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Jobs : राजस्थान के कॉलेजों में न लाइब्रेरियन, न पीटीआई… ले​किन विश्वविद्यालय वसूल रहे सालाना पेनल्टी

Jobs : राजस्थान में 600 से अधिक सरकारी कॉलेजों में वर्षों से बड़ी संख्या में पद खाली हैं। आलम यह है कि कॉलेज की लाइब्रेरी में किताबें तो हैं, लेकिन लाइब्रेरियन के पद खाली हैं। इसी तरह कॉलेजों में खेल के मैदान तो हैं और विद्यार्थी खेलने की इच्छा भी रखते हैं, लेकिन खेल के शिक्षक ही नदारद हैं। प्रदेश के सरकारी कॉलेजों के बारे में दिनेश कुमार स्वामी की विशेष रिपोर्ट पढ़िए।
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Aug 27, 2026
Jobs in Rajasthan
राजस्थान के कॉलेजों में न लाइब्रेरियन हैं और न ही पीटीआई (Photo: Rajasthan Patrika)

Jobs in College : प्रदेश के कॉलेजों में किताबों से भरी लाइब्रेरी है, लेकिन उसे संभालने वाला लाइब्रेरियन नहीं। मैदान है, खेल गतिविधियों के लिए विद्यार्थी हैं, लेकिन पीटीआई नहीं। यह ​स्थिति प्रदेश के सभी सरकारी कॉलेजों की हो चुकी है। यानी उच्च शिक्षा का पूरा ढांचा खड़ा है, मगर उसके दो जरूरी हिस्से गायब हैं। हैरानी यह कि इन पदों पर स्थायी भर्ती कॉलेज प्रशासन के हाथ में नहीं है। परन्तु इनकी कमी का खामियाजा कॉलेजों को विश्वविद्यालय की पेनल्टी चुकाने के रूप में भुगतना पड़ रहा है।

प्रदेश में 600 से ज्यादा सरकारी कॉलेज

राजस्थान में अब सरकारी कॉलेजों का आंकड़ा 600 के पार पहुंच चुका है। राज्य की 2025-26 आर्थिक समीक्षा में 596 सरकारी सामान्य कॉलेज दर्ज हैं। वहीं कॉलेज शिक्षा विभाग की मौजूदा वेबसाइट पर 616 सामान्य सरकारी कॉलेज सूचीबद्ध हैं। कृषि और विधि के सरकारी कॉलेज इससे अलग हैं।

सरकारी कॉलेजों के प्रदेश में इतना बड़ा नेटवर्क खड़ा होने के बावजूद लाइब्रेरियन और पीटीआई जैसे अहम पद खाली पड़े हैं। जब विश्वविद्यालय उच्च ​शिक्षा संस्थान के लिए लाइब्रेरियन और पीटीआई को सबसे अहम मानते है तो फिर सरकार इन्हें हल्के में कैसे ले रही है। कॉलेज तो सालाना 59 हजार रुपए का जुर्माना भी विश्वविद्यालय को चुका रहे हैं।

स्वीकृत पदों में ही 95 फीसदी से ज्यादा खाली

उच्च शिक्षा विभाग ने गत मार्च में विधानसभा में दिए जवाब में बताया था कि राजकीय महाविद्यालयों में 555 पुस्तकालयाध्यक्ष और 555 पीटीआइ के पद स्वीकृत हैं। इनमें 535 पुस्तकालयाध्यक्ष और 540 पीटीआइ के पद रिक्त है। यानी 97 प्रतिशत पद खाली थे। इसके बाद कुछ और कार्मिक सेवानिवृत्त हो गए। अब पूरे प्रदेश में तीन-चार लाइब्रेरियन और पुस्तकालयाध्यक्ष ही सरकारी कॉलेजों में बचे है। प्रदेश में नए सरकारी कॉलेज खुलने से कुल पदों का आंकड़ा भी 600-600 के पार हो चुका है।

भर्ती के नियम बने, लेकिन नियुक्ति की मंजिल अब भी दूर

पूरी व्यवस्था यहां दोनों पदों पर भर्ती पर आकर थम जाती है। वर्ष 2022-23 के बजट में सरकार ने लाइब्रेरियन और पीटीआइ के 247-247 नए पदों की घोषणा की थी। वित्त विभाग से पद स्वीकृत होने के बाद सेवा नियम बनाने की प्रक्रिया चली। राजस्थान लोक सेवा आयोग की वार्षिक रिपोर्ट में ‘राजस्थान लाइब्रेरियन एंड फिजिकल ट्रेनिंग इंस्ट्रक्टर सर्विस (कॉलेजिएट ब्रांच) रूल्स 2022’ को नए सेवा नियमों के रूप में दर्ज किया गया है। बाद में राजस्थान लाइब्रेरियन एंड फिजिकल ट्रेनिंग इंस्ट्रक्टर सर्विस (कॉलेजिएट ब्रांच) रूल्स, 2023 भी अस्तित्व में आ गए।अब नियम बनने के बाद भी भर्ती प्रक्रिया को अंतिम नियुक्ति तक पहुंचाने में कितना समय लगेगा, यह कोई नहीं बता रहा। आरपीएससी की ओर से लाइब्रेरियन और पीटीआइ को 2023 के सेवा नियमों के तहत अलग भर्ती श्रेणी के रूप में दर्ज किया गया है।

कॉलेज खोले, लाइब्रेरी और खेल भूल गए

सरकार लगातार नए सरकारी कॉलेज खोल रही है। प्रदेश की आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट के मुताबिक 2025-26 में 28 नए सरकारी कॉलेज, पांच नए सरकारी कृषि कॉलेज और एक नया सरकारी विधि कॉलेज खोला गया। जब नए कॉलेज खोले जाते हैं तो भवन, पाठ्यक्रम और प्रवेश व्यवस्था के साथ लाइब्रेरियन और पीटीआइ जैसे जरूरी पदों की नियमित व्यवस्था नहीं करना भी सरकारी सोच पर सवाल खड़े करता है। नतीजा यह है कि कई कॉलेजों में लाइब्रेरी तो है, लेकिन उसके संचालन की जिम्मेदारी दूसरे कर्मचारियों या प्रभार व्यवस्था से चल रही है। खेल गतिविधियां भी उपलब्ध संसाधनों और अन्य स्टाफ के भरोसे हैं।

विश्वविद्यालय का तर्क, 'यूजीसी के मानक पूरे करो'

पत्रिका ने प्रदेश के विश्वविद्यालयों के प्रशासन से इस मुद्दे पर बातचीत की। उनका पक्ष भी अपनी जगह है। संबद्धता और शैक्षणिक गुणवत्ता के मानकों में लाइब्रेरी तथा शारीरिक शिक्षा को महत्वपूर्ण माना जाता है। विश्वविद्यालयों के अपने नियमों में भी कॉलेज में लाइब्रेरियन और शारीरिक प्र​शिक्षक जैसे पद जरूरी किए गए है। यूनिवर्सिटी लाइब्रेरियन और डायरेक्टर ऑफ फिजिकल एजुकेशन की नियुक्ति के प्रावधान भी है। नियुक्ति यूजीसी मानकों के अनुरूप चयन प्रक्रिया से करनी होती है। इसी तरह संबद्ध सरकारी कॉलेजों से भी विश्वविद्यालय निर्धारित मानकों की पूर्ति की अपेक्षा करता है। लेकिन पेंच यह है कि मानक पूरा करने की जिम्मेदारी कॉलेज पर है और स्थायी नियुक्ति का नियंत्रण राज्य सरकार की व्यवस्था में। यहीं से कॉलेज प्रशासन की परेशानी शुरू होती है।

नियुक्ति सरकार नहीं करे, पेनल्टी कॉलेज भरे

कॉलेज प्रशासन का तर्क है कि जब लाइब्रेरियन और पीटीआई के स्थायी पदों पर भर्ती का अधिकार उनके पास नहीं है तो रिक्तियों के लिए उन पर आर्थिक दंड लगाना कितना व्यावहारिक है? दूसरी ओर विश्वविद्यालय का कहना है कि संबद्धता और शैक्षणिक मानकों की पूर्ति जरूरी है। इसी खींचतान में कॉलेज हर साल आर्थिक भार झेल रहे हैं।

हर साल पड़ रहा जुर्माने का भार

नागौर के मिर्धा राजकीय महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. हरसुखराम छरंग ने पत्रिका से बताया कि लाइब्रेरियन/पीटीआइ की कमी के कारण विश्वविद्यालय की ओर से सालाना 50 हजार रुपए की पेनल्टी और 18 प्रतिशत जीएसटी यानी कुल 59 हजार रुपए का भार कॉलेज पर पड़ रहा है। हालांकि कॉलेज पेनल्टी अपने खर्च में से भरते है। बाद में राज्य सरकार से मिलने वाली रा​शि में समायोजित कर लेते है। पीटीआइ के करीब 300 पदों पर भर्ती की प्रक्रिया सरकार के स्तर पर चल रही है। इस भर्ती प्रक्रिया के पूरे होने पर कॉलेजों को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है।

1992 के बाद से ही भर्ती का लंबा इंतजार

सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि प्रदेश में सहायक पुस्तकालयाध्यक्षों की नियमित भर्ती को लेकर लंबे समय से अंतराल रहा है। यदि वर्षों तक भर्ती नहीं होगी और दूसरी तरफ नए कॉलेज खुलते रहेंगे तो रिक्तियों का बढ़ना स्वाभाविक है।

'यह उच्च ​शिक्षा की सबसे बड़ी कमी'

पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष हनुमान लोमरोड़ कहते हैं कि एक तरफ सरकार उच्च शिक्षा को गांव-ढाणी तक पहुंचाने के लिए नए कॉलेज खोल रही है, दूसरी तरफ उन्हीं कॉलेजों में पुस्तकों की व्यवस्था संभालने वाला विशेषज्ञ और विद्यार्थियों को खेल प्रशिक्षण देने वाला प्रशिक्षक नहीं है। यह प्रदेश में उच्च ​शिक्षा की सबसे बड़ी कमी है।

विद्यार्थियों पर सीधा असर

छात्र नेता महीपाल ग्वाला कहते है कि लाइब्रेरियन का काम सिर्फ किताबें जारी करना नहीं है। आधुनिक कॉलेज लाइब्रेरी में ई-रिसोर्स, जर्नल, डिजिटल कैटलॉग, शोध सामग्री और विद्यार्थियों के अध्ययन की पूरी व्यवस्था जुड़ी होती है। इसी तरह पीटीआइ केवल खेल का शिक्षक नहीं, बल्कि कॉलेज की खेल गतिविधियों, टीमों और शारीरिक प्रशिक्षण व्यवस्था का जिम्मेदार होता है। इनके नहीं होने का खामियाजा कॉलेज का हर विद्यार्थी ​शिक्षा ग्रहण करने तक ही नहीं आगे के पूरे कॅरियर में भुगतता है।

विवि ने बनाया वसूली का माध्यम

सरकारी कॉलेज के प्राचार्य रह चुके डॉ. शंकरलाल जाखड़ कहते है कि इन दोनों पदों का लंबे समय तक खाली रहना केवल स्टाफ की कमी नहीं, बल्कि कॉलेज की शैक्षणिक और सह-पाठ्यचर्या व्यवस्था में सीधा खालीपन है। सरकारी कॉलेजों में लाइब्रेरियन व पीटीआइ के पद भरना प्राचार्य के हाथ में नहीं है। इसके बावजूद एमडीएस विश्वविद्यालय सहित प्रदेश के अन्य विश्वविद्यालय हर साल पैनल्टी वसूल रहे है। एक प्रकार से विवि ने इसे वसूली का माध्यम बना रखा है।

Updated on:
27 Aug 2026 12:04 pm
Published on:
27 Aug 2026 12:04 pm