
Watercock Bird: बारिश की पहली फुहारें केवल धरती को ही नहीं, बल्कि जंगलों और खेतों को भी नई जिंदगी देती हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में इन दिनों एक ऐसी आवाज फिर सुनाई देने लगी है, जिसका इंतजार सिर्फ किसान ही नहीं, बल्कि पक्षी प्रेमी और वन्यजीव फोटोग्राफर भी पूरे साल करते हैं। यह आवाज है दुर्लभ पक्षी वाटरकॉक (Gallicrex cinerea) की, जिसे स्थानीय लोग प्यार से 'कपकपिया' कहते हैं। धान के खेतों, दलदली इलाकों और घनी घास के बीच छिपकर रहने वाला यह पक्षी मानसून का एक अनोखा संदेशवाहक माना जाता है। इसकी मौजूदगी यह संकेत देती है कि प्रकृति अपने सबसे जीवंत रूप में लौट रही है।
स्थानीय लोगों ने इस पक्षी का नाम उसकी आवाज के आधार पर रखा है। प्रजनन काल के दौरान नर वाटरकॉक जो ध्वनि निकालता है, वह दूर तक सुनाई देती है। कई लोग इसे पानी की भरी बोतल को उल्टा कर खाली करने जैसी आवाज बताते हैं, जबकि कुछ ग्रामीण इसे "कप-कप-कप…" जैसी ध्वनि मानते हैं। इसी वजह से बस्तर में इसे 'कपकपिया' कहा जाने लगा। यही अनोखी आवाज इसे अन्य जलपक्षियों से अलग पहचान देती है।
वाटरकॉक का स्वभाव बेहद शर्मीला होता है। यह इंसानों की हलचल महसूस होते ही घास और दलदल में इस तरह छिप जाता है कि इसे ढूंढ़ पाना लगभग असंभव हो जाता है। इसी कारण पक्षी प्रेमियों और वाइल्डलाइफ फोटोग्राफरों के लिए इसकी तस्वीर लेना किसी उपलब्धि से कम नहीं माना जाता। जगदलपुर के धरमपुरा क्षेत्र में भी हाल ही में लंबे इंतजार के बाद इस दुर्लभ पक्षी की तस्वीर कैमरे में कैद की जा सकी।
बारिश का मौसम इस पक्षी के लिए केवल जीवन का नहीं, बल्कि प्रजनन का भी सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। इस दौरान नर वाटरकॉक का रंग और भी आकर्षक हो जाता है। इसका शरीर काले-भूरे रंग का दिखाई देता है, सिर पर लाल रंग का मांसल उभार विकसित हो जाता है और चमकीली पीली चोंच इसे बेहद अलग पहचान देती है। सुबह और शाम के समय इसकी सक्रियता सबसे अधिक रहती है। यही समय इसकी आवाज सुनने और इसे देखने का सबसे उपयुक्त माना जाता है।
वाटरकॉक का पूरा जीवन पानी और हरियाली से जुड़ा होता है। यह दलदली क्षेत्रों, धान के खेतों, छोटी झीलों, तालाबों और घनी घास वाले इलाकों में रहना पसंद करता है। इसके लंबे पंजे इसे कीचड़ और पानी में आसानी से चलने में मदद करते हैं। इसका भोजन मुख्य रूप से कीड़े-मकोड़े, छोटे घोंघे, मेंढकों के बच्चे, जलीय जीव, छोटे बीज पर आधारित होता है। इस तरह यह प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है।
मानसून समाप्त होने के साथ ही यह पक्षी फिर से रहस्यमयी हो जाता है। प्रजनन काल खत्म होने के बाद यह घनी झाड़ियों और ऊंची घास के बीच छिप जाता है। उस समय यह लगभग आवाज निकालना भी बंद कर देता है। पूरे साल इसकी केवल हल्की घुरघुराहट जैसी ध्वनि कभी-कभार सुनाई देती है। यही कारण है कि वर्ष के अधिकांश समय इसकी मौजूदगी का पता ही नहीं चल पाता।
विशेषज्ञों का मानना है कि वाटरकॉक की मौजूदगी किसी भी क्षेत्र के स्वस्थ वेटलैंड (आर्द्रभूमि) और जैव विविधता का संकेत होती है। जगदलपुर क्षेत्र में इसके प्रजनन की वैज्ञानिक पुष्टि गवर्नमेंट केपीजी कॉलेज के प्राणी विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. सुशील दत्ता द्वारा की जा चुकी है। यह तथ्य बताता है कि बस्तर की आर्द्रभूमियां आज भी दुर्लभ पक्षियों के लिए सुरक्षित आवास बनी हुई हैं।
वाटरकॉक केवल भारत में ही नहीं पाया जाता। इसका प्राकृतिक विस्तार- भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, दक्षिण चीन, कोरिया, जापान, फिलीपींस, इंडोनेशिया जैसे देशों के दलदली क्षेत्रों तक फैला हुआ है। हालांकि हर जगह इसे देख पाना आसान नहीं होता क्योंकि यह अत्यंत छिपकर रहने वाला पक्षी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि तेजी से खत्म हो रहे वेटलैंड, धान के खेतों का सिकुड़ना और आर्द्रभूमियों पर बढ़ता अतिक्रमण ऐसे पक्षियों के लिए खतरा बन रहा है। यदि दलदली क्षेत्र और प्राकृतिक जल स्रोत सुरक्षित रहेंगे, तभी आने वाले वर्षों में भी मानसून के साथ 'कपकपिया' की यह अनोखी पुकार सुनाई देती रहेगी।
जब बस्तर के खेतों में 'कपकपिया' की आवाज गूंजती है तो वह केवल एक पक्षी की पुकार नहीं होती, बल्कि यह प्रकृति का संदेश होता है कि बारिश अपने पूरे रंग में है, खेत जीवंत हैं और जैव विविधता अब भी सांस ले रही है। यही वजह है कि मानसून के हर मौसम में इस दुर्लभ पक्षी का इंतजार पक्षी प्रेमियों से लेकर किसानों तक सभी को रहता है।