
राजस्थान में नीट-यूजी 2026 के बाद चिकित्सा प्रवेश प्रक्रिया को लेकर एक ऐसा सवाल सामने आया है, जिसने हजारों अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। क्या राज्य की एनआरआई सीटों पर पात्रता और दस्तावेजों की जांच इतनी पारदर्शी है कि हर अभ्यर्थी के मामले में एक समान नियम लागू होने का भरोसा किया जा सके?
इस मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू 561 अंक बनाम 213 अंक का बताया जा रहा है। अभिभावकों के अनुसार 561 अंक प्राप्त करने वाला राजस्थान का अभ्यर्थी आरयूएचएस में एमबीबीएस की सीट पाने के लिए संघर्ष कर रहा है, जबकि 213 अंक प्राप्त करने वाला दूसरे राज्य का अभ्यर्थी राजस्थान की एनआरआई काउंसलिंग में शामिल होकर सीट के लिए पात्रता की प्रक्रिया तक पहुंच गया है।
हालांकि, एनआरआई सीट सामान्य मेरिट या राजस्थान के सामान्य राज्य कोटे की सीट नहीं होती। इसलिए केवल नीट अंक कम या अधिक होने के आधार पर दो अभ्यर्थियों की तुलना से प्रवेश नियमों की वैधता तय नहीं की जा सकती। असली सवाल यह है कि संबंधित अभ्यर्थी ने एनआरआई श्रेणी के लिए निर्धारित सभी शर्तें पूरी की हैं या नहीं और दस्तावेजों का सत्यापन किस आधार पर हुआ। यही वह बिंदु है जहां राजस्थान की चिकित्सा प्रवेश व्यवस्था से कई सीधे सवाल पूछे जा रहे हैं।
राजस्थान नीट यूजी 2026 की उपलब्ध एनआरआई मेरिट सूची के अनुसार दस्तावेज सत्यापन के बाद 204 अभ्यर्थियों को एनआरआई श्रेणी में शामिल किया गया है। सूची में 50 अभ्यर्थियों के लिए राजस्थान प्राथमिकता और 154 के लिए राजस्थान से बाहर की प्राथमिकता दर्ज है। सूची को राज्य की दूसरे चरण की काउंसलिंग के लिए उपयोग किया गया और इसमें अभ्यर्थियों के नीट अंक, अखिल भारतीय रैंक, मूल निवास तथा सत्यापन की स्थिति जैसी जानकारियां दर्ज हैं।
इससे यह तथ्य सामने आता है कि राजस्थान की एनआरआई काउंसलिंग में अन्य राज्यों के अभ्यर्थियों का शामिल होना अपने आप में प्रतिबंधित श्रेणी नहीं है। उपलब्ध एनआरआई सूची में देश के कई राज्यों के मूल निवास वाले अभ्यर्थी शामिल हैं। इसलिए केवल ‘दूसरे राज्य का अभ्यर्थी’ होना अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं है। सवाल इसके आगे का है- क्या वह अभ्यर्थी एनआरआई श्रेणी की सभी अनिवार्य शर्तें पूरी करता है?
यही जांच इस पूरे मामले की वास्तविक कुंजी है।
सवाल नंबर-1 : एनआरआई कौन? सिर्फ विदेश में रहने वाला रिश्तेदार काफी है?
अभिभावकों का सबसे बड़ा सवाल एनआरआई प्रायोजक की वास्तविक स्थिति को लेकर है। क्या संबंधित अभ्यर्थी का प्रायोजक वास्तव में निर्धारित इस श्रेणी में आता है? क्या वह अभ्यर्थी का ऐसा रिश्तेदार है, जिसे लागू नियम एनआरआई प्रायोजक के रूप में स्वीकार करते हैं? क्या उसके विदेश में निवास और एनआरआई स्थिति के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं? इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि फीस का भुगतान किस स्रोत से किया जा रहा है।
क्या फीस वास्तव में घोषित एनआरआई प्रायोजक के बैंकिंग स्रोत से आ रही है? क्या प्रायोजक की आय, विदेश में निवास और अभ्यर्थी से संबंध के दस्तावेज एक-दूसरे से मेल खाते हैं?
राजस्थान की काउंसलिंग में एनआरआई अभ्यर्थियों के दस्तावेजों का भौतिक सत्यापन किया जाना प्रक्रिया का हिस्सा रहा है। पहले चरण में एनआरआई अभ्यर्थियों के लिए दस्तावेज सत्यापन की व्यवस्था की गई थी और बाद में सत्यापित अभ्यर्थियों की संशोधित सूची जारी की गई। इसलिए अब सवाल सत्यापन की संख्या नहीं, गुणवत्ता का है।
सवाल नंबर-2 : 561 और 213- क्या सिर्फ अंक ही पूरी कहानी हैं?
नीट यूजी में 720 में से 561 अंक और 213 अंक के बीच बड़ा अंतर है। उपलब्ध 2026 एनआरआई सूची में भी 213 अंक वाला अभ्यर्थी सबसे निचले क्रम में दिखाई देता है। एनआरआई सीट पर प्रवेश के मामले में सवाल यह नहीं है कि ‘213 अंक वाला कैसे आ गया’, बल्कि यह है कि क्या 213 अंक वाले अभ्यर्थी की एनआरआई पात्रता नियमों के मुताबिक सही पाई गई है? यदि जवाब हां है, तो कम अंक होने के बावजूद एनआरआई श्रेणी में उसका विचार नियमों के तहत हो सकता है। यदि पात्रता में कोई कमी है, तो फिर सत्यापन की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े होंगे।
सवाल नंबर-3 : एमसीसी और राजस्थान काउंसलिंग- दोनों में भागीदारी का नियम क्या है?
एक और महत्वपूर्ण सवाल उन अभ्यर्थियों को लेकर है जो पहले एमसीसी की अखिल भारतीय काउंसलिंग या अपने गृह राज्य की काउंसलिंग में शामिल हो चुके हैं। एमसीसी देशभर के राज्यों की एमबीबीएस/बीडीएस सीटों में से 15 प्रतिशत अखिल भारतीय कोटे की सीटों के लिए यूजी काउंसलिंग करता है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि किसी अभ्यर्थी को एमसीसी में शामिल होने के कारण राजस्थान की एनआरआई काउंसलिंग में स्वतः अयोग्य मान लिया जाए। अलग-अलग काउंसलिंग में पात्रता, सीट श्रेणी, विकल्प और रिपोर्टिंग से जुड़े अलग नियम लागू हो सकते हैं। इसलिए इस मामले में संबंधित अभ्यर्थी की एमसीसी में भागीदारी, किसी अन्य राज्य में काउंसलिंग, सीट आवंटन/रिपोर्टिंग की स्थिति और राजस्थान में एनआरआई आवेदन की तारीख—इन सभी का रिकॉर्ड सामने आना जरूरी है। यही दस्तावेज यह स्पष्ट कर सकते हैं कि मामला नियमसम्मत है या नहीं।
अभिभावकों में यह धारणा है कि 15 प्रतिशत सीटें एमसीसी के माध्यम से जाने के बाद बची 85 प्रतिशत सीटें केवल राजस्थान मूल निवास वाले विद्यार्थियों के लिए होती हैं। यह तस्वीर पूरी तरह इतनी सरल नहीं है। राजस्थान की आधिकारिक काउंसलिंग व्यवस्था में राज्य कोटे के भीतर अलग-अलग श्रेणियां- सरकारी, प्रबंधन और एनआरआई सीटें- शामिल होती हैं। 2025 की राजस्थान काउंसलिंग पुस्तिका में भी राज्य की सभी राज्य कोटा सीटों में प्रबंधन/एनआरआई सीटें शामिल होने की बात स्पष्ट रूप से दर्ज थी।
2026 के संशोधित सीट विवरण में भी राजस्थान में एमबीबीएस के लिए 696 सरकारी, 142 सरकारी/आरयूएचएस सीएमएस एवं राजमेस प्रबंधन और 352 एनआरआई सीटें अलग-अलग दर्शाई गई हैं। इसलिए ‘85 प्रतिशत की हर सीट केवल मूल निवास वाले विद्यार्थी की है’ कहना नियमों की पूरी तस्वीर नहीं बताता।असल जांच यह होनी चाहिए कि एनआरआई सीट किस श्रेणी से बनी है, उसका उपयोग किस नियम के तहत हो रहा है और उस पर कौन पात्र है।
राजस्थान के अभिभावकों की मांग का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है। यदि एनआरआई श्रेणी में पर्याप्त पात्र अभ्यर्थी उपलब्ध नहीं हैं और सीटें खाली रह जाती हैं, तो क्या उन्हें अगले चरण में प्रबंधन अथवा अन्य श्रेणी में परिवर्तित करने का कोई प्रावधान है? यदि है तो वह किस आदेश के तहत है? और यदि नहीं है तो क्यों?
इसका स्पष्ट जवाब काउंसलिंग बोर्ड को सार्वजनिक करना चाहिए, ताकि अभिभावकों में भ्रम समाप्त हो। क्योंकि एक तरफ 500 से अधिक अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी सीट के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं और दूसरी तरफ एनआरआई श्रेणी में कम अंक वाले विद्यार्थी भी पात्रता पूरी करने पर सीट के दावेदार बन सकते हैं। दोनों के लिए लागू नियम अलग हैं, लेकिन नियमों की पारदर्शिता दोनों मामलों में समान रूप से जरूरी है।
अभिभावकों की मांग : दस्तावेज सार्वजनिक नहीं तो कम से कम लेखा-परीक्षण हो
मामले में अभिभावकों की मांग है कि प्रत्येक एनआरआई अभ्यर्थी की पात्रता का दोबारा परीक्षण कराया जाए। खास तौर पर-
पहला- एनआरआई प्रायोजक का विदेश में वास्तविक निवास और कानूनी स्थिति सत्यापित हो।
दूसरा- अभ्यर्थी और प्रायोजक के बीच निर्धारित रिश्ते का प्रमाण जांचा जाए।
तीसरा- प्रायोजक की आय, बैंकिंग विवरण और फीस भुगतान के स्रोत का मिलान किया जाए।
चौथा- यदि अभ्यर्थी ने एमसीसी या किसी अन्य राज्य की काउंसलिंग में भाग लिया है तो उसकी स्थिति स्पष्ट की जाए।
पांचवां- राजस्थान की एनआरआई सीटों पर राजस्थान प्राथमिकता और राजस्थान से बाहर की प्राथमिकता के आवंटन का नियम सार्वजनिक किया जाए।
छठा- खाली बची एनआरआई सीटों के आगे के उपयोग की प्रक्रिया सार्वजनिक की जाए।
यह मामला किसी एक विद्यार्थी को सीट मिलने या किसी दूसरे विद्यार्थी को सीट नहीं मिलने तक सीमित नहीं है। यह सवाल चिकित्सा प्रवेश प्रक्रिया में भरोसे और पारदर्शिता का है। यदि 561 अंक वाला राजस्थान का अभ्यर्थी किसी विशेष श्रेणी में सीट पाने का पात्र नहीं है तो उसका नियम स्पष्ट होना चाहिए। यदि 213 अंक वाला दूसरे राज्य का अभ्यर्थी एनआरआई श्रेणी की सभी शर्तें पूरी करता है तो उसे सीट के लिए विचार किए जाने का नियम भी सार्वजनिक होना चाहिए। लेकिन यदि किसी मामले में एनआरआई प्रमाण-पत्र, रिश्तेदारी, प्रायोजन या फीस के स्रोत में विसंगति है, तो उसकी जांच भी उतनी ही जरूरी है।
मेडिकल सीट किसी विद्यार्थी के लिए केवल एक कॉलेज में प्रवेश नहीं है। यह परिवार के वर्षों के सपने, करोड़ों रुपये तक पहुंचने वाली शिक्षा लागत और विद्यार्थी के भविष्य से जुड़ा फैसला है। इसलिए सवाल अब यह नहीं कि ‘561 बड़ा या 213?’