
Crime in Rajasthan :यह सच्ची घटना है। जिले में एक लूट के मामले में 25 हजार के इनामी हिस्ट्रीशीटर सुगनचंद (परिवर्तित नाम) की पुलिस को तलाश थी। उसके खिलाफ 15 संगीन आपराधिक मामले दर्ज थे। मुखबिर ने एक सुबह उसके खेत पर छिपे होने की सूचना दी तो पुलिस ने वहां दबिश दी। पुलिस को देखकर सुगनचंद अपने नाबालिग बेटे के साथ वहां से भागा। बेटे को पता नहीं था कि वह क्यों भाग रहा है। बस पिता के साथ तेज गति से दौड़ रहा था। दोनों भागते हुए सड़क पर आ गए। यहां सुगनचंद ने एक कार को रूकवाया और चालक को पिस्टल दिखाते हुए कार छीनकर फरार हो गया। कुछ घंटों बाद चालक की शिकायत पर पुलिस ने पिता और पुत्र के खिलाफ कार लूटकर ले जाने का प्रकरण दर्ज कर लिया।
अब पुलिस को सुगनचंद के साथ बेटे की भी तलाश थी। कुछ दिनों बाद बेटे को एक प्रतियोगी परीक्षा में बैठना था, लेकिन पुलिस के डर से वह परीक्षा देने नहीं गया। अब वह पिता के साथ अपराध की राह पर चल पड़ा।
यह केवल सुगनचंद का ही मामला नही है। झालावाड़ जिले में पिछले कुछ सालों में ऐसे 37 मामले सामने आए, जिसमें पिता के साथ उनके बेटे में अपराध में लिप्त पाए गए। कहीं बेटे ने पिता का साथ देते-देते अपराध की राह पकड़ी तो कहीं पिता के संपर्क और आपराधिक पहचान ने बेटे के लिए अपराध का रास्ता आसान कर दिया। हालत यह है कि इन 37 मामलों में कहीं पिता हिस्ट्रीशीटर है तो कहीं पर पुत्र। दोनों के खिलाफ कई संगीन मामले दर्ज है। चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें सभी बेटे युवक है। उनकी उम्र चालीस साल से कम है। यह उन परिवारों और बच्चों के लिए चेतावनी है, जहां अपराध को देखकर भी उसे रोकने के बजाय सामान्य मान लिया जाता है। घर का माहौल बच्चे की सोच और व्यवहार पर गहरा असर डालता है।
झालवाड़ पुलिस से उपलब्ध आकड़ों का विश्लेषण किया तो सामने आया कि नौ मामले ऐसे निकले, जिसमें बेटे ने अपने हिस्ट्रीशीटर पिता के साथ अपना पहला अपराध किया। इनमें कई प्रकरण ऐसे भी थे, जो बेटे ने पिता की आपराधिक छवि से प्रभावित होकर किया। बीस मामले ऐसे है, जिसमें बेटा अपने पिता के साथ वारदात में शामिल रहा। सत्रह मामले ऐसे है, जिसमें पिता तो हिस्ट्रीशीटर है, लेकिन बेटे ने उनके साथ अपराध नहीं किया, लेकिन उसने अपने पिता से प्रभावित होकर अपराध की दुनिया में कदम रख दिया। 23 अपराधी ऐसे है, जिनके पिता के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज है।
झालावाड़ शहर में बस स्टैण्ड के पास रहने वाला प्रिंस हरिजन (20) अपने पिता को देखकर अपराधी बना। उसके पिता उमेश के खिलाफ विभिन्न थानों में 17 मुकदमें दर्ज थे। कुछ समय पहले उमेश की मौत हो गई। कोतवाली में ही हिस्ट्रीशीटर फिरोज खान के बेटे फैजान खान उर्फ बिट्टू के खिलाफ चार प्रकरण दर्ज हो चुके है। दांगीपुरा थाना क्षेत्र के हिस्ट्रीशीटर रंगलाल के बेटे संजय उर्फ संजय के खिलाफ पांच आपराधिक प्रकरण दर्ज है।
मनोचिकित्सकों के अनुसार बच्चे का पहला स्कूल परिवार होता है। घर में बड़ों का व्यवहारए बातचीत और कानून के प्रति नजरिया उसके व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। यदि बच्चा लगातार मारपीट, धमकी, विवाद या अवैध गतिविधियों को अपने आसपास देखता है तो धीरे-धीरे उसके लिए यह सब असामान्य नहीं रह जाता। यही पर परिवार को सतर्क होने की जरूरत है। बच्चे को अपराध से दूर रखने की जिम्मेदारी केवल पुलिस की नहीं है। घर में कानून का सम्मान और सही व्यवहार का माहौल बनाना भी उतना ही जरूरी है। अपराधी अक्सर अचानक नहीं होता। उसकी शुरुआत घर के किसी विवाद में गलत तरीके से साथ देने, गलत संगत और कानून को हल्के में लेने से हो सकती है।
परिवार के बाद संगत का असर सबसे ज्यादा होता है। आपराधिक लोगों के संपर्क में आना और ऐसे दोस्तों का समूह बनाना, जहां अपराध को गलत नहीं माना जाता। युवा को धीरे-धीरे उसी सोच की ओर ले जा सकता है। समाज के लिए भी यह सोचने का समय है कि अपराध को केवल पुलिस की समस्या मानकर उससे किनारा न किया जाए। परिवार में बच्चों के सामने अपराध का महिमामंडन न हो। गलत गतिविधियों पर समय रहते रोक लगे और युवाओं को सकारात्मक दिशा मिले, इसके लिए सामाजिक स्तर पर भी जिम्मेदारी निभानी होगी। अपराधी को सजा देना कानून की जिम्मेदारी हैए लेकिन अगली पीढ़ी को अपराधी बनने से रोकना परिवार और समाज की भी जिम्मेदारी है।
जानेमाने अधिवक्ता विवेक नंदवाना के अनुसार, 'अपराधशास्त्र मानता है कि पारिवारिक वातावरण व्यक्ति के व्यवहार को गहराई से प्रभावित करता है। बच्चा उपदेश से अधिक आसपास के आचरण से सीखता है। घर में हिंसा, कानून तोड़ अवैध कमाई और पुलिस-मुकदमों को सामान्य मानने से अपराध के प्रति नैतिक झिझक कम हो सकती है। कमजोर अनुशासन, शिक्षा से दूरी, नशा और अपराधी संगति जोखिम बढ़ाते हैं। हालांकि अपराध विरासत नहीं, परिस्थितियों से सीखा व्यवहार हो सकता है। समाधान केवल दण्ड नहीं बल्कि सकारात्मक पारिवारिक वातावरणए शिक्षा और सही संगति है। सामाजिक संगठनों को जागरूकता और मार्गदर्शन के माध्यम से अपराध की अगली पीढ़ी रोकने में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।'
वहीं झालावाड़ के पुलिस अधीक्षक अमित कुमार ने पत्रिका से बातचीत में कहा, 'बच्चे अपने आसपास का माहौल बहुत जल्दी आत्मसात करते हैं। यदि परिवार या संगति में अपराध सामान्य दिखाई देता है तो उसके प्रभाव से बच्चे भी गलत राह पर जा सकते हैं। इसलिए अभिभावकों की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को कानून, अनुशासन और अच्छे संस्कारों का वातावरण दें। किसी बच्चे का भविष्य उसके परिवार की गलतियों से नहीं, बल्कि उसके अपने फैसलों और सही मार्गदर्शन से तय होना चाहिए। समय रहते बच्चों को सकारात्मक दिशा देना ही अपराध की अगली कड़ी को रोकने का सबसे प्रभावी उपाय है।'