
Ground Report : शहरों में ब्लिंकिट, अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियां चंद मिनटों या दिनों में सामान घर तक पहुंचाने का दावा करती हैं। लेकिन राजस्थान के गांवों और दूर-दराज की ढाणियों में घर-घर जरूरत का सामान पहुंचाने की परंपरा इन आधुनिक प्लेटफॉर्म के आने से बहुत पहले से चली आ रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब सामान बैलगाड़ियों में भरकर लाया जाता था, आज मोटरसाइकिल और पिकअप पर पहुंचता है। तब गठरियों में नमक, शक्कर और मुल्तानी मिट्टी होती थी, आज काजू-बादाम, अखरोट, अंजीर और सेब हैं।
यह कहानी नागौर से महज सात-आठ किलोमीटर दूर बसे सिंघाणी गांव के बंजारा समुदाय की है। यहां कारोबार सिर्फ रोजी-रोटी का जरिया नहीं, बल्कि पीढ़ियों से आगे बढ़ती एक परंपरा है। वक्त बदला, साधन बदले, बाजार बदला और सामान की सूची भी बदलती गई, लेकिन गांव-ढाणियों तक पहुंचकर फेरी लगाने का सिलसिला कायम रहा। कभी बैलगाड़ियों के साथ परिवारों का काफिला निकलता था, आज अलसुबह बाइक और पिकअप लेकर पुरुष घरों से निकलते हैं और कई दिनों बाद लौटते हैं।
राजस्थान पत्रिका की टीम जब इस परंपरा को समझने सिंघाणी पहुंची तो सामने आया तीन पीढ़ियों के सफर का ऐसा दस्तावेज, जिसमें घुमंतू जीवन से स्थायी बसावट, पारंपरिक फेरी से बदलते बाजार और नई पीढ़ी की उम्मीदों तक की कहानी दर्ज है।
सिंघाणी में रहने वाले बंजारा परिवारों के बुजुर्गों की स्मृतियों में वह दौर आज भी जीवित है, जब गांवों में जरूरत का सामान खरीदने के लिए दुकानें कम हुआ करती थीं। ऐसे में बंजारा परिवार बैलगाड़ियों पर नमक, शक्कर, मिश्री और मुल्तानी मिट्टी लादकर गांव-गांव पहुंचते थे। उनकी बैलगाड़ियां ही सामान ढोने का साधन थीं और रास्ते में पड़ने वाले गांव ही बाजार।
मुल्तानी मिट्टी कोलायत क्षेत्र से और नमक सांभर व डीडवाना की खारी झीलों से जुटाया जाता था। इन सामानों को बेचने के लिए परिवार दूर-दराज के इलाकों तक जाते। पंजाब, हरियाणा और श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ क्षेत्र तक की यात्राओं में जरूरत के मुताबिक शक्कर और दूसरे सामान भी साथ जोड़ लिए जाते थे। बदले में अनाज और नकदी मिलती, जिससे परिवारों का गुजारा चलता था।
समय के साथ यह कारोबार भी बदलता गया। नमक, मुल्तानी मिट्टी और शक्कर की जगह मसाले, मिर्च, पापड़, बड़ी और अचार जैसे सामान ने ली। अब कई परिवारों ने ड्राईफ्रूट और फलों को कारोबार का हिस्सा बना लिया है। बैलगाड़ियों की जगह मोटरसाइकिल और पिकअप ने ले ली। सामान बदल गया, लेकिन ग्राहकों तक पहुंचने का तरीका आज भी वही है, घर-घर जाकर फेरी लगाना।
सिंघाणी और आसपास की ढाणियों में बसे परिवारों ने अब स्थायी मकान बना लिए हैं, लेकिन उनकी आजीविका का एक बड़ा हिस्सा आज भी गांव-गांव घूमकर सामान बेचने पर निर्भर है। घरों में महिलाएं और बुजुर्ग रहते हैं, जबकि पुरुष सुबह सामान लेकर निकल जाते हैं।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, युवा मोटरसाइकिल पर आसपास के करीब 100 किलोमीटर के दायरे में फेरी लगाते हैं। वहीं पिकअप लेकर निकलने वाले लोग पांच-सात सौ किलोमीटर दूर तक के इलाकों में सामान बेचने जाते हैं। कई लोग पांच, सात या दस दिन बाद घर लौटते हैं। पंजाब, हरियाणा और दिल्ली सहित दूसरे राज्यों तक जाने वाले कुछ कारोबारियों की वापसी में 20 से 30 दिन भी लग जाते हैं।
इस कारोबार में वाहन महज आवागमन का साधन नहीं, बल्कि चलती-फिरती दुकान है। मोटरसाइकिल पर सीमित मात्रा में सामान लेकर निकलने वाले युवाओं से लेकर पिकअप में फल और मेवे भरकर दूर-दराज के बाजार तलाशने वालों तक, हर किसी का अपना दायरा और अपना ग्राहक वर्ग है।
बंजारा परिवारों के कारोबार में बदलाव का अंदाजा उनकी आवाजों से भी लगाया जा सकता है। कभी नमक, शक्कर और मुल्तानी मिट्टी की आवाज लगाते हुए गांवों में पहुंचने वाले फेरीवाले अब ड्राईफ्रूट और फलों की पुकार लगाते हैं। मोटरसाइकिल और पिकअप पर छोटे स्पीकर लगे होते हैं। इनमें बजती आवाजें गांव की गलियों में दूर तक सुनाई देती हैं- ‘मेवे आ गए, अंजीर आ गई… असली अखरोट ले लो।’
सर्दी की शुरुआत के साथ गुड़, काजू, बादाम, अंजीर और दूसरे मेवों की बिक्री बढ़ने की उम्मीद रहती है। सेब के सीजन में कुछ कारोबारी हिमाचल प्रदेश से सेब लाकर बेचते हैं। दूसरे परिवार लहसुन, जीरा, मिर्च, मैथी और अन्य सामान की फेरी लगाते हैं।
इस तरह बंजारा परिवारों ने केवल सामान नहीं बदला, बल्कि मौसम और मांग के हिसाब से अपने कारोबार को ढालना भी सीखा है।
सिंघाणी गांव के बीच एक घर में चारपाई के पास बैठी 65 वर्षीय सायरो देवी के पास इस बदलाव की अपनी कहानी है। बचपन माता-पिता के साथ बैलगाड़ी में सफर करते हुए बीता। शादी के बाद पति और ससुराल के परिवार के साथ एक जगह से दूसरी जगह घूमती रहीं। करीब पांच दशक तक उनका जीवन इसी आवाजाही के बीच गुजरा।
सायरो देवी बताती हैं कि परिवार आजीविका के लिए कोलायत से मुल्तानी मिट्टी और सांभर व डीडवाना से नमक लेकर निकलता था। बैलगाड़ी में सामान के साथ बकरियां और गाय-बैल भी रहते थे। गांवों में सामान बेचने पर अनाज और कुछ नकदी मिल जाती थी। बाद में शक्कर, मिश्री और मिर्च जैसे सामान भी साथ रखे जाने लगे।
उनकी पीढ़ी में किसी ने पढ़ाई नहीं की। उनका बेटा भी पढ़ा-लिखा नहीं है, लेकिन अब उनके पोते-पोतियां सिंघाणी के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने जाते हैं। सायरो देवी के अनुभव उस दौर की तस्वीर सामने रखते हैं, जब घर और कारोबार के बीच कोई स्पष्ट दूरी नहीं थी। परिवार ही काफिला था, बैलगाड़ी ही दुकान और रास्ते में मिलने वाले गांव ही बाजार। आज वह जीवन पीछे छूट चुका है, लेकिन उसकी जगह बनी नई व्यवस्था में भी परिवार की आजीविका का आधार वही पुराना कारोबार है।
सिंघाणी के श्रवण बंजारा ने भी बदलते समय के साथ अपने काम का तरीका बदला है। पहले वह मोटरसाइकिल पर अचार, मिर्च, पापड़ और दूसरे सामान लेकर गांवों में फेरी लगाता था। अब पिकअप में सेब और ड्राईफ्रूट भरकर बेचने जाता है। सीजन के हिसाब से लहसुन और अन्य सामान भी रखता है।
सर्दी शुरू होने के साथ गुड़, बादाम, काजू और अंजीर जैसे सामान की बिक्री के लिए निकलने की तैयारी रहती है। गांव के कुछ युवक तो बाड़मेर, जैसलमेर और हरियाणा के भिवानी, चरखी दादरी तथा सिरसा जैसे इलाकों तक जाते हैं। श्रवण की यात्रा इस बात का उदाहरण है कि पारंपरिक कारोबार करने वाले परिवार भी बदलती मांग के अनुरूप अपने साधन और सामान बदल रहे हैं। जहां पहले कारोबार बैलगाड़ी की क्षमता और परिवार की यात्रा पर निर्भर था, वहीं अब वाहन, दूरी और मौसमी मांग उसकी दिशा तय करते हैं।
करीब 50 वर्षीय पांडू बंजारा की तीन पीढ़ियों की कहानी भी इसी बदलाव को सामने लाती है। वह बताते हैं कि उनके दादा नारूराम गाचणी यानी मुल्तानी मिट्टी और नमक लेकर दूर-दराज के इलाकों में जाते थे। उस दौर में परिवार सहित घूमना कारोबार का हिस्सा था।
बाद में उनके पिता जस्सूराम ने सिंघाणी में स्थायी रूप से रहना शुरू किया। हालांकि, कारोबार की वजह से उनका आना-जाना जारी रहा। पांडू के मुताबिक, उनके पिता अकेले चंडीगढ़ तक पान मैथी और नागौर की मिर्च बेचने जाते थे और कई-कई दिन बाद लौटते थे।
अब पांडू मोटरसाइकिल पर लहसुन, मेवे, मिर्च, बादाम और गोंद सहित विभिन्न सामान बेचते हैं। उनके परिवार की तीन पीढ़ियों में कारोबार का स्वरूप लगातार बदलता रहा है। दादा की बैलगाड़ी से शुरू हुआ सफर पिता के दूर-दराज के बाजारों तक पहुंचने और अब बाइक पर सामान बेचने तक आ गया है।
सिंघाणी में अब बंजारा परिवारों के घर हैं। घरों के आसपास बकरियां और गायें नजर आती हैं। कई घरों में दो-तीन मोटरसाइकिलें हैं तो कुछ के बाहर पिकअप खड़ी मिलती है। दिन के समय गांव में अधिकतर महिलाएं और बुजुर्ग दिखाई देते हैं, क्योंकि पुरुष कारोबार के सिलसिले में बाहर निकल चुके होते हैं। करीब पांच-सात दशक पहले यहां कुछ परिवारों ने बैलगाड़ियों के साथ डेरा डाला था। धीरे-धीरे अस्थायी पड़ाव स्थायी बसावट में बदल गए। स्थानीय लोगों के अनुसार, आज सिंघाणी में बंजारा समुदाय के करीब 1200 से 1300 परिवार रहते हैं।
इस बदलाव के बावजूद उनकी आजीविका का पारंपरिक आधार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। घुमंतू जीवन की जगह स्थायी घरों ने ले ली, मगर रोजी-रोटी के लिए रास्तों पर निकलना जारी रहा। फर्क इतना है कि अब परिवार साथ नहीं चलता, बल्कि परिवार का कमाने वाला सदस्य सामान लेकर निकलता है और कई दिनों बाद लौटता है।
सिंघाणी के बंजारा परिवारों का यह सफर केवल एक समुदाय के कारोबार की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की तस्वीर भी है, जिसमें ग्रामीण बाजारों की जरूरतों के साथ पारंपरिक आजीविका ने अपना स्वरूप बदला। कभी नमक और मुल्तानी मिट्टी लेकर निकलने वाले परिवार आज मेवे, फल और मसाले बेच रहे हैं। कभी बैलगाड़ियों के काफिले गांवों के बाहर पड़ाव डालते थे, अब मोटरसाइकिल और पिकअप दूर-दराज की गलियों तक पहुंचती हैं।
आधुनिक कंपनियों की होम डिलीवरी में मोबाइल पर ऑर्डर दिया जाता है और सामान घर पहुंचता है। सिंघाणी के इन फेरीवालों का तरीका अलग है- वे खुद ग्राहक के दरवाजे तक पहुंचते हैं, आवाज लगाते हैं और अपना सामान बेचते हैं। तीन पीढ़ियों की इस यात्रा में सबसे स्थायी चीज कोई वाहन या उत्पाद नहीं, बल्कि गांव-ढाणियों तक पहुंचकर आजीविका कमाने की वह परंपरा है, जिसने समय के साथ अपना रूप तो बदला, लेकिन अपना रास्ता नहीं छोड़ा।