बाकी हिस्से पर अंग्रेजों ने सीधा कब्जा जमा लिया। यह बंटवारा इस बात का प्रमाण है कि अंग्रेज इस विद्रोह को कुचलने के लिए न केवल सैन्य बल, बल्कि स्थानीय सत्ता-संतुलन बिगाड़ने की रणनीति भी अपनाते थे।
राजा राव कदम सिंह की यह कहानी दिखाती है कि 1857 की क्रांति केवल बड़े शहरों या जाने-माने नामों तक सीमित नहीं थी। मेरठ के छोटे-छोटे गांवों से उठे किसानों और सैनिकों की यह फौज, अपने राजा के नेतृत्व में, अंग्रेजी सत्ता को महीनों तक चुनौती देती रही। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर ऐसे गुमनाम नायकों की गाथाएं याद दिलाती हैं कि भारत की आजादी की लड़ाई सिर्फ चंद प्रसिद्ध चेहरों की नहीं, बल्कि हजारों अनाम बलिदानियों की सामूहिक विरासत है।