Jagannath Pahadia: भजनलाल शर्मा पहले ऐसे नेता नहीं हैं, जिन्होंने भरतपुर जिले से मुख्यमंत्री पद का सफर तय किया हो। उनसे पहले जिले के भुसावर में जन्मे जगन्नाथ पहाड़िया राजस्थान के मुख्यमंत्री रह चुके हैं।
Jagannath Pahadia: राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नाम से आज हर कोई परिचित है। भजनलाल शर्मा भरतपुर जिले के एक छोटे से गांव अटारी से ताल्लुक रखते हैं। बेहद साधारण परिवार में जन्मे भजनलाल शर्मा की राजनीतिक यात्रा आसान नहीं रही, लेकिन किस्मत ने उनका साथ दिया। जयपुर की सांगानेर विधानसभा सीट से पहली बार विधानसभा चुनाव जीतने के बाद ही भजनलाल शर्मा को सीधे मुख्यमंत्री बनाए जाने का फैसला राजस्थान ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी चर्चा का विषय रहा।
हालांकि भजनलाल शर्मा पहले ऐसे नेता नहीं हैं, जिन्होंने भरतपुर जिले से मुख्यमंत्री पद का सफर तय किया हो। उनसे पहले जिले के भुसावर में जन्मे जगन्नाथ पहाड़िया राजस्थान के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। साधारण परिवार में 15 जनवरी 1932 को जन्मे पहाड़िया कांग्रेस के कद्दावर दलित नेताओं में गिने जाते थे।
अगर भजनलाल शर्मा और जगन्नाथ पहाड़िया की तुलना की जाए तो दोनों की पृष्ठभूमि में कई समानताएं नजर आती हैं। दोनों ही साधारण परिवारों से आते हैं। दोनों की राजनीति जमीन से शुरू हुई और दोनों ही संगठन के भरोसे मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे। हालांकि दोनों का राजनीतिक दौर, पार्टी और परिस्थितियां पूरी तरह अलग रहीं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भरतपुर से दो मुख्यमंत्रियों का निकलना आने वाले समय में इस क्षेत्र की राजनीतिक अहमियत को और बढ़ाएगा। इससे युवाओं को यह संदेश जाएगा कि साधारण पृष्ठभूमि से आने के बावजूद बड़े सपने देखे और पूरे किए जा सकते हैं।
जगन्नाथ पहाड़िया राजस्थान के पहले दलित मुख्यमंत्री थे। वह संजय गांधी के करीबी थे। उन्होंने 1957 में अपना पहला लोकसभा चुनाव जीता था। जगन्नाथ पहाड़िया 1980 में राजस्थान के मुख्यमंत्री बने।
अपने 13 महीने के कार्यकाल के बाद उन्होंने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया था। उसके बाद वह बिहार और हरियाणा के राज्यपाल बने। जगन्नाथ पहाड़िया की पत्नी शांति पहाड़िया भी राजनीति में रहीं। जगन्नाथ पहाड़िया का ससुराल उस समय सवाईमाधोपुर और वर्तमान में दौसा जिले के रसीदपुर गांव में है।
शांति पहाड़िया का जन्म रसीदपुर में ही एक गरीब दलित परिवार में हुआ था। शांति पहाड़िया के भाई सुआलाल एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे। रसीदपुर निवासी बाबूलाल ने बताया कि उन्होंने गांव में बचपन में शांति पहाड़िया को बकरियां चराते हुए देखा, लेकिन कौन जानता है किसकी किस्मत में क्या लिखा है। आगे जाकर वह साधारण सी लड़की विधायक और सांसद बनी।
1956 में जवाहरलाल नेहरू से हुई एक आकस्मिक मुलाकात ने ही पहाड़िया को राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। राजस्थान विश्वविद्यालय से एमए एलएलबी पहाड़िया एक बेहद गरीब परिवार से थे। 1956 में जब लंबे और दुबले-पतले पहाड़िया कुर्ता-पायजामा और गांधी टोपी पहने हुए जवाहरलाल नेहरू से मिले तो नेहरू ने उनसे विकास कार्यों और स्वतंत्रता के बाद देश की प्रगति के बारे में पूछा...
पहाड़िया ने कहा कि देश सही राह पर है, लेकिन दलित अभी भी पिछड़े और दबे-कुचले हैं। नेहरू ने पहाड़िया से 1957 का लोकसभा चुनाव लड़ने का अनुरोध किया। उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया और सवाई माधोपुर (अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित) सीट से चुनाव लड़ने के लिए टिकट मांगा। शिक्षित होने के कारण पहाड़िया को आसानी से टिकट मिल गया।
चुनाव में जगन्नाथ पहाड़िया ने जीत दर्ज की और लोकसभा के सबसे युवा सदस्य बने। पंडित नेहरू गर्व से उन्हें निचले सदन के सबसे युवा सदस्य के रूप में पेश करते थे। बाद में उन्हें पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में उप मंत्री के रूप में भी शामिल किया इस तरह पहाड़िया ने राजनीति में प्रवेश किया और केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और बिहार और हरियाणा के राज्यपाल रहे।
बता दें कि वर्तमान में भरतपुर सीट से सांसद संजना जाटव भी प्रदेश की सबसे कम उम्र की सांसद है। वे भी दलित समुदाय से ही आती हैं। खास बात यह है कि संजना जाटव का जन्म भी वैर विधानसभा क्षेत्र की भुसावर तहसील के एक गांव में हुआ है।
जगन्नाथ पहाड़िया 1962 के लोकसभा चुनाव में सवाई माधोपुर से स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार केसर लाल से हार गए। बाद में सवाई माधोपुर अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट बन गई और भरतपुर जिले में बयाना नया लोकसभा क्षेत्र बनाया गया। पहाड़िया इस आरक्षित सीट से 1967, 1972 और 1980 में लोकसभा के लिए चुने गए।
1977 में जब कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और जनता पार्टी ने केंद्र में सरकार बनाई तब भी इंदिरा गांधी की सरकार में उपमंत्री रहे पहाड़िया इंदिरा गांधी के प्रति वफादार बने रहे। वे नियमित रूप से दिल्ली स्थित एआईसीसी कार्यालय जाते और पार्टी को पुनर्जीवित करने के लिए पूरे दिन वहां काम करते थे।
इस दौरान जगन्नाथ पहाड़िया संजय गांधी के बहुत करीब आ गए थे, जो पार्टी के काम के प्रति उनकी निष्ठा और इंदिरा गांधी के प्रति उनकी वफादारी से प्रभावित थे। कहा जाता है कि संजय गांधी से नजदीकी की वजह से ही उन्होंने राजनीति की सीढ़ियां बहुत तेजी से चढ़ीं।
1980 में जब कांग्रेस भारी बहुमत से सत्ता में लौटी तो पहाड़िया को वित्त राज्य मंत्री बनाया गया। लेकिन पार्टी और इंदिरा गांधी के प्रति उनकी अटूट निष्ठा से प्रभावित होकर संजय गांधी ने उन्हें राजस्थान की कमान सौंपने का फैसला किया।
1980 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवारों का चयन जगन्नाथ पहाड़िया ने किया था। इससे पहले 1957 से 1980 तक लोकसभा सदस्य रहने के दौरान पहाड़िया ने कभी भी राजस्थान की राजनीति में हाथ नहीं आजमाया।
1980 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस राजस्थान में भारी बहुमत से सत्ता में आई। कांग्रेस की इस जीत का श्रेय पहाड़िया को ही दिया, क्योंकि पार्टी ने 200 में से 147 सीटें जीती थीं। कांग्रेस ने इसी वजह से पहाड़िया को मुख्यमंत्री बनाया।
खास बात यह है उस समय विधायक दल की बैठक जयपुर में न होकर दिल्ली में हुई थी। उस दौर में पहाड़िया कई दिग्गज नेताओं को पछाड़कर राजस्थान के मुख्यमंत्री बने थे।
अपने कार्यकाल में पहाड़िया ने प्रदेश में शराबबंदी की उस नीति को जारी रखा जिसे जनता पार्टी की सरकार ने 1977 से 1980 के बीच लागू किया था। इससे राज्य की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गई थी। पहाड़िया का कहना था कि उन्होंने अपनी आंखों से देखा था कि कैसे शराब पीनी वाले गरीब लोग अपनी पत्नियों और बच्चों को पीटते थे। शराब ने कई परिवारों को बर्बाद कर दिया था।
पहाड़िया एक सफल प्रशासक नहीं बन सके और नौकरशाही का विश्वास हासिल नहीं कर सके। नौकरशाही पहाड़िया से इसलिए नाराज थी, क्योंकि उन्होंने केंद्र शासित प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी सीएस खैरवाल को अपना मुख्य सचिव नियुक्त किया था। खैरवाल राज्य के लिए बाहरी व्यक्ति थे और उन्हें राज्य के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।
प्रख्यात हिंदी कवयित्री महादेवी वर्मा की आलोचना करने पर जगन्नाथ पहाड़िया को भारी कीमत चुकानी पड़ी। पहाड़िया ने जयपुर में एक साहित्यिक समारोह में उनका उपहास उड़ाते हुए कहा था कि उन्हें उनकी कविता कभी समझ नहीं आई। कहा जाता है कि आहत महादेवी वर्मा ने पहाड़िया की इंदिरा गांधी से शिकायत कर दी।
इसके बाद पहाड़िया के खिलाफ असंतोष बढ़ता गया और उन्हें दिल्ली में पार्टी के नेतृत्व से इस्तीफा देने के संकेत मिलने लगे और उन्होंने 13 महीने बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद वे चार बार विधानसभा के लिए चुने गए। विमान दुर्घटना में संजय गांधी की मृत्यु के बाद दिल्ली में जगन्नाथ पहाड़िया का काफी प्रभाव कम हो गया था।
लेकिन वे 2008 तक सक्रिय राजनीति में रहे। इसके बाद उन्होंने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा। ना ही राज्य की राजनीति में दखल दिया। जब उन्हें 2009 में हरियाणा के राज्यपाल के रूप में कार्यभार संभालने का प्रस्ताव मिला तो उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया। सार्वजनिक जीवन से सेवानिवृत्त होने के बाद पहाड़िया और उनकी पत्नी शांति पहाड़िया ने जयपुर में एक शांत जीवन व्यतीत किया। 19 मई 2021 को जगन्नाथ पहाड़िया का निधन हो गया था।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पूरा नाम | जगन्नाथ पहाड़िया |
| जन्म तिथि | 15 जनवरी 1932 |
| जन्म स्थान | भुसावर (राजस्थान) |
| निधन | 19 मई 2021 |
| पिता का नाम | नाथीलाल |
| माता का नाम | चंदा देवी |
| पत्नी का नाम | शांति पहाड़िया |
| शिक्षा | एमए, एलएलबी |
| पद | कार्यकाल |
|---|---|
| राजस्थान के मुख्यमंत्री | 6 जून 1980 से 14 जुलाई 1981 |
| बिहार के राज्यपाल | 3 मार्च 89 से 2 फरवरी 90 |
| हरियाणा के राज्यपाल | 27 जुलाई 2009 से 26 जुलाई 2014 |
| वित्त उप मंत्री | 1967 से 69 |
| खाद्य, कृषि, श्रम व उद्योग उप मंत्री | 1970 से 71 |
| वित्त राज्य मंत्री | 1980 |
| लोकसभा सदस्य | 1957, 1967, 1971 व 1980 |
| विधायक | 1980, 1985, 1990 व 2003 |
| राज्यसभा सदस्य | 1965 और 1966 |