
Sawan 2026 : इस साल सावन में कांवड़ लेकर निकले 10 करोड़ से ज्यादा शिवभक्तों ने कुल करीब 50 करोड़ किलोमीटर का सफर तय किया। यानी इन श्रद्धालुओं के कदमों ने मिलकर इतनी दूरी नाप दी, जितनी धरती की पूरी परिधि के करीब 12,500 चक्कर लगाने में तय होती है। कोई 10 किलोमीटर चला तो किसी ने 600 किलोमीटर तक का सफर किया। केवल हरिद्वार में ही 4.8 करोड़ कांवड़िए गंगाजल लेने पहुंचे। इतने ही बाकी देश में भी मान लें और एक कांवड़िए के औसत 5 किलोमीटर के सफर को भी आधार मानें तो सावन में शिव भक्तों ने जो दूरी तय की, उसे जोड़ा जाए तो धरती की 12500 परिक्रमा की जा सकती है। इस वर्ष सावन 30 जुलाई से शुरू हुआ और 28 अगस्त को रक्षाबंधन के साथ कांवड़ यात्रा का सिलसिला रुका।
जयपुर के अलग अलग क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालुओं ने गलताजी से पवित्र जल लाकर अभिषेक किया, इसके लिए 20 से 50 किमी से ज्यादा की दूरी तय की। अल सुबह से लेकर शाम और देर रात तक राजधानी के रास्ते कांवड़ियों के लगाए भोलेबाबा के जयकारों से गूंजते रहे। डीजे के चलते भजनों पर उनकी आस्था और जयकारे और तेज सुनाई दिए। रात को कांवड़ लेकर जाते समूह को रोककर पूछा - कैसा लगता है कांवड़ में जल लाना? इसके जवाब में गोनेर निवासी पुरुषोत्तम शर्मा बोले - यों समझो - बाबा का आशीर्वाद मिल गया।
परंपरागत कांवड़ में श्रद्धालु पैदल चलते हुए कई दिनों में अपने गंतव्य तक पहुंचते हैं। इसके समानांतर डाक कांवड़ का चलन तेजी से लोकप्रिय हुआ है। इसमें श्रद्धालु समूह में गंगाजल लाते हैं और निर्धारित समय में उसे गंतव्य तक पहुंच अभिषेक करते हैं। श्रीगंगानगर शहर के प्राचीन शिवालय बाबा शुक्रनाथ की बगीची में देवप्रयाग से गंगाजल की कांवड़ लेकर पहुंचे कांवडिय़ों ने महादेव का अभिषेक किया। महंत बाबा कैलाशनाथ के सान्निध्य में 80 कांवडिय़ों का जत्था 7 अगस्त की सुबह रवाना हुआ और 9 अगस्त की सुबह देवप्रयाग से गंगाजल लेकर रवाना हुए। कांवडिय़ों ने देवप्रयाग से श्रीगंगानगर तक 631 किलोमीटर की यात्रा लगातार चलते हुए 50 घंटे में पूरी की।
कांवड़ यात्रा श्रावण यानी जुलाई-अगस्त के दौरान होने वाली धार्मिक पदयात्रा है, जिसमें श्रद्धालु हरिद्वार, गौमुख और गंगोत्री जैसे तीर्थस्थलों से गंगाजल व पवित्र जल भोलेशंकर को अर्पित करते हैं। इसकी धार्मिक मान्यता समुद्र मंथन से जुड़ी मानी जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान निकले विष को भगवान शिव ने धारण किया था। तीव्र विष की उष्णता शांत करने के लिए देवताओं ने महादेव का अभिषेक किया था। हिंदू परंपरा में श्रावण मास भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इसी दौरान कांवड़िए पवित्र नदियों से जल लेकर शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। गंगाजल से अभिषेक को विशेष महत्व है।
कांवड़ यात्रा ने धार्मिक पर्यटन के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बड़ा बाजार दिया है। हरिद्वार में इस वर्ष 4.8 करोड़ से ज्यादा कांवड़िए पहुंचे। व्यापारियों के अनुसार एक कांवड़िए का भोजन, ठहरने, कांवड़ और परिवहन आदि पर औसत खर्च करीब 2,500 रुपए रहा। इस आधार पर हरिद्वार में यात्रा के दौरान 10 हजार करोड़ रुपए से अधिक के कारोबार का अनुमान लगाया गया। इस कारोबार में कांवड़ और पूजा सामग्री, भगवा कपड़े, फूल-माला, भोजन, पानी, फल, होटल-धर्मशाला, परिवहन और अस्थायी शिविरों से जुड़े छोटे-बड़े कारोबार शामिल हैं।