
Baror excavation site : सरहद से कुछ ही दूरी पर एक छोटा-सा गांव… ऊपर से देखने पर खेत, कच्चे-पक्के रास्ते और सामान्य ग्रामीण जिंदगी। लेकिन इसी जमीन के नीचे कभी ऐसी दुनिया आबाद थी, जिसके बारे में आज हम इतिहास की किताबों में पढ़ते हैं। यह गांव है श्रीगंगानगर जिले का बरोर।
कुछ साल पहले यहां जमीन की खुदाई शुरू हुई तो मिट्टी के साथ-साथ हजारों साल पुरानी सभ्यता की परतें बाहर आने लगीं। मिट्टी की दीवारें मिलीं, चूल्हे मिले, बर्तन मिले, आभूषण मिले और ऐसी मोहरें मिलीं, जिन्हें पुराविदों ने बेहद महत्वपूर्ण माना। दो मानव कंकाल भी मिले।
इन अवशेषों ने यह संभावना पैदा की कि बरोर हड़प्पाकालीन सभ्यता का कोई सामान्य गांव नहीं, बल्कि व्यापार और बाजार व्यवस्था का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा होगा। लेकिन कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा यह है कि जिस जगह से इतिहास की इतनी अहम कड़ियां जुड़ने की उम्मीद जगी थी, आज वहां खुदाई बंद है। यानी जिस जमीन ने हजारों साल पुरानी सभ्यता का राज खोला, वही जमीन अब फिर खामोश है।
बरोर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की उत्खनन शाखा तृतीय के करीब दो दर्जन सदस्यों की टीम ने खुदाई की थी। मकसद सिर्फ पुरानी वस्तुएं निकालना नहीं था। पुराविद यह समझना चाहते थे कि इस क्षेत्र में हजारों साल पहले लोग कैसे रहते थे, उनका रहन-सहन कैसा था और वे किन लोगों से व्यापार करते थे।
यहां कच्ची मिट्टी की ईंटों की दीवारें, फर्श, चूल्हे, पक्की मिट्टी के बर्तन, शंख और तांबे की चूड़ियां, सिलबट्टे, मिट्टी की छलनियां, माला में इस्तेमाल होने वाले अर्द्धरत्न और हड्डियों से बने नुकीले औजार मिले। मृदभांड यानी मिट्टी के बर्तनों पर काले रंग की आकर्षक चित्रकारी भी मिली। इनमें पीपल के पत्ते और हिरण जैसे चित्र शामिल थे। इन चीजों को सिर्फ पुरानी वस्तुएं मानना आसान है, लेकिन पुराविदों के लिए हर वस्तु अपने समय की एक कहानी कहती है।
बरोर से मिली बटन के आकार की मोहरों ने पुरातत्व विशेषज्ञों का विशेष ध्यान खींचा। हाथी दांत और शंख को तराशकर बनाई गई तथा उत्कीर्ण ऐसी मोहरें भारत में पहली बार इसी स्थान से मिलने की बात सामने आई थी। पुराविदों के अनुसार इन मोहरों का संबंध उस समय की व्यापारिक व्यवस्था से हो सकता है। इससे यह संभावना मजबूत हुई कि बरोर कभी बाजार और लेन-देन की व्यवस्था का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा होगा। कल्पना कीजिए, आज से हजारों साल पहले इसी इलाके में लोग सामान लेकर आते-जाते होंगे, वस्तुओं का लेन-देन होता होगा और व्यापार की अपनी कोई व्यवस्था रही होगी। आज जिस जगह को हम एक छोटे से सीमावर्ती गांव के रूप में जानते हैं, वहां कभी एक विकसित मानवीय बस्ती रही हो सकती है।
खुदाई में मिले अवशेषों से उस समय के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी की झलक भी मिलती है। गेहूं या धान के दानों के अवशेष मिले। मिट्टी के सिलबट्टे मिले। चूल्हे मिले। बर्तन मिले। आभूषण मिले। शंख और सीप से बनी वस्तुएं मिलीं। यानी यहां सिर्फ कोई अस्थायी ठिकाना नहीं था। यहां लोगों के रहने, खाने, काम करने और अपनी मान्यताओं के अनुसार जीवन जीने के संकेत मिले। खुदाई में दो मानव कंकाल भी मिले थे। ये अवशेष उस दौर में यहां रहने वाले लोगों के जीवन और मृत्यु से जुड़ी कई अनसुलझी कड़ियों की ओर इशारा करते हैं।
बरोर की खुदाई में मिला एक बड़ा पात्र भी खास माना गया। इस पर लाल रंग की पृष्ठभूमि पर काले रंग से पीपल के पत्तों का चित्रण था। पुराविदों ने इसे उस समय के धार्मिक रीति-रिवाजों से जोड़कर देखा। यानी मिट्टी का यह पात्र सिर्फ एक बर्तन नहीं था। वह हजारों साल पहले यहां रहने वाले लोगों की आस्था और सोच का संकेत भी हो सकता है। इसी तरह मृदभांडों पर बनी चित्रकारी यह बताती है कि उस समय के लोग उपयोग की वस्तुओं को भी कलात्मक रूप देते थे।
बरोर की कहानी सिर्फ हड़प्पा सभ्यता तक सीमित नहीं है। इसका एक बड़ा सिरा सरस्वती नदी की खोज से भी जुड़ता है। सरस्वती विरासत परियोजना के तहत इस इलाके में पुरातात्विक गतिविधियां हुई थीं। पुराविदों को मिले शंख और सीप जैसे अवशेषों ने इस क्षेत्र में कभी किसी जलस्रोत की मौजूदगी की संभावना को मजबूत किया। इसी वजह से यह उम्मीद भी जगी कि पुरातात्विक खोज को आगे बढ़ाकर प्राचीन सरस्वती के प्रवाह से जुड़े सवालों के जवाब तलाशे जा सकते हैं। हालांकि सरस्वती नदी के ऐतिहासिक प्रवाह और उसकी पहचान को लेकर विद्वानों में अलग-अलग मत हैं। बरोर की खुदाई से मिले अवशेष इस बहस को समझने के लिए महत्वपूर्ण पुरातात्विक संकेत जरूर देते हैं।
हड़प्पा संस्कृति से जुड़े अब तक 250 से अधिक स्थलों की पहचान हो चुकी है। इनमें हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, चन्हूदड़ो, लोथल, बनावली और कालीबंगा जैसे प्रमुख केन्द्र शामिल हैं। हनुमानगढ़ जिले का कालीबंगा इस सभ्यता के प्रमुख स्थलों में शामिल है। ऐसे में बरोर से मिले अवशेषों ने इस सीमावर्ती इलाके के पुरातात्विक महत्व को और बढ़ा दिया था। पुराविदों के सामने सवाल था, क्या बरोर भी हड़प्पा संस्कृति का कोई महत्वपूर्ण केन्द्र था? खुदाई के दौरान मिले अवशेषों ने इस संभावना को जरूर जन्म दिया, लेकिन आगे की व्यापक खुदाई और शोध के बिना इसका पूरा जवाब मिलना मुश्किल है।
यहीं से बरोर की कहानी का दूसरा और कुछ निराश करने वाला हिस्सा शुरू होता है। जिस खुदाई से इतनी उम्मीदें जगी थीं, वह अब बंद है। दोबारा खुदाई शुरू होने की संभावना भी फिलहाल नजर नहीं आती। खुदाई में मिले अवशेषों को स्थानीय स्तर पर प्रदर्शित करने के लिए कोई ऐसा संग्रहालय भी विकसित नहीं हो सका, जहां आम लोग जाकर इस इतिहास को देख और समझ सकें। नतीजा यह है कि जिस गांव ने कभी पुरातत्व के नक्शे पर जगह बनाई थी, वह फिर आम लोगों की नजर से दूर हो गया।
बरोर ने इतिहास की एक झलक दिखाई थी। मोहरों ने व्यापार की कहानी सुनाई, बर्तनों ने कला और जीवनशैली के संकेत दिए, पीपल के पत्ते ने आस्था की ओर इशारा किया और शंख-सीप ने किसी पुराने जलस्रोत की संभावना जगाई। लेकिन इन संकेतों को जोड़कर पूरी कहानी लिखने के लिए और शोध, और खुदाई और संरक्षण की जरूरत है। आज बरोर की जमीन के नीचे शायद अभी भी बहुत कुछ दबा है। सवाल सिर्फ इतना है…क्या फिर कभी उस मिट्टी को हटाकर हजारों साल पुरानी उस कहानी का अगला पन्ना पढ़ा जाएगा?